व्यावहारिक दृष्टि की कमी

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बिहार में हुए एसआईआर के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रक्रिया में सुधार के कई निर्देश दिए। अब 12 राज्यों में जारी एसआईआर में उन उपायों को लागू किया गया है। इससे बीएलओज पर काम का बोझ बढ़ गया है।

मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण (एसआईआर) के बीच कई बूथ लेवल ऑफिसर्स (बीएलओ) की मौत ने पहले से ही विवादित इस प्रक्रिया में नया आयाम जोड़ दिया है। बुधवार को पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले से शांतिमुनी एक्का नाम की एक बीएलओ के आत्महत्या करने की खबर आई। इसके बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि एसआईआर कार्य के दौरान अब तक 28 लोगों की जान जा चुकी है। उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसा “काम के अत्यधिक दबाव, भय एवं अनिश्चितता” के कारण हुआ है और इसके लिए निर्वाचन आयोग जिम्मेदार है, जिसने “अनियोजित” ढंग से यह काम थोप दिया। इसके पहले केरल और राजस्थान से भी एक-एक बीएलओ की मृत्यु की खबर आ चुकी है।

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक बिहार में हुए एसआईआर के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रक्रिया में सुधार के कई निर्देश दिए। अब 12 राज्यों में जारी एसआईआर में उन उपायों को लागू किया गया है। इससे बीएलओज पर सत्यापन तथा उसके बाद डेटा को डिजिटल करने का बोझ बढ़ गया है। दूर-दराज के इलाकों में नेटवर्क की कमजोरी तथा गरीबों की बस्तियों में दस्तावेजों की जांच यातनादायक प्रक्रिया बन गई है। इन सभी कार्यों के लिए समयसीमा तय है। मगर व्यावहारिक दिक्कतों के कारण इसे पूरा करना कई जगहों पर मुश्किल साबित हुआ है। एक रिपोर्ट के मुताबिक एसआईआर के पहले चरण का आधा समय पूरा होने के बावजूद बुधवार तक सिर्फ 16 प्रतिशत फॉर्म्स को डिजिटल किया जा सका।

उत्तर प्रदेश में तो यह संख्या चार प्रतिशत भी कम थी। इसलिए इस आरोप में दम है कि निर्वाचन आयोग ने व्यावहारिक नजरिया नहीं अपनाया। उसने जल्दबाजी में और बिना सभी पक्षों को भरोसे में लिए यह महति कार्य शुरू कर दिया। ममता बनर्जी ने कहा है कि ‘पहले जिस प्रक्रिया को पूरा करने में तीन साल लगे थे, अब चुनाव से ठीक पहले राजनीतिक आकाओं को खुश करने के लिए आयोग ने बीएलओज पर अमानवीय बोझ डाल दिया है।’ मुमकिन है कि इस बयान को राजनीति से प्रेरित माना जाए। मगर निर्वाचन आयोग ने व्यावहारिक दृष्टि नहीं अपनाई, यह धारणा मजबूत होती जा रही है।


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