ब्राजील, चीन, रूस और दक्षिण अफ्रीका के अलावा बाकी लगभग सभी देशों ने अमेरिकी टैरिफ वॉर की सीधी आलोचना से बचने की कोशिश की। ब्रिक्स+ की यही समस्या है। इसमें अधिकांश ऐसे देश शामिल हैं, जो दोनों ओर पांव रखना चाहते हैँ।
ब्रिक्स+ में अमेरिका के टैरिफ वॉर को लेकर नाराजगी है, लेकिन यह भी साफ है कि इसके मुकाबले की कोई ठोस रणनीति वह नहीं बना पाया है। ब्रिक्स+ के मौजूदा अध्यक्ष ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा की पहल पर इस समूह का ऑनलाइन शिखर सम्मेलन हुआ। उसमें नेताओं ने ब्रिक्स समूह के सदस्य देशों के बीच व्यापार संबंध और मजबूत करने का इरादा दिखाया। उन्होंने मुक्त व्यापार और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक एवं व्यापार व्यवस्थाओं की रक्षा का संकल्प जताया। मगर ऐसा वे कैसे करेंगे, यह बैठक के बाद दी गई जानकारियों से जाहिर नहीं हुआ है।
लूला ने यह जरूर कहा कि ब्रिक्स+ दुनिया की लगभग आधी आबादी और 40 प्रतिशत अर्थव्यवस्था की नुमाइंदगी करता है। ये देश आपसी सहयोग से टैरिफ दादागीरी का मुकाबला कर सकते हैँ। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इल्जाम लगाया कि “कुछ देश” व्यापार और टैरिफ युद्ध छेड़ कर विश्व अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रहार कर रहे हैं। चूंकि भारत और अमेरिका के बीच फिर से मेल-मिलाप की चर्चाएं जोर पकड़ गई हैं, तो विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने सम्मेलन में निराकार किस्म की बातें कहीं, जिनका कोई ठोस अर्थ नहीं होता। जाहिर है, भारत ऐसी बातें कहने से गुरेज कर रहा है, जो अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप को नागवार लग सकती हैँ।
गौरतलब है कि सिर्फ भारत और इथोपिया ही ऐसे देश रहे, जिनके सरकार प्रमुखों ने ऑनलाइन सम्मेलन में भागीदारी नहीं की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस निर्णय में भी उपरोक्त संकेत ही देखा गया है। इस खबर पर भी ध्यान दिया गया है कि शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के तियानजिन शिखर सम्मेलन में जारी घोषणापत्र पर सहमत होने के बाद भारत ने स्पटीकरण दिया है कि एससीओ बैंक के गठन के प्रस्ताव का अभी वह अध्ययन कर रहा है। वैसे ब्रिक्स+ की चर्चा में ब्राजील, चीन, रूस और दक्षिण अफ्रीका के अलावा बाकी लगभग सभी देशों ने अमेरिकी टैरिफ वॉर की सीधी आलोचना से बचने की कोशिश की। ब्रिक्स+ की यही समस्या है। इसमें अधिकांश ऐसे देश शामिल हैं, जो दोनों ओर पांव रखना चाहते हैँ। ऑनलाइन सम्मेलन में फिर यही जाहिर हुआ।
