बात है मुद्दे की

बिहार में जारी अंतिम मतदाता सूची में ज्यादा खामियां नहीं हैं, तो अब ‘वोट चोरी’ के मुद्दे पर विराम लग जाएगा। वैसे भी यह मुद्दा विपक्षी कार्यकर्ताओं को जितना गोलबंद कर पाया, आम मतदाताओं पर इसका उतना असर नहीं दिखा था। बिहार में विशेष पुनरीक्षण (एसआईआर) पूरा होने के बाद अंतिम मतदाता सूची को जारी… Continue reading बात है मुद्दे की

इनसे छीनो, उनको दो!

हाल के वर्षों में बिजली की किल्लत घटी है और अच्छी सड़कें बनी हैं। मगर बिजली सस्ती नहीं हुई है और टोल-टैक्स से सड़क परिवहन महंगा बना हुआ है। ये सभी लागतें आखिरकार उत्पाद की कीमत में ही शामिल होती हैं। महाराष्ट्र सरकार ने व्यापारिक और औद्योगिक उपभोक्ताओं के लिए बिजली पर अतिरिक्त कर को… Continue reading इनसे छीनो, उनको दो!

मूल बात ही गायब

ट्रंप की शांति योजना में दो राज्य सिद्धांत के तहत अलग फिलस्तीन की स्थापना का कोई प्रावधान नहीं है, जबकि यह फॉर्मूला खुद अमेरिकी मध्यस्थता में तत्कालीन इजराइल सरकार और फिलस्तीनी मुक्ति संगठन ने स्वीकार किया था। अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने फिलस्तीन के लिए जो कथित शांति योजना पेश की है, उससे इस मसले… Continue reading मूल बात ही गायब

बिगड़ती जा रही बात

लद्दाख में असंतोष गहराना भारत के लिए नई चुनौतियां पैदा कर सकता है। भारत सरकार को वहां वैसा एकतरफा रुख नहीं अपनाना चाहिए, जैसा वह अन्य जन समूहों के आंदोलनों के समय अपनाती रही है। उसे लद्दाख की बात सुननी चाहिए। लद्दाख के संगठन- एपेक्स बॉडी लेह (एबीएल) का केंद्र के साथ बातचीत से हटना… Continue reading बिगड़ती जा रही बात

बलि चढ़ता भविष्य

तेजस्वी नीतीश की घोषणाओं की आलोचना कर रहे हैं। मगर बात वोट खरीदने की हो, तो जुबानी शाहखर्ची में वे भी कोताही नहीं बरतते। और यह कहानी देश भर की है। इस होड़ में जनता के भविष्य की बलि चढ़ रही है। बिहार में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले जिन 75 लाख परिवारों के पास… Continue reading बलि चढ़ता भविष्य

ऐसे भी क्या खेलना!

यूएई में हुआ एशिया कप क्रिकेट टूर्नामेंट खेल से इतर बातों के लिए ज्यादा याद रखा जाएगा। यहां भारतीय खिलाड़ियों के कंधों पर अपनी सरकार और क्रिकेट बोर्ड की डगमगाहट को संभालने का बोझ भी डाल दिया गया था। एशिया कप में भारतीय क्रिकेट टीम आरंभ से अंत तक चैंपियन की तरह खेली। जिस टूर्नामेंट… Continue reading ऐसे भी क्या खेलना!

धन किसका, कर्ज कहां?

आबादी का छोटा-सा जो हिस्सा वित्तीय अर्थव्यवस्था से जुड़ा है, उसकी चमक बढ़ी है। मगर विषमता इतनी तेजी से बढ़ी है कि वित्तीय सेवाएं देने वाली जर्मन मूल की बहुराष्ट्रीय कंपनी- एलायंज ग्रुप- ने भी चेतावनी दी है। पहले खबर का अच्छा पहलूः 2024 में भारतीय घरों की औसत आमदनी बढ़ने की रफ्तार और तेज… Continue reading धन किसका, कर्ज कहां?

आंशिक, लेकिन सही दिशा

हालिया कदमों के बावजूद आयोग के सामने साख संबंधी कई चुनौतियां हैँ। उसे ये धारणा तोड़नी होगी कि चुनाव कार्यक्रम एक दल विशेष की सुविधा से तय होता है और आदर्श आचार संहिता लागू करने में आयोग भेदभाव करता है। आखिरकार निर्वाचन आयोग को आभास हुआ है कि उसकी साख पर देश में गंभीर सवाल… Continue reading आंशिक, लेकिन सही दिशा

हर प्रतिरोध नाजायज है?

यह समझने की जरूरत है कि मांगों पर तत्परता से ध्यान ना देने अथवा अनंत और ऊबाऊ वार्ताओं से लोगों का असंतोष आक्रोश में बदलता है। उससे गतिरोध की स्थिति बनती है, जो अमन-चैन के लिए ठीक नहीं है। केंद्र ने लेह में हुई हिंसा की सारी जिम्मेदारी सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक पर डाल दी… Continue reading हर प्रतिरोध नाजायज है?

मुद्दे की तलाश में

वोट चोरी गंभीर आरोप है, मगर इससे विपक्षी दल, उनके कार्यकर्ता और मध्य वर्ग के कुछ हिस्से जितना उत्तेजित हुए हैं, उतना आम जन के स्तर पर नहीं हुआ है। आम जन को ऐसे मुद्दे दूर से ही छू पाते हैं। राहुल गांधी ने अब कहा है कि भारत के युवाओं की सबसे बड़ी समस्या… Continue reading मुद्दे की तलाश में

logo