नेताओं की बदजुबानी का सभी तरफ असर

लोकतंत्र में असहमति आवश्यक है, लेकिन असंसदीय भाषा उसकी आत्मा को चोट पहुंचाती है। अगर हम एक मजबूत भारत चाहते हैं, तो राजनीतिक बयानों व भाषणों को सभ्य बनाना होगा। नेता याद रखें कि वे जनता के सेवक हैं, न कि शासक। नागरिक, कार्यकर्ता और मीडिया सब मिलकर इस प्रवृत्ति को रोक सकते हैं। तभी… Continue reading नेताओं की बदजुबानी का सभी तरफ असर

संघ और भाजपा में क्या है संबंध?

सभी  बातों की बारीकियों को समझे बगैर न तो आरएसएस को समझा जा सकता है, न भारतीय जनता पार्टी को समझा जा सकता है और न दोनों संगठनों के संबंधों को समझा जा सकता है। बहुत अच्छा संयोग है जो संघ प्रमुख ने भी अपने व्याख्यानों से भ्रांतियों को दूर करने का प्रयास किया है… Continue reading संघ और भाजपा में क्या है संबंध?

मोदी सरकार, ब्रिक्स+ और श्रमिक नजरिया

ब्रिक्स+ बदलाव का एक प्रतीक है। इसलिए इसके महत्त्व को कम-से-कम श्रमिक वर्ग को अवश्य समझना चाहिए। … भारत सरकार इस मामले में जो भी रुख अपनाए, भारत के मेहनतकश तबकों को इसके महत्त्व को अवश्य समझना चाहिए। भारत सरकार ब्रिक्स+ के महत्त्व के मुताबिक इसके शिखर सम्मेलन को अहमियत दे, इसके लिए उन्हें दबाव… Continue reading मोदी सरकार, ब्रिक्स+ और श्रमिक नजरिया

क्यों बहुसंख्यक संकोच में रहे?

असल मुद्दा सांस्कृतिक आत्मविश्वास और सभ्यतागत आत्मबोध का है। जब बहुसंख्यक समाज का एक वर्ग अपने ही मजहबी-सांस्कृतिक प्रतीकों को सार्वजनिक रूप से व्यक्त करने में संकोच करता है, तो इसकी जड़े उस मानसिक औपनिवेशवाद में मिलती है, जिसमें अपनी पहचान, संस्कृति और परंपरा के प्रति उदासीनता और हीन-भावना रखने का चिंतन होता है। सच्चा… Continue reading क्यों बहुसंख्यक संकोच में रहे?

वक़्त की छटपटाहट है ‘इक्कीस’

‘इक्कीस’ कई स्तरों पर काम करती है। एक स्तर पर यह साहस और कर्तव्य की कहानी है; दूसरे स्तर पर यह उम्र और ज़िम्मेदारी के असंतुलन की पड़ताल करती है। फ़िल्म यह सवाल उठाती है कि वीरता क्या है, क्या वह डर का न होना है, या डर के बावजूद आगे बढ़ना? यहां वीरता किसी… Continue reading वक़्त की छटपटाहट है ‘इक्कीस’

राजतंत्र के फ़र्ज़ी जनतंत्र का मुख-श्रंगार

मुद्दआ तो यह है कि सब जानते हैं कि मुद्दआ क्या है, मगर सब यह पूछने से पिंड छुड़ाते भाग रहे हैं कि मुद्दआ क्या है? जब तक हम सवालों का सामना नहीं करते, तब तक हर 365 दिनों बाद एक नया बरस आएगा, हर 365 दिनों बाद एक पुराना बरस जाएगा और हम अपने… Continue reading राजतंत्र के फ़र्ज़ी जनतंत्र का मुख-श्रंगार

नए साल का संदेशः हौसला नहीं छोड़ना !

नया साल उत्साह भरता है। पर देखे नए साल का भी ….कोई पाइंट ऐसा नहीं होना चाहिए जहां से आप आगे बढ़ सकें। हर चीज में शक पैदा कर दो उसे अस्वीकार्य घोषित कर दो ताकि सिर्फ ढलान ही ढलान बचे। अब कविता बना रहे है कि  ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं। हिम्मत होती… Continue reading नए साल का संदेशः हौसला नहीं छोड़ना !

भारत की संभावनाओं की कुंजी

भारत को ऐसी सोच चाहिए जो व्यक्ति को केवल डेटा बिंदु नहीं, एक स्वायत्त, समझदार, गरिमामय नागरिक माने। एक ऐसी लोकतांत्रिक सोच जो यह माने कि प्रगति केवल आंकड़ों से नहीं, आशाओं और अवसरों से भी मापी जाती है। क्यों शिक्षा और तकनीक को नेतृत्व करना चाहिए? प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एजाज़ ग़नी (मेरे जेएनयू के मित्र… Continue reading भारत की संभावनाओं की कुंजी

धार्मिक पर्यटन से तीर्थ शहरों को मुश्किले

धार्मिक नगरीय संतुलन को डगमगा दिया है। छोटे नगरों की सीमित सड़कों, आवासों और संसाधनों पर अचानक लाखों की भीड़ का दबाव प्रशासन के लिए बड़ा सिरदर्द बन गया है। पर्यावरणीय दबाव, कचरा प्रबंधन और जल संकट जैसी समस्याएँ अब इन नगरों के स्थायी साथी बन चुके हैं। उल्लेखनीय है कि भारत में भीड़ प्रबंधन… Continue reading धार्मिक पर्यटन से तीर्थ शहरों को मुश्किले

क्रिसमस, आतंकवाद और बेबस यूरोप

आखिर भय का माहौल कौन बना रहा है? फ्रांसीसी मीडिया में मैनहैटन इंस्टीट्यूट के आप्रवासन सदस्य डैनियल डी मार्टिनो के हवाले से कहा गया है, “स्पष्ट है कि यह यूरोप में बिना समुचित जांच के बड़े पैमाने पर मुस्लिम प्रवासन का परिणाम है।” यह घटनाक्रम एक ऐसे गहरे संकट को उजागर करता है, जिसमें तथाकथित… Continue reading क्रिसमस, आतंकवाद और बेबस यूरोप

logo