भाषा ही यह तय करती है कि क्या सोचा जा सकता है और क्या किया जा सकता है, और जब भाषा से संकोच हटता है तो कल्पना भी सीमाएँ तोड़ देती है, और किसी देश या सभ्यता को मिटा देने की बात केवल बयान नहीं रहती, वह एक तरह की अनुमति बन जाती है।।। आज… Continue reading सभ्यता ध्वंस की भाषा, लोकतंत्र की परीक्षा
