सभ्यता ध्वंस की भाषा, लोकतंत्र की परीक्षा

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भाषा ही यह तय करती है कि क्या सोचा जा सकता है और क्या किया जा सकता है, और जब भाषा से संकोच हटता है तो कल्पना भी सीमाएँ तोड़ देती है, और किसी देश या सभ्यता को मिटा देने की बात केवल बयान नहीं रहती, वह एक तरह की अनुमति बन जाती है।।। आज अमेरिका अपने ही दो रूपों के बीच खड़ा है, एक जो सीमाओं को पहचानता है, और दूसरा जो खुलकर शक्ति की भाषा बोलता है।

एक समय था जब किसी देश को “पाषाण युग में भेज देने” जैसी धमकियाँ युद्ध कक्षों की सीमित भाषा में रहती थीं, गुस्से में कही जाती थीं और फिर शासन की मर्यादाओं में दबा दी जाती थीं, पर आज वही भाषा खुले मंच पर है, कही जाती है, दोहराई जाती है, टीवी पर चलती है और धीरे-धीरे सामान्य बना दी जाती है

और समस्या सिर्फ शब्दों की नहीं, बल्कि उस पूरे माहौल की है जो उन्हें स्वीकार करता है, क्योंकि जब इतनी बड़ी धमकी सार्वजनिक चर्चा में आती है तो संस्थाएँ उसे रोकने के बजाय विश्लेषण में बदल देती हैं, पैनल बैठते हैं, एंकर सवाल करते हैं, और मुद्दा नैतिकता से हटकर तुलना में बदल जाता है कि क्या यह पहले से ज्यादा खतरनाक है, क्या यह पहले की नीतियों से अलग है, और इसी प्रक्रिया में विनाश चर्चा का विषय बन जाता है, जबकि असल सवाल यह था कि क्या यह स्वीकार्य है ही या नहीं।

आज की स्थिति को नया कहना गलत होगा, क्योंकि यह दरअसल पुरानी शक्ति का खुला प्रदर्शन है, अमेरिका के पास लंबे समय से आर्थिक, सैन्य और तकनीकी विनाश की क्षमता रही है, फर्क सिर्फ इतना आया है कि अब उसे छिपाया नहीं जा रहा, पहले “रोकथाम” या “क्षमता कम करना” जैसे शब्द इस्तेमाल होते थे, अब सीधे “समाप्त कर देना” कहा जाता है!

और यह बदलाव मामूली नहीं है, क्योंकि भाषा ही यह तय करती है कि क्या सोचा जा सकता है और क्या किया जा सकता है, और जब भाषा से संकोच हटता है तो कल्पना भी सीमाएँ तोड़ देती है, और किसी देश या सभ्यता को मिटा देने की बात केवल बयान नहीं रहती, वह एक तरह की अनुमति बन जाती है।

फिर भी इसे किसी एक नेता या एक घटना की गलती मानना आसान तो है, पर अधूरा है, क्योंकि “शॉक एंड ऑ” से लेकर ड्रोन हमलों और आर्थिक प्रतिबंधों तक, अमेरिका की नीति में शक्ति हमेशा केंद्र में रही है, भाषा बदलती रही, कभी सख्त, कभी नरम, कभी भावनात्मक, पर ढांचा वही रहा, पहले शक्ति और बाद में सिद्धांत, और अब जो बदला है वह केवल यह है कि शक्ति खुले में बोली जा रही है, बिना परदे के, बिना संकोच के, और यही बदलाव इसे अधिक निर्णायक बनाता है।

भाषा केवल शक्ति का वर्णन नहीं करती, वह उसे वैधता भी देती है, और जब सामूहिक विनाश की बातें सामान्य चर्चा का हिस्सा बन जाती हैं, जब उन्हें रोका नहीं जाता बल्कि तौला जाता है, तो अस्वीकार्य भी बहस का विषय बन जाता है, और धीरे-धीरे वही बहस स्वीकार्यता की ओर बढ़ने लगती है, और यहीं वह बिंदु है जहाँ नैतिकता कमजोर पड़ती है, क्योंकि नुकसान होने पर नहीं, बल्कि जब नुकसान को सामान्य चर्चा में बदल दिया जाता है, तब व्यवस्था अपनी सीमाएँ खोने लगती है।

ऐसी भाषा दुनिया को दो हिस्सों में बाँट देती है, प्रभुत्व या विनाश, और ऐसे माहौल में संयम कमजोरी लगता है, और कमजोरी दोष बन जाती है, और यहीं से राजनीति, यहाँ तक कि लोकतांत्रिक राजनीति भी, युद्ध जैसी दिखाई देने लगती है, क्योंकि निर्णय अब संतुलन से नहीं, बल्कि शक्ति के प्रदर्शन से तय होने लगते हैं।

अमेरिकी बौद्धिक व्यवस्था ने असुविधा को संभालने की एक खास क्षमता विकसित कर ली है, विशेषज्ञ हर बात को संदर्भ में रखते हैं, इतिहास से जोड़ते हैं, ढांचे बनाते हैं ताकि हर बयान समझ में आ सके, यह गंभीर सोच की ताकत है, पर यही उसकी सीमा भी है, क्योंकि जब हर नैतिक झटके को तुरंत समझा दिया जाता है, तो उसका प्रभाव खत्म हो जाता है, आलोचना दबती नहीं, बल्कि समाहित हो जाती है, और धीरे-धीरे चेतावनी देने की क्षमता ही कमजोर पड़ जाती है, और वर्तमान को अतीत से तौला जाता है, सिद्धांत से नहीं।

इस पूरी चर्चा में वे लोग खो जाते हैं जो इन फैसलों का असर झेलते हैं, क्योंकि किसी देश को पाषाण युग में भेजने का अर्थ केवल सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि अस्पतालों में बिजली का खत्म होना, शहरों में पानी का रुकना, और एक पूरी पीढ़ी का भविष्य खो जाना है, और यह कल्पना नहीं, बल्कि आधुनिक युद्ध का वास्तविक इतिहास है, इराक, सीरिया और यमन इसके उदाहरण हैं, जहाँ व्यवस्थाओं का विनाश सेनाओं की हार से अधिक महत्वपूर्ण रहा है।

फिर भी नीति की भाषा में यह सब किनारे पर रहता है, “सहायक क्षति” जैसे शब्द नुकसान को सामान्य बना देते हैं, और यह केवल वर्णन नहीं, बल्कि एक संरचना है, जिसमें कुछ पीड़ा पर शोक होता है और कुछ को गणना में बदल दिया जाता है, और फर्क पीड़ा में नहीं, बल्कि उसकी कहानी में होता है।

अमेरिकी विदेश नीति में मानवाधिकार अनुपस्थित नहीं हैं, पर वे समान रूप से लागू नहीं होते, विरोधियों की गलतियाँ उजागर की जाती हैं, सहयोगियों की गलतियाँ नरम शब्दों में स्वीकार कर रणनीति के नीचे रख दी जाती हैं, और यह साधारण पाखंड नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित तरीका है, जिसमें नैतिकता का उपयोग चयन के आधार पर किया जाता है।

अमेरिका की विशेषता यह है कि वह अपने हित को मानवता के हित के रूप में प्रस्तुत करता है, और जब यह दावा टूटता है, तो असर केवल छवि का नहीं, बल्कि संरचना का होता है, और दूसरे देश इसे देखते हैं, सीखते हैं और वही तरीका अपनाते हैं, और परिणाम यह होता है कि नियम समाप्त नहीं होते, बल्कि हथियार बन जाते हैं, और मानवाधिकार सिद्धांत नहीं रह जाते, बल्कि तर्क बन जाते हैं।

इसे किसी एक व्यक्ति की विफलता मानना आसान है, पर यह एक व्यवस्था की सफलता है, जिसमें संसद, प्रशासन, मीडिया और बौद्धिक वर्ग मिलकर एक स्थायी सोच बनाते हैं, बहस होती है पर सीमाओं के भीतर, मान्यताएँ नहीं बदलतीं कि शक्ति आवश्यक है और उसकी गलतियाँ भी स्वीकार्य हैं, और इस ढांचे में आलोचना सुधार करती है, पर टूटन नहीं लाती।

यदि दुनिया को एक नया संतुलन चाहिए, तो उसे कुछ स्पष्ट निर्णय लेने होंगे, विनाश की भाषा को नीति मानने से इनकार, नैतिकता को तुलना में बदलने से इनकार, और यह मानने से इनकार कि पीड़ा को पहचान के आधार पर बाँटा जाए, मीडिया को यह कहने का साहस होना चाहिए कि क्या गलत है, विशेषज्ञों को संदर्भ से पहले निर्णय देना होगा, और नेताओं को संयम को फिर से मूल्य बनाना होगा।

आज अमेरिका अपने ही दो रूपों के बीच खड़ा है, एक जो सीमाओं को पहचानता है, और दूसरा जो खुलकर शक्ति की भाषा बोलता है, और यह निर्णय एक दिन में नहीं होगा, यह धीरे-धीरे होगा, शब्दों से, चुप्पियों से और उन सीमाओं से जो पार की जाती हैं और फिर भुला दी जाती हैं।

आज फर्क यह नहीं कि सीमाएँ नई हैं, फर्क यह है कि अब उन्हें छिपाकर नहीं, बल्कि खुले में पार किया जा रहा है, और जब कोई लोकतंत्र अपनी शक्ति के बारे में धीरे बोलना छोड़ देता है, तो उसका स्वर ही नहीं, उसका स्वभाव भी बदल जाता है, क्योंकि धीरे बोलना मासूमियत नहीं था, बल्कि यह स्वीकार था कि कुछ बातें धीमे कहने योग्य होती हैं, और अब वह संकोच समाप्त हो गया है, अब केवल शक्ति बची है, बिना आड़ के, और जब शक्ति स्वयं अपनी कहानी लिखने लगती है, तो वह केवल फैलती नहीं, बल्कि कठोर हो जाती है, और जो कठोर हो जाता है, उसे अंततः किसी सफाई की आवश्यकता नहीं रह जाती।


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