चाय से भी ज़्यादा गर्म केतलियों का युग

Categorized as लेख

एक असम को छोड़ कर विधानसभा के इन चुनावों में कहीं और भाजपा के लिए कहीं भी मद्धम-सी भी लौ टिमटिमाती हुई अगर किसी को दिखाई दे रही हो तो मैं उस की परम आशावादिता को अभिनंदनीय मानता हूं। इसलिए पांच राज्यों के मतदान तक भाजपा के चेहरे से टपकते नूर को देखते रहिए और असली नतीजों का इंतज़ार कीजिए।

जैसा कि हर चुनाव के पहले होता है, भारतीय जनता पार्टी, उस का समूचा पर्यावास तंत्र और उस का समर्थक-समर्थित मीडिया शुरू से ही यह माहौल बनाने लगता है कि हर जगह भाजपा भारी बहुमत से जीत रही है और विपक्ष बुरी तरह हार रहा है – इस बार भी पांच प्रदेशों के चुनावों को ले कर ऐसा ही परिदृश्य बनाने की शुरुआत हो गई है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तमाम आनुषागिक संगठनों ने भाजपा के साथ मिल कर मीडिया के एक बड़े वर्ग के ज़रिए ज़ोर-शोर से यह बिगुल बजवाना आरंभ कर दिया है कि पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में विपक्षी दलों की हालत खराब होने वाली है और हर राज्य में भाजपा को ऐसी कामयाबी हासिल होगी कि लोग अपनी उंगलियां दांतों तले दबा लेंगे।

इस गोयबल्सी-प्रचार का सब से बड़ा निशाना पश्चिम बंगाल है। ममता बनर्जी की उन के गढ़ भवानीपुर में बहुत बड़ी हार के नगाड़े टेलीविजन के परदों पर और अख़बारों के पन्नों पर सूत्रधारों और संवाददाताओं ने बजाने शुरू कर दिए हैं। पश्चिम बंगाल में मतदान 23 और 29 अप्रैल को होगा। नामांकन 2 अप्रैल से दाखिल होने शुरू होंगे और राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों की असली स्थिति 13 अप्रैल को नाम वापसी की अंतिम तारीख बीत जाने के बाद ही सामने आएगी। लेकिन नरेंद्र भाई मोदी की चाय से भी ज़्यादा गर्म मीडिया-केतलियां अभी से यह घोषित करने में जुट गई हैं कि तृणमूल कांग्रेस की अलविदाई और भाजपा की ताजपोशी अब बस औपचारिकता है।

पश्चिम बंगाल में भाजपा के पास इस वक़्त 77 सीटें हैं। विधानसभा में बहुमत के लिए उसे 148 विधायक चाहिए। उसे लग रहा है कि एक-सवा करोड़ नाम मतदाता सूची से कट जाने के बाद उस की जीत का रास्ता एकदम हरा-भरा हो गया है। भाजपा को यह ख़ामख़्याली भी है कि पहली बार मतदाता बने क़रीब सवा पांच लाख युवा तो उसे ही झूमझूम कर वोट देंगे। लेकिन भाजपा को यह अहसास नहीं है कि तृणमूल कांग्रेस से रस्साकशी को अपने पक्ष में कर लेना उस के लिए इसलिए आसान नहीं होगा कि 2021 के चुनाव में ममता को साढ़े 48 प्रतिशत वोट मिले थे और भाजपा को साढ़े 38 प्रतिशत। दस प्रतिशत का यह फ़र्क़ पाटना आसान नहीं है। क़रीब एक साल पहले हुए लोकसभा के चुनाव में भी तृणमूल कांग्रेस को सवा 46 प्रतिषत वोट मिले हैं। यानी उस की लोकप्रियता में ऐसी कोई गिरावट नहीं आई है कि भाजपा की सीटें इस बार पिछले चुनाव की तुलना में दुगनी हो जाएं।

हां, असम में दोबारा जीत को ले कर भाजपा अगर आश्वस्त दिखाई दे रही है तो इस के पीछे के तर्क मैं समझ सकता हूं। वहां 9 अप्रैल को मतदान है और अलग-अलग राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों के चेहरे अब सामने हैं। बावजूद इस के कि प्रियंका गांधी ने असम में अपनी तरफ से कोई कसर बाकी नहीं रखी, कांग्रेस के ज़मीनी हालात थोड़े पिलपिले हैं। चुनाव के ऐन पहले कांग्रेस छोड़ गए कुछ बड़े नेताओं की वजह से कांग्रेसी मनोबल पर प्रतिकूल असर पड़ा है। मगर यह भी एक तथ्य है कि पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के बीच सिर्फ़ साढ़े तीन प्रतिशत वोट का फ़र्क़ था। 2024 के लोकसभा चुनाव में तो कांग्रेस और भाजपा का वोट प्रतिशत एकदम बराबर था। दोनों को 38-38 प्रतिशत वोट मिले थे। इसलिए ज़रूरी नहीं कि असम का सियासी हाथी अपनी मस्त चाल से इस बार भी भाजपा की तरफ ही चले।

तमिलनाडु को ले कर भी भाजपा ज़रूरत से ज़्यादा उत्साही दिखाई दे रही है। वहां 23 अप्रैल को मतदान होगा। 4 मई को चुनाव नतीजे आते वक़्त भाजपा का उछाह पूरी तरह हताशा में बदल चुका होगा। द्रमुक-कांग्रेस विरोधी ताक़तों का जिताऊ समीकरण बैठाने की कोशिशें भाजपा ने भले ही कितनी भी कीं, उन का कोई सार्थक नतीजा नहीं निकल पाया। तमिलनाडु की मतदाता सूची से 60 लाख नाम कटे हैं। सो, भाजपा को लगता है कि इस बार वह ख़ुद की नींव में एकाध ईंट शायद लगा ले। कांग्रेस के चंद नौनिहालों द्वारा दिए गए तरह-तरह के बयानों से बिदके द्रमुक के कारण भी भाजपा की बांछें ज़रा खिली हुई हैं। लेकिन द्रमुक के 38 प्रतिशत मतों में सेंध लगाने की स्थिति में भाजपा फ़िलहाल तो नहीं है। पहली बार मतदाता बने जिन साढ़ 12 लाख युवाओं पर आस लगा कर वह चल रही है, वे हैं तो आख़िर द्रविण। इसलिए गौ-पट्टी की भाजपा को उन से निराशा ही हाथ लगेगी।

केरल में भाजपा तिरुअनंतपुरम नगर निगम के चुनाव नतीजों आने के बाद से अपने पैरों में घुंघरू बांधे घूम रही है। मगर बेहद स्थानीय कारणों से एक नगर निगम की सत्ता हासिल कर लेना अलग बात है और भाजपा से एकदम विलोम स्वभाव वाले समूचे केरल पर झंडा लहराना एकदम अलग बात। 140 सदस्यों वाली केरल विधानसभा में पिछली बार मार्क्सवादी पार्टी को 62, कम्युनिस्ट पार्टी को 17 और कांग्रेस को 21 सीटें मिली थीं। तीनों को मिला कर सवा 58 प्रतिशत वोट मिले थे। केरल के मिजाज़ में ऐसा कोई फ़र्क़ दिखाई नहीं दे रहा है कि वहां इस बार कोई आमूलचूल परिवर्तन हो जाए।

पुडुचेरी की सियासत पिछले कुछ वक़्त से ‘गंगा गए तो गंगाराम और जमुना गए तो जमुनादास’ की राह पर चल पड़ी है। वहां की मतदाता सूची से भी 60 हज़ार नाम कटे हैं। कुल तक़रीबन साढ़े नौ लाख मतदाताओं वाले प्रदेश के लिए इस के असर को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है। पिछले विधानसभा चुनाव में 60 फ़ीसदी वोट मूलत़ः भाजपा विरोधी राजनीतिक दलों को मिले थे। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी पुडुचेरी की एकमात्र सीट पर कांग्रेस जीती थी और उसे साढ़े 53 प्रतिशत वोट मिले थे। यह ज़मीनी गणित भाजपा के पक्ष में तो नहीं है, मगर सब कुछ किनारे इस से लगेगा कि इस बार के चुनाव नतीजे गंगा की धार ले कर आते हैं या जमुना का धारा।

एक असम को छोड़ कर विधानसभा के इन चुनावों में कहीं और भाजपा के लिए कहीं भी मद्धम-सी भी लौ टिमटिमाती हुई अगर किसी को दिखाई दे रही हो तो मैं उस की परम आशावादिता को अभिनंदनीय मानता हूं। बावजूद इस के कि नरेंद्र भाई मोदी और अमित भाई शाह भी इस धरातली यथार्थ से अच्छी तरह वाकिफ़ होंगे ही, मत-कुरुक्षेत्र में ज़ुमलों के घोड़े को पूरी मुस्तैदी से ऐड़ लगाने के उन के घुड़सवारी-कौशल की भी मैं दाद देता हूं। हम सब ने देखा कि ‘अब की बार, चार सौ पार’ के थोथे चने को उन्होंने कितना घना बजाया था और 169 + 71 = 240 पर रह जाने के बाद भी अपनी मायूसी को किस तरह चंद दिनों में ही झटक दिया था। इसलिए पांच राज्यों के मतदान तक भाजपा के चेहरे से टपकते नूर को देखते रहिए और असली नतीजों का इंतज़ार कीजिए।


Previous News Next News

More News

किसान सम्मान के नाम से ई-20 पेट्रोल बिकेगा

July 30, 2026

भारतीय जनता पार्टी और उसकी केंद्र सरकार के बारे में एक बात माननी होगी। दोनों अपने किसी फैसले को जस्टिफाई करने के लिए कोई भी तर्क खोज सकते हैं। जरूरी नहीं है कि फैसले को जस्टिफाई करने के लिए प्राइमरी तर्क पर ही अड़े रहे हैं। आमतौर पर कोई भी व्यक्ति या सरकार अपने फैसले…

ओवैसी का बिहार वाला दांव यूपी में भी

July 30, 2026

एमआईएम के नेता असदुद्दीन ओवैसी ने बिहार में एक दांव चला था। उन्होंने पिछले साल बिहार विधानसभा चुनाव से पहले लालू प्रसाद और कांग्रेस के सामने प्रस्ताव रखा था कि उनकी पार्टी को गठबंधन में शामिल किया जाए। बिहार के प्रदेश अध्यक्ष अख्तरुल इमान गाजे बाजे के साथ लालू प्रसाद के निवास के बाहर पहुंच…

जस्टिस यशवंत वर्मा की क्या स्थिति है?

July 30, 2026

यह लाख टके का सवाल है कि दिल्ली हाई कोर्ट से इलाहाबाद हाई कोर्ट भेजे गए जस्टिस यशवंत वर्मा की क्या स्थिति है? साथ यह भी सवाल है कि उनके खिलाफ लंबित महाभियोग के मामले की क्या स्थिति है? संसद के सत्र आ रहे हैं और जा रहे हैं। दुनिया भर की दूसरी बातों की…

केरल हारने का कारण खोज लिया सीपीएम ने

July 30, 2026

केरल में लगातार 10 साल राज करने के बाद सीपीएम के नेतृत्व वाला गठबंधन एलडीएफ इस साल मई के चुनाव में हार गया था। उसके बाद से पार्टी में इस बात को लेकर मंथन चल रहा था कि सब कुछ ठीक था तो पार्टी क्यों हारी? इसके लिए पार्टी के बड़े नेताओं के बीच मंथन…

नीलेकणी क्या नीट खत्म करने की सिफारिश करेंगे?

July 30, 2026

इंफोसिस के सह संस्थापक और भारत में आधार क्रांति के सूत्रधार नंदन नीलेकणी के ऊपर केंद्र सरकार ने परीक्षा प्रणाली में सुधार के सुझाव देने का जिम्मा सौंपा है। भारत की अंतरिक्ष एजेंसी इसरो के पूर्व प्रमुख एस सोमनाथ को भी इस उच्चाधिकार प्राप्त कमेटी का सदस्य बनाया गया है। पता नहीं लोगों को याद…

logo