नवरात्रः सात्विकता, आत्मशुद्धि का समय

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देवी भागवत पुराण और मार्कण्डेय पुराण के देवी महात्म्य में इसका विस्तृत वर्णन मिलता है। मान्यता है कि चैत्र नवरात्र में देवी दुर्गा देवताओं की शक्तियों से प्रकट होकर महिषासुर से युद्ध करती हैं। इसी समय शक्ति का पूर्ण रूप प्रकट हुआ और प्रलय के बाद सृष्टि का पुनर्निर्माण हुआ।

चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शुरू होने वाली चैत्र, यानी वासन्तीय नवरात्र, प्रकृति के नए जीवन, ऊर्जा के संचय और आत्मशुद्धि से जुड़ी एक प्राचीन परंपरा है। इसे वासन्तिक नवरात्र इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह वसंत ऋतु के बदलते समय में आता है। इस समय ऋतु परिवर्तन का एक गहरा विज्ञान काम करता है। वैदिक दृष्टि से चैत्र मास शिशिर और वसंत के बीच का संधिकाल होता है। इस बदलाव के समय वातावरण के असर से शरीर और मन की रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित होती है, इसलिए व्रत और संयम के माध्यम से शरीर और मन की शुद्धि की जाती है। प्राचीन मान्यता के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन ही ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना शुरू की थी। इसी दिन से विक्रम संवत का नया वर्ष भी आरंभ होता है, इसलिए यह नई शुरुआत का प्रतीक है। नवरात्र का विस्तृत वर्णन देवी भागवत पुराण में मिलता है, लेकिन इसकी जड़ें वेदों में शक्ति या अदिति की उपासना में हैं, जिन्हें देवताओं की माता माना गया है। वैदिक विचार में इसे निर्गुण परम तत्व से सगुण सृजन शक्ति की ओर जाने की प्रक्रिया माना गया है। त्रेतायुग में भगवान श्रीराम का जन्म चैत्र नवरात्र की नवमी को हुआ, इसलिए इसे राम नवरात्र भी कहा जाता है।

प्राचीन ग्रंथ बताते हैं कि ये नौ रातें भक्ति, आत्मशुद्धि और आत्मबोध का समय हैं, जब साधक बाहरी दुनिया से हटकर अपने भीतर लौटता है। वासन्तीय नवरात्र में कलश स्थापना को ब्रह्मांड और शक्ति के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। ऋग्वेद में कलश को पूर्णता और जीवन के स्रोत का प्रतीक माना गया है। वैदिक परंपरा के अनुसार कलश के अलग-अलग भाग देवताओं का प्रतीक हैं—मुख विष्णु का, कंठ शिव का, मूल ब्रह्मा का और मध्य भाग देवी शक्तियों का। इसे वरुण देव और सभी तीर्थों का निवास भी माना जाता है। पूजा के लिए घर के उत्तर या ईशान कोण में स्थान चुनना चाहिए। जौ, गेहूं जैसे सप्तधान्य मिलाकर शुद्ध मिट्टी की वेदी बनानी चाहिए। तांबे या मिट्टी के कलश पर रोली से स्वास्तिक बनाकर उसमें शुद्ध जल और गंगाजल भरें। उसमें सिक्का, सुपारी, अक्षत, दूर्वा, हल्दी, लौंग और इलायची डालें। ऊपर आम या अशोक के पांच पत्ते रखें और नारियल को लाल कपड़े में लपेटकर उस पर स्थापित करें। पास में अखंड ज्योति या घी का दीपक जलाना चाहिए। पूजन के समय जल भरते हुए तीर्थ आवाहन, वरुण देव आवाहन, भूमि स्पर्श और शक्ति आवाहन मंत्रों का उच्चारण विशेष प्रभावशाली माना गया है।

वासन्तीय नवरात्र की पौराणिक परंपरा शक्ति के प्रकट होने, असुरों के नाश और सृष्टि के संरक्षण से जुड़ी है। देवी भागवत पुराण और मार्कण्डेय पुराण के देवी महात्म्य में इसका विस्तृत वर्णन मिलता है। मान्यता है कि चैत्र नवरात्र में देवी दुर्गा देवताओं की शक्तियों से प्रकट होकर महिषासुर से युद्ध करती हैं। इसी समय शक्ति का पूर्ण रूप प्रकट हुआ और प्रलय के बाद सृष्टि का पुनर्निर्माण हुआ। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार ब्रह्मा ने भी सृष्टि विस्तार के लिए इसी दिन देवी की आराधना की थी। सत्ययुग में चैत्र नवरात्र सबसे प्रमुख थे, जबकि त्रेतायुग में भगवान राम द्वारा शारदीय नवरात्र किए जाने के बाद अश्विन नवरात्र अधिक प्रचलित हो गए।

एक प्रसिद्ध कथा राजा सुरथ और समाधि वैश्य की भी है। जब उन्होंने अपना राज्य और शांति खो दी, तब उन्होंने महर्षि मेधा के आश्रम में चैत्र मास में मिट्टी की प्रतिमा बनाकर देवी की उपासना की और अपना खोया वैभव फिर से पाया। नवरात्र की पूजा पद्धति दुर्गा सप्तशती पर आधारित है, जिसमें देवी के तीन स्वरूप—महाकाली (तमस), महालक्ष्मी (रजस) और महासरस्वती (सत्व)—की उपासना की जाती है। नवदुर्गा के नौ रूप जीवन के अलग-अलग चरणों और शक्तियों का प्रतीक हैं। शैलपुत्री स्थिरता का, ब्रह्मचारिणी तप का, चंद्रघंटा वीरता का, कुष्माण्डा सृजन का, स्कंदमाता ममता का, कात्यायनी शक्ति का, कालरात्रि भय के नाश का, महागौरी शांति का और सिद्धिदात्री सिद्धि का प्रतीक हैं। इनकी पूजा का अर्थ है अपने भीतर के अंधकार को समाप्त कर प्रकाश की ओर बढ़ना।

ज्योतिष के अनुसार वासन्तीय नवरात्र केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण खगोलीय समय भी है। इस समय सूर्य मीन राशि से निकलकर मेष राशि में प्रवेश करता है, जिसे ऊर्जा का बड़ा परिवर्तन माना जाता है। सूर्य आत्मा और जीवन शक्ति का कारक है, इसलिए यह समय आत्मविश्वास और ऊर्जा बढ़ाने वाला होता है। इसी दिन से नया संवत्सर शुरू होता है और ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति पूरे वर्ष का संकेत देती है। चंद्रमा और सूर्य का मिलन नई मानसिक और भौतिक शुरुआत का संकेत देता है। आयुर्वेद और ज्योतिष के अनुसार ऋतु परिवर्तन के समय शरीर में वात, पित्त और कफ का संतुलन बिगड़ सकता है, इसलिए नवरात्र के व्रत शरीर को संतुलित करते हैं। प्रत्येक देवी का संबंध एक ग्रह से माना गया है—शैलपुत्री का चंद्र से, ब्रह्मचारिणी का मंगल से, चंद्रघंटा का शुक्र से, कुष्माण्डा का सूर्य से, स्कंदमाता का बुध से, कात्यायनी का बृहस्पति से, कालरात्रि का शनि से, महागौरी का राहु से और सिद्धिदात्री का केतु से। इनकी पूजा से कुंडली के दोष शांत होते हैं। इस समय कई शुभ योग भी बनते हैं, जैसे सर्वार्थ सिद्धि योग, अमृत सिद्धि योग और पुष्य नक्षत्र, जिनमें किया गया कार्य सफल माना जाता है।


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