नई दिल्ली। मनमाने तरीके से मतदाताओं के नाम काटने और जोड़ने के आरोपों से घिरे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर दो अन्य चुनाव आयुक्तों ने गंभीर आरोप लगाए हैं। अंग्रेजी के अखबार ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने बुधवार, 23 सितंबर को एक खोजी रिपोर्ट के आधार पर दावा किया है कि दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी को बिना बताए आयोग कई बड़े फैसले हुए। रिपोर्ट के मुताबिक दोनों आयुक्तों ने पिछले 10 महीने में 14 बार इसकी शिकायत की है। इतना ही नहीं रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दोनों आयुक्तों ने देश के कैबिनेट सचिव टीवी सोमनाथन से भी इस बात की शिकायत की थी।
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट दो चुनाव आयुक्तों एसएस संधू और विवेक जोशी ने कई फैसले उनकी जानकारी या मंजूरी के बिना किए जाने का दावा किया है। दोनों ने आयोग के फैसलों पर 28 अक्टूबर 2025 से 14 अगस्त 2026 के बीच 14 बार लिखित आपत्ति जताई गईं। इनमें एक 16 अप्रैल का दिन ऐसा था, जिस दिन चार आपत्तियां दर्ज की गईं। इन आपत्तियों की प्रतियां मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भी भेजी गईं।
रिपोर्ट में बताया गया है कि कुछ आपत्तियां उन उप चुनाव आयुक्तों को भी भेजी गईं, जो संबंधित काम की निगरानी कर रहे थे। बताया गया है कि यह विवाद बिहार में जून 2025 में शुरू हुए मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के बाद शुरू हुआ। गौरतलब है कि एसआईआर के तहत 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की मतदाता सूचियों और मसौदा मतदाता सूचियों से अब तक 13 करोड़ से ज्यादा नाम हटाए गए हैं। विपक्ष इस बात को लेकर चुनाव आयोग पर निशाना साधता रहा है।
रिपोर्ट के मुताबिक दोनों चुनाव आयुक्तों एसएस संधू और विवेक जोशी ने नए मतदाताओं का नाम जोड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म छह में किए गए बदलाव पर भी आपत्ति जताई थी। उनका कहना है कि यह बदलाव ‘अवैध और अनधिकृत’ है। उनका दावा है कि मतदाता पंजीयन कानून, 1960 में मनमाने तरीके से बदलाव किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि दोनों चुनाव आयुक्त मानते हैं कि यह बदलाव युवाओं और पहली बार के मतदाताओं को प्रताड़ित करने वाला है।
ऐसे ही रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दोनों चुनाव आयुक्त एक अरब के करीब मतदाताओं की डाटा सुरक्षा को लेकर भी चिंतित थे। उन्होंने चुनाव आयोग की डीजी आईटी सीमा खन्ना को लेकर भी सवाल उठाए थे। उनका दावा है कि जिले के मतदाता पंजीयन अधिकारी यानी ईआरओ को ईसीआईनेट का इस्तेमाल करने से रोका गया। मतदाताओं के नाम जोड़ने या हटाने या उसमें बदलाव करने के काम को केंद्रीकृत किया गया। सब कुछ दिल्ली के हाथ में कर दिया गया, जबकि नाम जोड़ने और हटाने का काम बुनियादी रूप से जिला स्तर पर ईआरओ को ही करना होता है।
