कबूतरी संचार की पुरानी व्यवस्था

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ओडिशा पुलिस की यह सेवा अनूठी है। 1946 में, द्वितीय विश्व युद्ध के ठीक बाद, ओडिशा पुलिस ने इसे शुरू किया। सबसे पहले नक्सल प्रभावित कोरापुट जिले में प्रयोग किया गया। धीरे-धीरे यह 38 स्थानों (जिलों, सब-डिवीजनों, सर्कलों और पुलिस स्टेशनों) तक फैल गई। इस सेवा के चरम पर 19 ‘पिजन लॉफ्ट’ सक्रिय थे, जहां 1500 से अधिक प्रशिक्षित कबूतर तैनात थे।

आज के डिजिटल युग में जहां व्हाट्सएप, वीडियो कॉल, इंटरनेट और सैटेलाइट फोन से पल भर में संदेश दुनिया के किसी भी कोने में पहुंच जाते हैं, वहां एक प्राचीन संचार माध्यम अभी भी जीवित है – ‘कैरियर पिजन सर्विस’। यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं, बल्कि वास्तविकता है। ओडिशा पुलिस की कैरियर पिजन सर्विस दुनिया की एकमात्र ऐसी पुलिस फोर्स है जो इस विरासत को आज भी संरक्षित रखे हुए है। यह सेवा न सिर्फ इतिहास की याद दिलाती है, बल्कि प्राकृतिक आपदाओं में जब आधुनिक संचार व्यवस्था ध्वस्त हो जाती है, तब एक विश्वसनीय बैकअप के रूप में काम आती है। एक ऐसा माध्यम जो हजारों वर्षों से मानव सभ्यता का अभिन्न अंग रहा है।

‘कैरियर पिजन’ या ‘होमिंग पिजन’ का इतिहास प्राचीन काल से जुड़ा है। मिस्र में लगभग 3000 ईसा पूर्व से ही कबूतरों को संदेशवाहक के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। फारस, यूनान और रोमन साम्राज्य में इनकी व्यापक उपयोगिता थी। यूनानियों ने ओलंपिक खेलों के परिणाम इन कबूतरों के जरिए शहर-दर-शहर पहुंचाए। चंगेज खान ने अपने विशाल साम्राज्य में ‘पिजन नेटवर्क’ स्थापित किया। मध्यकाल में यूरोप के युद्धों और मध्य पूर्व के व्यापारियों ने इनका सहारा लिया। भारत में भी यह परंपरा बहुत पुरानी है। चंद्रगुप्त मौर्य के काल में फारसी प्रभाव से ‘पिजन पोस्ट’ शुरू हुई थी। मुगल और ब्रिटिश काल में पुलिस और सेना दोनों ने इसका इस्तेमाल किया। प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध में ‘कैरियर पिजनों’ ने जान भी बचाई,  फ्रांस में ‘चेर आमी’ नामक कबूतर ने 194 अमेरिकी सैनिकों की जान बचाई थी। भारत में भी ब्रिटिश काल से पुलिस स्टेशनों के बीच संचार के लिए ‘पिजन सर्विस’ चली आ रही थी।

लेकिन आज की बात करें तो ओडिशा पुलिस की यह सेवा अनूठी है। 1946 में, द्वितीय विश्व युद्ध के ठीक बाद, ओडिशा पुलिस ने इसे शुरू किया। सबसे पहले नक्सल प्रभावित कोरापुट जिले में प्रयोग किया गया। धीरे-धीरे यह 38 स्थानों (जिलों, सब-डिवीजनों, सर्कलों और पुलिस स्टेशनों) तक फैल गई। इस सेवा के चरम पर 19 ‘पिजन लॉफ्ट’ सक्रिय थे, जहां 1500 से अधिक प्रशिक्षित कबूतर तैनात थे। हर लॉफ्ट पर एक इंस्पेक्टर, तीन सब-इंस्पेक्टर, एक सहायक सब-इंस्पेक्टर और 35 कांस्टेबल तैनात थे। यह सेवा न सिर्फ सामान्य संचार, बल्कि चुनावों और आपदाओं में भी काम आई। 1976-77 के चुनावों और 1982 के ‘फ्लैश फ्लड्स’ में जब सड़कें-ब्रिज बह गए और वायरलेस-टेलीफोन फेल हो गए, तब इन कबूतरों ने सरकारी संदेश पहुंचाए।

सबसे रोचक घटना 13 अप्रैल 1948 की है। तब भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू संबलपुर, ओडिशा में थे। उन्हें 265 किलोमीटर दूर कटक में तत्काल निर्देश भेजने थे, सुबह 6 बजे नेहरू का हस्तलिखित संदेश लेकर एक ‘कैरियर पिजन’ उड़ा। ठीक 11:20 पर, यानी महज 5 घंटे 20 मिनट में, वह कटक पहुंच गया। जब नेहरू खुद कटक पहुंचे तो अपना मूल संदेश और वही कबूतर देखकर दंग रह गए, वे हैरान और प्रसन्न थे। यह घटना ओडिशा पुलिस की ‘पिजन सर्विस’ की विश्वसनीयता का जीवंत प्रमाण है।

1954 में दिल्ली में अंतरराष्ट्रीय डाक प्रदर्शनी में इन कबूतरों का प्रदर्शन किया गया। 1989 में तत्कालीन राष्ट्रपति आर। वेंकटरामन जब कटक आए तो इन कबूतरों को देखकर मुग्ध हो गए। 1999 के ‘सुपर साइक्लोन’ में जब तटीय इलाकों में संचार लाइनें पूरी तरह ठप हो गईं, तब इन कबूतरों ने लाज रखी। इनकी गति औसतन 55 से 80 किलोमीटर प्रति घंटा होती है। ये एक बार में 400-500 किलोमीटर उड़ने की क्षमता रखते हैं। ‘बेल्जियन होमर’ नस्ल के ये कबूतर चुंबकीय क्षेत्र का पता लगाकर अपने घोंसले तक आसानी से पहुंच जाते हैं।

2008 में आधुनिक संचार के चलते इसे औपचारिक रूप से बंद कर दिया गया। लेकिन ओडिशा पुलिस ने इसे पूरी तरह खत्म नहीं होने दिया। मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के आदेश पर दो ‘लॉफ्ट’ अभी भी बरकरार रखे गए, एक कटक में ओडिशा पुलिस मुख्यालय पर 105 ‘बेल्जियन होमर पिजन’ और दूसरा अंगुल के पुलिस ट्रेनिंग कॉलेज पर 44 पिजन। कुल लगभग 150 प्रशिक्षित कबूतर आज भी सेवा में हैं। अब इन्हें सिर्फ सांस्कृतिक और औपचारिक उपयोग के लिए रखा गया है।  ये कबूतर गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस की परेड में शांति, प्रेम और स्वतंत्रता का संदेश लेकर उड़ते हैं। हाल ही में भुवनेश्वर में 25 कबूतरों ने 30 किलोमीटर की दूरी मात्र 29 मिनट में तय की।

आज जब साइबर हमले, प्राकृतिक आपदाएं और इमरजेंसी में मोबाइल नेटवर्क फेल हो जाते हैं, तब यह सेवा सिर्फ विरासत नहीं, बल्कि सुरक्षा की गारंटी है। ओडिशा पुलिस के स्पेशल डीजी (कम्युनिकेशंस) अरुण रे के अनुसार, “यह भारत का सबसे अच्छा रखा गया राज है।” गौरतलब है कि सीएजी ने इसकी लागत पर आपत्ति जताई थी, लेकिन मुख्यमंत्री ने साफ कहा, “विरासत को बचाओ।”

यह सेवा हमें सिखाती है कि प्रगति का मतलब पुरानी चीजों को फेंकना नहीं, बल्कि उन्हें संभाल कर रखना है। आज युवा पीढ़ी स्मार्टफोन पर जीती है, लेकिन जब वे इन कबूतरों को उड़ते देखते हैं तो इतिहास जीवंत हो उठता है। ऐसे में यदि स्कूलों-कॉलेजों व अन्य कार्यकर्मों में इनका प्रदर्शन करवाया जाए, तो न सिर्फ़ नई पीढ़ी को बरसों पुरानी विरासत जानने का मौका मिलेगा बल्कि पर्यटन को भी बढ़ावा मिले। ड्रोन और सैटेलाइट के युग में भी ये पंख वाले डाकिया हमें याद दिलाते हैं कि प्रकृति की शक्ति आज भी अजेय है।

ओडिशा पुलिस की यह पहल दुनिया के लिए मिसाल है। अमेरिका, यूरोप या एशिया की कोई अन्य पुलिस फोर्स आज ऐसा नहीं कर रही। यह सिर्फ ओडिशा का गौरव नहीं, बल्कि पूरे भारत की सांस्कृतिक विरासत है। हमें इसे और मजबूत करना चाहिए। ज्यादा ‘लॉफ्ट’, ज्यादा प्रशिक्षण, ज्यादा जागरूकता किया जाए। क्योंकि संचार सिर्फ तकनीक नहीं, बल्कि विश्वास और विश्वसनीयता का मामला है। जब आधुनिक दुनिया इंस्टेंट मैसेजिंग पर निर्भर है, तब ये उड़नहार संदेशवाहक हमें सिखाते हैं – कुछ चीजें कभी पुरानी नहीं होतीं, वे सिर्फ विरासत बन जाती हैं। ओडिशा पुलिस की ‘कैरियर पिजन सर्विस’ इसी विरासत का जीवंत प्रतीक है। इसे बचाए रखना हमारी जिम्मेदारी है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इन पंखों की उड़ान में इतिहास को महसूस कर सकें।


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