खुद को बेपर्दा करती कांग्रेस

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यह सम्मेलन कोई रस्मी जमावड़ा नहीं, बल्कि विश्व की तकनीकी व्यवस्था में भारत की बढ़ती ख्याति का ऐलान था। लेकिन भारत मंडपम के भीतर युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा किया गया ‘अर्धनग्न प्रदर्शन’ वैमनस्य का भद्दा प्रदर्शन था। स्वयं राहुल गांधी ने अपने आरोपी कार्यकर्ताओं को ‘बब्बर शेर’ कहकर यह स्पष्ट संदेश दिया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को घेरने के लिए वे इसी तरह देश की साख को दांव पर लगाते रहेंगे।

एआई शिखर सम्मेलन

कहते हैं “घर का भेदी लंका ढाए”— आज जब दुनिया भारत को एक उभरती हुई आर्थिक, डिजिटल और कूटनीतिक शक्ति के रूप में देख रही है, तब देश के भीतर का एक राजनीतिक वर्ग जैसे हर राष्ट्रीय उपलब्धि और अपनी जड़ों पर कुल्हाड़ी चलाने पर आमादा दिखाई देता है। भारत की अर्थव्यवस्था, डिजिटल संरचना और कूटनीतिक सक्रियता में हाल के वर्षों में जो परिवर्तन दिखाई दिया है, उसने वैश्विक स्तर पर देश की भूमिका को नए सिरे से परिभाषित किया है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (ए।आई।) जैसे उभरते क्षेत्रों में नीति-निर्माण और तकनीकी विकास को लेकर भारत की पहल इसी व्यापक परिवर्तन का हिस्सा है। दिल्ली में 16 से 20 फरवरी 2026 के बीच आयोजित ‘एआई इंपैक्ट सम्मिट 2026’ इसी क्रम में एक महत्वपूर्ण पड़ाव था, जिसका उद्देश्य केवल तकनीकी सहयोग नहीं, बल्कि ए।आई के नैतिक और लोकतांत्रिक उपयोग पर वैश्विक सहमति विकसित करना भी था।

यह सम्मेलन कोई रस्मी जमावड़ा नहीं, बल्कि विश्व की तकनीकी व्यवस्था में भारत की बढ़ती ख्याति का ऐलान था। दुनियाभर से आए नीति-निर्माता, तकनीकी विशेषज्ञ और निवेशक भारत की डिजिटल छलांग को समझने और उसमें भागीदारी के लिए एकत्र हुए थे। लेकिन कांग्रेस नेतृत्व— विशेषकर उसके शीर्ष नेता और नेता-प्रतिपक्ष (लोकसभा) राहुल गांधी और उनसे प्रेरित कार्यकर्ताओं ने इस अवसर को भी ओछी राजनीति का अखाड़ा बना दिया।

असहमति और विरोध लोकतंत्र में प्राणवायु है। परंतु भारत मंडपम के भीतर युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा किया गया ‘अर्धनग्न प्रदर्शन’ कोई स्वस्थ लोकतांत्रिक मूल्य नहीं, बल्कि राजनीतिक-वैचारिक खीझ के साथ व्यक्तिगत वैमनस्य का भद्दा प्रदर्शन था। स्वयं राहुल गांधी ने अपने आरोपी कार्यकर्ताओं को ‘बब्बर शेर’ कहकर यह स्पष्ट संदेश दिया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को घेरने के लिए वे इसी तरह देश की साख को दांव पर लगाते रहेंगे। पूरे घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने इसे वैचारिक खोखलेपन का प्रतीक बताया है, तो समाजवादी पार्टी सहित कुछ अग्रिम भाजपा-विरोधी दलों ने भी कांग्रेस कार्यकर्ताओं की इस फूहड़ता से दूरी बना ली है।

भारत की छवि को धूमिल और कलंकित करने की यह औपनिवेशिक मानसिकता नई नहीं है। वर्ष 1927 में अमेरिकी लेखिका कैथरीन मेयो ने अपनी पुस्तक ‘मदर इंडिया’ में भारतीय समाज में व्याप्त समस्याओं— जातिवाद, बाल-विवाह, स्वच्छता की कमी आदि को इस तरह प्रस्तुत किया कि मानो भारत स्वशासन के योग्य ही नहीं है। लेखिका का मत था कि ‘आंतरिक विकृतियों’ से ग्रस्त समाज राजनीतिक स्वतंत्रता के लायक नहीं है। उस किताब को गांधीजी ने “नाली निरीक्षक की रिपोर्ट” कहकर खारिज कर दिया था। तब गांधीजी ने समाज में व्याप्त समस्याओं से इनकार नहीं किया था, लेकिन उनके चयनात्मक विवरण और उसके पीछे की औपनिवेशिक कुटिलता को बेनकाब किया था। गांधीजी का पक्ष था कि समाज की कमियों को भीतर से सुधारा जा सकता और यह आंतरिक दायित्व है— न कि उन्हें अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उछालकर अपने ही राष्ट्र की साख गिराई जाए। आज विडंबना यह है कि गांधीजी की विरासत पर स्वघोषित दावा करने वाला कांग्रेस नेतृत्व स्वयं उसी औपनिवेशिक मानसिकता से जकड़ा है— जहां राजनीतिक द्वेष में एक घटना को भारत के अपने वैश्विक आयोजन की विफलता का प्रमाण मानकर प्रस्तुत किया जा रहा है।

एआई शिखर सम्मेलन में एक निजी विश्वविद्यालय द्वारा प्रदर्शित ‘रोबोटिक डॉग’— जोकि वास्तव में चीन निर्मित था और उस शैक्षणिक संस्था ने अपने छात्रों की उपलब्धि के रूप में पेश करके दिखाया था— उसे आधार बनाकर राहुल गांधी ने पूरे आयोजन को “अव्यवस्थित” और “तमाशा” करार दे दिया। एक निजी शिक्षण संस्थान, जिसे विवाद पश्चात कार्यक्रम से बाहर कर दिया गया था— उसके अपराध को तथाकथित राष्ट्रीय ‘अक्षमता’ का प्रतीक बना देना वही मानसिकता है, जो कभी मेयो रूपी औपनिवेशिक शक्तियां भारतीय समाज के विरुद्ध इस्तेमाल करती थी।

अतीत में ऐसे अवसर भी आए हैं, जब राजनीतिक मतभेदों के बावजूद राष्ट्रीय दृष्टिकोण को प्राथमिकता दी गई। 1994 में जब पाकिस्तान ने कश्मीर मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में उठाने की कोशिश की, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हाराव ने तबके विपक्षी नेता अटल बिहारी वाजपेयी को भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व सौंपा था। राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखते हुए उस समय दलगत राजनीति को दरकिनार कर दिया गया और इसके परिणामस्वरूप पाकिस्तान का प्रस्ताव विफल हो गया। यह उस राजनीतिक परिपक्वता का उदाहरण था, जो आज दुर्लभ होती जा रही है।

अब देश के जिस एआई शिखर सम्मेलन में गूगल, माक्रोसॉफ्ट, अमेजॉन, ओपन एआई और एंथ्रोपिक जैसी शीर्ष वैश्विक तकनीकी कंपनियों के शीर्ष अधिकारी उपस्थित थे, फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों सहित अनेकों राष्ट्राध्यक्ष शामिल थे, लगभग 90 देशों ने ‘नई दिल्ली घोषणा’ को स्वीकार किया और 250 अरब डॉलर से अधिक के निवेश की प्रतिबद्धता जताई गई हो— उसे कांग्रेस ने महज सरकार ‘जनसंपर्क अभियान’ बताकर खारिज कर दिया। क्या यह सम्मेलन किसी राजनीतिक दल के बजाय भारत का नहीं था?

इसी वैश्विक मंच पर भारतीय एआई स्टार्टअप ‘सर्वम’ ने अपना नया ‘इंडस एआई चैट एप’ जारी किया, जोकि 22 भारतीय भाषाओं में संचालित होता है। यह एप कंपनी के 105 बिलियन मानक वाले बड़े भाषाई ढांचे पर आधारित है, जो विशेष रूप से भारतीय उपभोक्ताओं के लिए विकसित किया गया है। यह उस तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में एक ठोस कदम है, जिसकी चर्चा वर्षों से रही है। लेकिन इसपर गौरवान्वित होने के बजाय कांग्रेस प्रेरित इको-सिस्टम पूरे आयोजन को ही बदनाम करने में जुट रहा।

वैश्विक मंचों में यह संतुलन आवश्यक है कि घरेलू आलोचना किस सीमा तक व्यक्त की जाए। यहां सवाल यह नहीं कि मोदी सरकार की आलोचना होनी चाहिए या नहीं। असल सवाल यह है कि क्या असहमति या विरोध के नाम पर देश की प्रतिष्ठा को दांव पर लगाना ठीक है? क्या राजनीतिक खींचतान को अंतरराष्ट्रीय मंचों तक ले जाना उचित है?

स्वतंत्रता के दशकों बाद तक भारत की वैश्विक पहचान को गांधीजी, गरीबी रूपी सामाजिक विषमता, सांप-सपेरों और ताजमहल से जोड़ा जाता था। परंतु आज वही भारत विश्व आर्थिकी, कूटनीति और तकनीकी विमर्श सहभागी बन चुका है। एआई और जी20 जैसे अंतरराष्ट्रीय आयोजन करने की क्षमता रखता है। विडंबना है कि मोदी सरकार को घेरने की जल्दबाजी में कांग्रेस नेतृत्व ने अपनी कुंठा को देश के सामने रख दिया है।


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