मुद्दआ तो यह है कि सब जानते हैं कि मुद्दआ क्या है, मगर सब यह पूछने से पिंड छुड़ाते भाग रहे हैं कि मुद्दआ क्या है? जब तक हम सवालों का सामना नहीं करते, तब तक हर 365 दिनों बाद एक नया बरस आएगा, हर 365 दिनों बाद एक पुराना बरस जाएगा और हम अपने रेंगने की स्वाभाविक रफ़्तार को लंबी कूद का कीर्तिमान समझ कर निज़ाम-ए-हुकू़मत के कनॉटप्लेस में फुदकते रहेंगे।
2026 आ गया। 2025 चला गया। एक दिन 2026 भी चला जाएगा। यह आना-जाना लगा रहता है, लगा रहेगा। सो, क्या तो 2026 के आने से सुर्ख़रू होने का अहसास करना और क्या तो 2025 के जाने से अफ़सुर्दगी महसूस करना! मुझे तो दरअसल 2025 की विदाई से सुकून का ही बोध हुआ। जैसा कि हर बरस की अलविदाई पर होता है। नए साल के आगमन पर भी मेरा रोम-रोम रोमांचित नहीं हुआ। जैसा कि हर बरस भी नहीं होता है। अपनी तरुणाई के दिनों में भी मैं ने कभी कूद-फांद कर नए साल की अगवानी नहीं की। मेरी तो आज तक समझ में ही नहीं आया कि जो दिन अपने आप गुज़रे जा रहे हैं, उन की सालाना पायदान को लोग इतने मय-मस्त हो कर बलैयां लेने का अवसर मानते क्यों हैं?
किसी भी गुज़रे साल की बेहतरी में अपने योगदान का ईमानदारी से आकलन करने वाले ज़्यादातर लोग क्या यह सोच कर भीतर-ही-भीतर शर्मसार नहीं होते होंगे कि उन की भूमिका या तो नकारात्मक रही या वे तटस्थ बने रहने का अपराध करते रहे? किसी भी नवागत साल के मौक़े पर ख़ुद को तरह-तरह के संकल्पों से लैस करने करने वालों में से अधिकतर लोग क्या बाद में अपने इस क्षणिक पराक्रम से निग़ाहें चुरा कर नहीं घूमते होंगे? नववर्ष पर सोशल मीडिया मंचों से ले कर अपने-अपने शहरों-कस्बों के कनॉटप्लेसों पर कमर मटकाने वालों में से कितने ऐसे होते होंगे, जो बाक़ी के 364 दिन हमारे समाज, संस्कृति और सियासत का गुलाबीपन बढ़ाने के लिए कुछ सार्थक करते हैं?
सच्चाई यह है कि हम ढकोसलों के पुजारी थे, हम आडंबरों के उपासक हैं और हम भविष्य में भी पाखंडों के अर्चक बने रहने का अभिशाप ले कर जन्मे हैं। हमारी समूची उत्सवधर्मिता और हमारे सारे तीज-त्योहार जब कभी निर्मल-पावन भाव से पगे रहे होंगे, रहे होंगे; आज वे ढोंग और दोहरेपन पर आधारित हैं और अपने-अपने प्रभुत्व के प्रदर्शन का माध्यम हैं। अब हमारा रोयां-रोयां इसी नकलीपन से सराबोर है। हम अपनी कृत्रिमता पर लाज से नहीं, गर्व से भरा महसूस करने लगे हैं। हम अपने खोखलेपन का ज़श्न मनाने लगे हैं। हम फलों की दुकान पर छिलके सजे होने को अपनी उपलब्धियों में शुमार करने लगे हैं। ऐसा करते वक़्त हम बेहयाई की सीमा पार करने लगे हैं।
हम अपनी फ़र्ज़ी जम्हूरियत पर इतराए घूम रहे हैं। हम जानबूझ कर जनतंत्र की हक़ीक़त का कूड़ा-करकट गलीचे के नीचे बुहारे बैठे हैं। हम इस असलियत का सामना करने से घबराते हैं कि हमारे कथित जनतंत्र के बरामदे को राजतंत्र का एक मज़बूत परकोटा घेरे हुए है। जनतंत्र में इस राजतंत्र की उपस्थिति से नावाकिफ़ रहना हमें सुविधाजनक लगता है। चूंकि यह स्वीकार्य हमें इस पाप-बोध से भर सकता है कि अगर हम यह जानते हैं तो इस का प्रतिकार करने के लिए क्या कर रहे हैं, इसलिए हम अनभिज्ञ होने का पाखंड रच रहे हैं।
लोकतंत्र आख़िर है क्या? सच सिर्फ़ इतना है कि राजतंत्र में एक राजा होता है और लोकतंत्र में राजपाट का हिस्सा-बांट सत्तासीन राजा के साथ कुछ विपक्षी राजाओं के बीच भी हो जाता है? अगर मुल्क़ की अधिकृत कमान संभाल रहे हुक़्मरानों की राज-व्यवस्था दरबार-अधारित है तो क्या विपक्षी टीले दरबार-विहीन हैं? नहीं। उन का दरबार है तो इन के भी दरबार हैं। जब दरबार हैं तो सब के अपने-अपने दरबारी हैं। दरबारी हैं तो उन में आपसी होड़ है, आपसी दौड़ है। हर दरबार का राजा इस दौड़-होड़ का मंद-मंद मुस्कान के साथ आनंद ले रहा है। वह आश्वस्त है कि राजा का बेटा राजा बनेगा। वह मुतमईन है कि राजा की बेटी रानी बनेगी। बाक़ी सब को होड़-दौड़ के ढेंकुल झूले पर बिठाए रखो।
साल बीतते जाएंगे, मगर निज़ाम सामंती परंपरा से ही चलेंगे। रग-रग में बैठा सामंती भाव ही तो हमारे दिखावटी लोकतंत्र का रक्तबीज है। सत्तापक्ष के सामंत हैं तो प्रतिपक्ष के भी सामंत हैं। अगर सत्तापक्ष के सामंत उन की निजी सेवा में समर्पित उड़नखटोलों से आकाषमार्गी हैं तो प्रतिपक्षी सामंत कौन-से बैलगाड़ियों से सफ़र कर रहे हैं? नया साल तो सभी का हवाई द्वीप, लंदन और कम-से-कम गोवा में तो मन ही रहा है। सियासी कैनवस पर रंग तो उन के अपने-अपने चहेते कारिंदे ही बिखेर रहे हैं। जनतंत्र का ‘जन’ और लोकतंत्र का ‘लोक’ आप को कहीं दिखाई दे रहा है क्या? तो एक साल बीतने और दूसरा साल आने पर आप इतना क्यों ठुमक रहे हैं? इसीलिए न कि चूंकि दुनिया उम्मीद पर क़ायम है और आप अपनी इस उम्मीद को खोना नहीं चाहते हैं कि शायद इस साल चीज़ें बदल जाएंगी। मगर मेरा कहा मानिए और पूरी तरह निश्चिंत रहिए कि 2025 जाते रहेंगे और 2026 आते रहेंगे और कहीं कुछ नहीं बदलेगा।
इसलिए नहीं बदलेगा कि जैसे नया साल लाने में हमारा कौन-सा पसीना बहा होता है और फिर भी वह अपने आप आ जाता है और हम उसे आया देख मोहिनीअट्टम किए बिना रह नहीं पाते हैं, उसी तरह हम चाहते हैं कि हम हाथ-पर-हाथ धरे बैठे रहें और फिर भी राजतंत्र झकाझक जनतंत्र में तब्दील हो जाए। जब ऐसा हो जाए तो हम उछल-उछल कर इस का सेहरा अपने सिर पर बांध लें और स्वयं को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी घोषित कर दें। मगर अगली सृष्टि की रचना तक ख़ुद-ब-ख़ुद तो ऐसा होने वाला है नहीं। साल के 365 दिन तो हमेशा-हमेशा से इतनी शाश्वत मासूमियत से भरे हुए हैं कि हर साल अपनी गति से अपने आप चलते रहते हैं और हमें नए साल के हवाले कर जाते हैं। मगर लोकतंत्र के राजतंत्र का संचालन करने वाले इतने भोले नहीं हैं कि हमें-आप को किसी नई व्यवस्था को गोद दे कर वानप्रस्थगामी हो जाएं।
सो, नए साल की अगवानी के कर्मकांड ने मुझे कभी आकर्षित नहीं किया। मुझे होली, दीवाली, दशहरे, ईद, क्रिसमस, वग़ैरह के धर्माचरण भी कभी नहीं लुभाते हैं। ये सब आनंदोत्सव जिन्हें मनाने हैं, शौक़ से मनाएं। वे उन्हें नहीं मनाएंगे तो लोक-जीवन पर क्या फ़र्क़ पड़ जाएगा? उन के मनाने से भी जगत-सुख में कौन-सी बढ़ोतरी होती जा रही है? मुख-श्रंगार के इन उपादानों से अगर इज़्तिमाई तंदुरुस्ती की आधारशिला फलती-फूलती होती तो क्या हम अपने सामाजिक जीवन में इस सड़ेगलेपन से रूबरू हो रहे होते? इसलिए ज़रूरत तो जड़ों को सींचने की है। देखें, 2026 में कौन कितनी जड़ें सींचता-खोदता है!
मैं जानता हूं कि नए साल के तीसरे ही दिन आप में से कइयों को मेरी ये बातें नश्तर लगेंगी। लगेंगी तो लगने दीजिए। मैं जानता हूं कि मुझे हताशावादी, निराशावादी, मनहूस जैसी उपाधियों से नवाज़ा जाएगा। नवाज़ने वालों को नवाज़ने दीजिए। मसला यह है ही नहीं कि कौन मुझे किस चश्मे से देखता है। मुद्दआ तो यह है कि सब जानते हैं कि मुद्दआ क्या है, मगर सब यह पूछने से पिंड छुड़ाते भाग रहे हैं कि मुद्दआ क्या है? जब तक हम सवालों का सामना नहीं करते, तब तक हर 365 दिनों बाद एक नया बरस आएगा, हर 365 दिनों बाद एक पुराना बरस जाएगा और हम अपने रेंगने की स्वाभाविक रफ़्तार को लंबी कूद का कीर्तिमान समझ कर निज़ाम-ए-हुकू़मत के कनॉटप्लेस में फुदकते रहेंगे।
