मानवाधिकारों में सेना बनाम सुप्रीम कोर्ट

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मणिपुर अथवा कश्मीर में जारी घटनाओं में, अदालत के आदेश, सेना के अधिकार और जनता का विश्वासतीनों पहलू परस्पर टकरा सकते हैं। मगर, लोकतंत्र की खूबसूरती इनमें संतुलन बनाना और संवाद की प्रक्रिया में सही समाधान ढूंढना ही होना चाहिए। जरूरत इसी बात की है कि अतीत के अनुभवों से सीखकर, आज के तात्कालिक विवादों को अंधी भावनाओं के बजाय गहन विश्लेषण और खुले संवाद द्वारा हल किया जाए।

पिछले दिनों एक पोस्ट सोशल मीडिया पर तेज़ी से वायरल हुई। इस पोस्ट में सेवानिवृत्त कर्नल ए। एन। रॉय का बयान सेना के उस वर्ग की भावना को स्पष्ट करता है, जो लगातार आतंकवाद, हिंसा और राजनीतिक अस्थिरता वाले इलाकों में डटा रहता है। जब सैनिक सीमाओं या कश्मीर जैसे ‘संवेदनशील क्षेत्रों’ में आतंकवाद का सामना करते हैं, तब उन्हें कुछ फैसले अक्सर सेकंडों में लेने पड़ते हैं। इसमें औपचारिकताओं के लिए समय नहीं होता। जो भी निर्णय लेना होता है वह उन सैनिकों को दिए गए प्रशिक्षण और अपने विवेक से ही लेना पड़ता है।

इस पोस्ट ने सीधे सवाल उठाया, “क्या आपने कभी अपने बेटे को खोया है?” — यह व्यवस्था से उपजी पीड़ा और असंतोष की प्रामाणिक अभिव्यक्ति है। इसका मूल भाव यही है कि जब सैनिक आतंकवादी का सामना करता है, तो वह कानून या न्यायालय की व्याख्याओं से अधिक, अपने प्रशिक्षण और परिस्थिति पर ही निर्भर करता है। बाद में उस पर अभियोग या अधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगना उसे अपमानजनक महसूस होता है।

दूसरी ओर, सर्वोच्च न्यायालय की दृष्टि संविधान की मूल भावना, ‘हर नागरिक के मौलिक अधिकार’ से निर्देशित होती है। न्यायालय किसी सेना या व्यक्ति का विरोध नहीं करता, बल्कि यह सुनिश्चित करता है कि ‘राज्य की शक्ति’ जवाबदेही से परे न हो। कश्मीर या किसी अशांत क्षेत्र में नागरिकों पर अत्याचार या फर्जी मुठभेड़ों के आरोप अक्सर सामने आते हैं। यदि जांच का हक छीन लिया जाए, तो लोकतांत्रिक संस्थाओं की पारदर्शिता पर सवाल उठेंगे। न्यायालय यह नहीं कहता कि आतंकवादी को बचाया जाए, बल्कि यह मांगता है कि निर्दोष लोग आतंकवादी समझकर मारे न जाएं। यही ‘न्याय का नैतिक आधार’ है।

पोस्ट में “आतंकवादियों के मानवाधिकारों” को लेकर जो कटाक्ष किया गया है, वह भावनात्मक प्रतिक्रिया है। लेकिन मानवाधिकारों का सार आतंकवादी के प्रति करुणा नहीं, बल्कि बिना भेदभाव सिद्धांतों पर आधारित न्याय को सुनिश्चित करने की प्रक्रिया में है। जब किसी संदिग्ध की मौत की जांच होती है, तो लक्ष्य अपराधियों को बचाना नहीं, बल्कि सत्ता के दुरुपयोग को रोकना होता है। वैश्विक संदर्भ में भी अमेरिका, ब्रिटेन या फ्रांस जैसे देशों में “वॉर क्राइम्स” या “एक्सेसिव फोर्स” पर सवाल उठते रहे हैं। सशक्त लोकतंत्र वे हैं जो अपने संस्थानों से प्रश्न पूछने का साहस रखते हैं।

राष्ट्रीय सुरक्षा और संवैधानिक निष्ठा के दो मजबूत स्तंभ हैं। समस्या तब आती है जब संवैधानिक प्रक्रिया को “देश विरोधी साजिश” या सैनिक कार्रवाई को “न्याय की हत्या” मान लिया जाता है। इससे संवाद में विघटन और अविश्वास बढ़ता है।

समुचित समाधान यही है कि सेना को ‘ऑपरेशनल प्रोटेक्शन’ मिले, ताकि तत्काल कार्रवाई में की गई गलती अपराध न माना जाए, लेकिन शक्ति का दुरुपयोग करने पर न्यायिक जांच की प्रक्रिया बनी रहे। ऐसे पोस्ट सोशल राष्ट्रभक्ति की भावना को सीधा स्पर्श करते हैं। खतरा इस बात में है कि भावनाओं की लहरों में तथ्य और कानूनी सीमाओं की अनदेखी होने लगती है। न्यायपालिका, सेना और मानवाधिकार, ये विरोधी नहीं बल्कि लोकतंत्र के पूरक अंग हैं। सोशल मीडिया पर एकांगी नैरेटिव अंततः सार्वजनिक विश्वास को कमजोर करता है।

भारत में सेना, सुप्रीम कोर्ट और मानवाधिकार को लेकर टकराव की घटनाएँ केवल हाल ही की नहीं, बल्कि देश के इतिहास में समय-समय पर सामने आई हैं।

18वीं शताब्दी में, औपनिवेशिक शासन के दौरान सुप्रीम कोर्ट और गवर्नर जनरल इन काउंसिल के बीच अधिकार को लेकर पहली बड़ी भिड़ंत “कोसिजुरा मामला” में देखने को मिली। सुप्रीम कोर्ट ने सेना का इस्तेमाल करते हुए अपनी शक्तियाँ बढ़ाने का प्रयास किया, जबकि गवर्नर जनरल इन काउंसिल ने अदालत के आदेशों को चुनौती दी और सेना को अदालत के खिलाफ तैनात कर दिया। यह विवाद बंगाल ज्यूडिकेचर एक्ट 1781 के पास होने तक चलता रहा, जिसने अदालत की सीमाएँ तय कर दीं और टकराव का अंत किया। इस मामले ने जता दिया कि अधिकारों की अस्पष्टता शक्ति संघर्ष का हमेंशा केंद्र रही है।

1945 में आज़ाद हिंद फौज के सैनिकों पर देशद्रोह और हत्या के आरोप लगे और उन पर कोर्ट मार्शल चलाया गया। ब्रिटिश सरकार ने इन सैनिकों की गतिविधियों को “किंग के खिलाफ युद्ध” माना, जबकि भारतीय जनता और नेताओं ने देशभक्ति की भावना को कानूनी प्रक्रिया के विरोध में जोरदार तरीके से रखा। इस संघर्ष में अदालत के आदेशों और जनता के मानस के बीच गहरा विभाजन आया।

नगा पीपल्स मूवमेंट बनाम भारत सरकार केस में सर्वोच्च न्यायालय में AFSPA की वैधता को चुनौती दी गई, ्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर सेना को अतिरिक्त अधिकार देने का प्रावधान संविधान के खिलाफ नहीं। फिर भी, अदालत ने सेना के अधिकारों पर निगरानी और जवाबदेही सुनिश्चित करने के उद्देश्य से दिशानिर्देश जारी किए। इस मामले में मानवाधिकार और सैन्य अधिकार की सीमा को लेकर बड़ी बहस छिड़ी।

2023 में मणिपुर में जातीय हिंसा के दौरान सर्वोच्च न्यायालय से सेना/पैरामिलिट्री तैनात करने की मांग की गई थी। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि ऐसे आदेश देना न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। यह कार्यकार्यपालिका का दायित्व है। बावजूद इसके, कभी-कभी अदालत ने सुरक्षा बलों की तैनाती के निर्देश दिए हैं, जैसे 2008 के ओडिशा के दंगों या 2023 के पश्चिम बंगाल पंचायत चुनावों के दौरान हुआ। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस जैसे देशों में भी कभी-कभी सेना और मानवाधिकार संस्थाओं के बीच टकराव सामने आते हैं। मगर वहीं बार-बार यह सुनिश्चित किया जाता है कि जनहित और राज्यहित के बीच संतुलन बना रहे।

मणिपुर अथवा कश्मीर में जारी घटनाओं में, अदालत के आदेश, सेना के अधिकार और जनता का विश्वास—तीनों पहलू परस्पर टकरा सकते हैं। मगर, लोकतंत्र की खूबसूरती इनमें संतुलन बनाना और संवाद की प्रक्रिया में सही समाधान ढूंढना ही होना चाहिए। जरूरत इसी बात की है कि अतीत के अनुभवों से सीखकर, आज के तात्कालिक विवादों को अंधी भावनाओं के बजाय गहन विश्लेषण और खुले संवाद द्वारा हल किया जाए। संविधान की साझा जिम्मेदारी मानते हुए सुरक्षा और अधिकार दोनों के बीच संतुलन जरूरी है। संवाद के बिना, नफरत और अविश्वास बढ़ते हैं। सेना का आत्मसम्मान वही रख सकेगा, जो न्यायपालिका पर भरोसा रखे और न्यायपालिका वही सम्मान पाएगी जो सैनिक के त्याग को समझ सके। इसीलिए, सवाल पूछना गलत नहीं है लेकिन, एक दूसरे पर दोषारोपण करना लोकतंत्र के लिए रचनात्मक नहीं।


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