सीजेपी और सोनम के आंदोलन की सीमाएं

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

सोनम वांगचुक जंतर मंतर पर भूख हड़ताल पर बैठे हैं और कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी प्रदर्शन कर रही है। परंतु सरकार सुन नहीं रही है। सरकार ने तो पूरे एक साल तक किसानों की भी नहीं सुनी थी। देश के कई राज्यों के किसान दिल्ली की चौहद्दी में डेरा डाल कर एक साल तक बैठे रहे। एक सौ से ज्यादा किसानों की इस दौरान मृत्यु हुई। केंद्र सरकार ने उनकी बात तब सुनी, जब उत्तर प्रदेश और पंजाब का चुनाव नजदीक आया। ध्यान रहे उस आंदोलन का दायरा बहुत व्यापक था। उसमें बहुत ज्यादा लोग शामिल थे और देश, विदेश से उसको समर्थन मिल रहा था। उस आंदोलन की पहचान यह थी कि किसान अपने हित के लिए लड़ रहे हैं।

जाति से ऊपर किसानों की अस्मिता का मामला बन गया था। तब भी एक साल बाद सरकार ने तीनों विवादित कृषि कानूनों को वापस लिया था। इसके उलट जंतर मंतर पर चल रहा सीजेपी का आंदोलन कोई पहचान नहीं बना पाया है। इतना ही नहीं, जिन मुद्दों को लेकर आंदोलन शुरू हुआ उन मुद्दों का दायरा भी बहुत बड़ा नहीं हो पाया है। कोई जातीय या सामाजिक समूह इससे जुड़ा नहीं दिख रहा है। इसका ऑनलाइन समर्थन भी थम गया है। सीजेपी का सोशल मीडिया हैंडल बनते ही दो करोड़ से ज्यादा लोग इससे जुड़ गए थे। लेकिन उसके बाद यह संख्या स्थिर हो गई।

इसके अलावा एक अहम बात यह है कि सीजेपी और सोनम वांगचुक ने जो मुख्य मुद्दा उठाया वह पूरी तरह से राजनीतिक है। पहले दिन सीजेपी के प्रमुख अभिजीत दीपके ने कहा कि उन्हें केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा चाहिए। उन्होंने प्रधान के इस्तीफे की समय सीमा तय की और कहा कि अगर उस दिन तक इस्तीफा नहीं हुआ तो आंदोलन तेज होगा। जैसे ही सीजेपी ने एक मंत्री के इस्तीफे को अपने आंदोलन का मुख्य मुद्दा बनाया वैसे ही उसने नैरेटिव गंवा दिया। असली मुद्दा शिक्षा और परीक्षा में सुधारों का है।

हालांकि बाद में इसे भी जोड़ा गया लेकिन देश भर में यह मैसेज गया कि आंदोलन शिक्षा मंत्री का इस्तीफा लेने के लिए हो रहा है। यही कारण है कि नीट यूजी परीक्षा के पेपर लीक और सीबीएसई की 12वीं की बोर्ड परीक्षा की ऑनस्क्रीन मार्किंग से परेशान हुए लाखों छात्र और उनके परिवार भी इस आंदोलन से नहीं जुड़े। अगर सीजेपी और वांगचुक की ओर से शिक्षा और परीक्षा में व्यापक सुधार की मांग और वैकल्पिक व्यवस्था की तस्वीर पेश की जाती है तो हो सकता है कि उसे व्यापक समर्थन मिलता।

नीट यूजी की दोबारा परीक्षा हो चुकी है और अब नतीजे भी आने वाले हैं। परीक्षा कराने वाली संस्था एनटीए ने अगले साल की परीक्षा में होने वाले बदलावों की जानकारी दे दी है। उधर 12वीं की उत्तर पुस्तिकाओं की ऑनस्क्रीन जांच और मार्किंग का विवाद भी समाप्त हो गया है। इसके साथ ही पूरा मामला लोकप्रिय विमर्श से बाहर हो गया है। सो, एक तरफ जिनके हितों को लेकर यह प्रदर्शन हो रहा है वह समूह इस पूरे मामले से निर्लिप्त है तो दूसरी ओर सरकार ने इसे अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न इसलिए बना लिया क्योंकि भूख हड़ताल करके एक मंत्री का इस्तीफा कराने की कोशिश हो रही है। इससे पहले अन्ना हजारे का आंदोलन हो या किसान आंदोलन हो दोनों में उठाए गए मुद्दे व्यापक असर वाले थे तभी उससे बड़ा समूह जुड़ा था।

भ्रष्टाचार का मुद्दा आम आदमी को हर दिन प्रभावित करने वाला है तो किसान अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे थे। वैसा कोई जुड़ाव इस आंदोलन के साथ नहीं है। भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन में आम लोग शामिल थे तो किसान आंदोलन में किसान शामिल थे। सीजेपी और वांगचुक के आंदोलन में छात्र शामिल नहीं हैं। दूसरी बात यह है कि जो लोग आंदोलन कर रहे रहे हैं उनमें वांगचुक को छोड़ दें तो बाकी लोग शिक्षा से जुड़े नहीं हैं।

अब सवाल है कि क्या इस आंदोलन का सामाजिक आधार व्यापक नहीं है या आंदोलन में उठाए जा रहे मुद्दे व्यापक असर वाले नहीं हैं या इसमें उठाए जा रहे मुद्दे राजनीतिक प्रकृति के हैं या सत्तापक्ष को बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचाने वाले नहीं हैं, इस आधार पर सरकार की अनदेखी को न्यायसंगत ठहराया जा सकता है? इसका जवाब होगा ‘नहीं’। किसी लोकतांत्रिक देश में चुनी हुई सरकार से अपने नागरिकों के साथ ऐसे बरताव की उम्मीद नहीं की जाती है। भले इसका दायरा व्यापक नहीं हो लेकिन सरकार को आंदोलनकारियों से बात करनी चाहिए। सरकार को प्रयास करना चाहिए कि सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल समाप्त हो।

आखिर आंदोलनकारी सरकार से ही मांग कर रहे हैं। ठीक है कि सरकार अपने किसी मंत्री के इस्तीफे पर राजी नहीं होगी। लेकिन उसके अलावा भी दूसरे मुद्दे हैं या उस मुद्दे पर भी बात हो सकती है। समझाने की कोशिश हो सकती है। अगर सरकार आंदोलनों के प्रति इस तरह का रवैया रखेगी तो लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रति आम आदमी का विश्वास कमजोर होगा। जो लोग मानते हैं कि गांधीवादी तरीके से प्रदर्शन करेंगे तो सरकार उनकी बात सुनेगी उन लोगों में असहायता का भाव पैदा होगा।

सरकार मांगें माने या न माने, संवाद जरूर करे। इससे अंततः लोकतंत्र मजबूत होता है। लोकतंत्र का सौंदर्य इसी में है कि असहमति और प्रतिरोध की आवाज के लिए भी जगह हो और सरकार उसे भी सुने। इसलिए सरकार को सहानुभूतिपूर्वक इस पूरे मामले को सुलझाने का प्रयास करना चाहिए। सोनम वांगचुक ने लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के लिए भी आंदोलन किया था। तब भी सरकार ने इस पर ध्यान नहीं दिया था। शांतिपूर्ण आंदोलनों का निरंतर विफल होते जाना सरकार की जीत नहीं है।

जहां तक विपक्ष का सवाल है तो इस आंदोलन के प्रति उसका भी सहयोगात्मक रवैया नहीं है। कांग्रेस के अलावा कुछ अन्य विपक्षी पार्टियों के नेता जरूर इस आंदोलन में शामिल होने जंतर मंतर पहुंचे लेकिन उनका समर्थन प्रतीकात्मक है। इसका कारण यह है कि सीजेपी या वांगचुक ने आंदोलन शुरू करने से पहले विपक्ष को भरोसे में नहीं लिया। विपक्ष और खास कर कांग्रेस को लगा कि शिक्षा और परीक्षा की गड़बड़ियों का बड़ा मुद्दा उसके हाथ से छीनने के लिए यह आंदोलन हो रहा है। इसलिए कांग्रेस खिलाफ हुई। वैसे भी सोनम वांगचुक एक समय केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के समर्थक रहे हैं। यह भी खबर है कि राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के लिए उनको न्योता दिया गया था लेकिन उन्होंने इसे ठुकरा दिया था। इसके बावजूद विपक्ष की ओर से भी पहल होनी चाहिए। अंततः यह मुद्दा किसी व्यक्ति से जुड़ा हुआ नहीं है। अगर मुद्दों से विपक्ष की सहमति है तो उसे इसका साथ देना चाहिए। यह ध्यान रखना चाहिए कि कोई भी आंदोलन जब तक राजनीतिक नहीं हुआ तब तक सफल नहीं हुआ।


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