भ्रष्टाचार मुक्त कुछ भी नहीं!

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

भारत में क्या कोई भी सरकारी खरीद भ्रष्टाचार के बगैर हो सकती है? क्या भारत के किसी भी सरकारी ठेके में बिना भ्रष्टाचार के काम हो सकता है और क्या देश के किसी भी सरकारी कार्यालय में बिना रिश्वत के कोई भी काम हो सकता है? कह सकते हैं कि यह भ्रष्टाचार की समस्या का सामान्यीकऱण करना है। यह भी कहा जा सकता है कि अब भी बहुत से लोग हैं, जो ईमानदारी से काम करते हैं। यह तर्क भी दिया जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब ऐलान किया है कि ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’ तो फिर देश में भ्रष्टाचार का सवाल कहां से आ गया?

इन सवालों के जवाब तलाशे जाएं उससे पहले हाल के दिनों की कुछ खबरों पर एक नजर डालने की जरुरत है। ये अलग अलग राज्यों की खबरें हैं। इनसे पता चलेगा कि सरकारों का सिस्टम कैसे काम कर रहा है। यहां यह तर्क नहीं चलेगा कि सरकार सख्त है तभी तो ऐसे मामले पकड़े जा रहे हैं। ये जो मामले पकड़े जा रहे हैं ये टिप ऑफ आइसबर्ग हैं यानी पूरे मामले का बहुत छोटा हिस्सा हैं।

भारत में भ्रष्टाचार इतना सांस्थायिक क्यों होता जा रहा है इस पर चर्चा करने से पहले हाल की कुछ खबरों पर नजर डालने की जरुरत है। इनसे पता चलेगा कि मंदिर से लेकर अस्पताल कैसे भ्रष्टाचार का अड्डा बने हैं। अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावा चोरी हो गया। इसकी एसआईटी जांच चल रही है। करोड़ों रुपए की चोरी हुई है। इस बीच बद्रीनाथ औऱ केदारनाथ धाम में भी चढ़ावा चोरी की जानकारी सामने आई है। राजधानी दिल्ली में सेंट्रल प्रोक्योरमेंट यूनिट में करीब सात सौ करोड़ रुपए की खरीद का घोटाला खुला है, जिसमें कई आईएएस अधिकारी जांच के दायरे में आए हैं।

राजधानी दिल्ली में ही स्वतंत्रता दिवस से पहले तिरंगा झंडा खरीदने के लिए निकाले गए टेंडर में गड़बड़ी की खबर आई तो टेंडर रद्द किया गया। हरियाणा में सरकार का पैसा एक खास बैंक में जमा करवाया गया और वहां से निजी खातों में ट्रांसफर कर दिया गया। करीब 180 करोड़ रुपए का यह घोटाला हुआ। राजस्थान के जालोर में सात लाख पेड़ लगाए गए, जिसमें से एक हजार भी नहीं बचा है लेकिन पांच साल से 2.80 करोड़ रुपया देख रेख पर खर्च हुआ है। इंदौर में एक एमजीएम मेडिकल कॉलेज के एमआरटीबी अस्पताल में एक ही मशीन की मेंटेनेंस के लिए दो कंपनियां काम कर रही थीं, दोनों को भुगतान जाता था, 43 लाख का भुगतान हुआ। जयपुर सहित राजस्थान के सभी शहरों की सड़कों पर स्ट्रीट लाइट लगाई गई, जिसमें पांच हजार रुपए की ब्रांडेड बॉडी में दो दो सौ रुपए की चाइनीज लाइट लगा दी गई। इससे स्ट्रीट लाइट की रोशनी सड़क पर नहीं पहुंचती है और इसके मेंटेनेंस पर 13.60 करोड़ रुपए खर्च हो गए।

ये पिछले एक महीने में सामने आईं कुछ प्रतिनिधि घटनाएं हैं।

इनका जिक्र इसलिए जरूरी था क्योंकि इससे पता चलता है कि सरकार का कोई भी विभाग या नागरिक जीवन से जुड़ा कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है, जिसमें भ्रष्टाचार नहीं हो रहा है। भारत एक महान धार्मिक देश है पर यहां मंदिरों का चढ़ावा चोरी हो जाता है। अय़ोध्या से लेकर बद्रीनाथ, केदारनाथ और सबरीमाला से लेकर तिरुपति मंदिर तक किसी न किसी घोटाले की खबर आई है। भारत मानवीय भावनाओं को समझने वाला देश है, लेकिन अस्पताल में दवा खरीद और मेडिकल उपकरण की खरीद में घोटाले की खबरें आई हैं।

डॉक्टर बनने के लिए जो किया जाता है वह तो अलग बात है। भारत में राष्ट्रवाद की भावना इन दिनों हिलोरें मार रही है लेकिन तिरंगा झंडा खरीदने में भी घोटाले के बारे में सोचा जा सकता है। पहले कहा जाता था कि सरकारी बाबू, अधिकारी और नेता ही भ्रष्टाचार करते हैं। लेकिन अब वह बात भी नहीं है। नेता और सरकारी अधिकारी के साथ साथ मंदिरों के पुजारी और चढ़ावा गिनने वाला आम आदमी भी भ्रष्टाचार में शामिल है। मतलब कुएं में ही भांग पड़ी है।

पिछले दिनों बिहार के बड़े समाजवादी नेता शिवानंद तिवारी ने सोशल मीडिया में एक पोस्ट लिखी, जिसमें अपने पुरखा समाजवादी नेता रामनंदन मिश्र की बात का हवाला दिया था। रामनंदन मिश्र ने कहा था, ‘हमारे देश की मिट्टी सड़ गई है। ऐसी मिट्टी में कोई भी बीज डालिए वह उगेगा ही नहीं। फलने फूलने की बात तो बहुत दूर है। इसलिए सबसे पहले इस देश की मिट्टी को ठीक करना होगा। अन्यथा कोई भी उपक्रम सफल नहीं होगा’। यह बात रामनंदन मिश्र ने 1967 में कही थी, जब पहली बार बिहार सहित देश के कई राज्यों में गैर कांग्रेस सरकारें बनी थीं। उन्होंने यह बात इस संदर्भ में कही थी कि कांग्रेस हार गई है और पहली बार गैर कांग्रेस समाजवादी सरकार बनी है तो क्या इसे देश की राजनीति बदलेगी। उन्होंने उसी समय यह आशंका जाहिर कर दी थी कि सरकारें बदलने से कुछ नहीं बदलने वाला है क्योंकि देश की मिट्टी सड़ गई है।

इस बहस में जाने से कुछ भी हासिल नहीं होगा कि मिट्टी कैसे सड़ी? या समाज कैसे इतना पतित हुआ? या पहले समाज पतित हुआ या राजनीति, व्यवस्था पतित हुई? यथा राजा तथा प्रजा या यथा प्रजा तथा राजा? ये उसी तरह के सवाल हैं जैसे पहले बीज आया या पेड़? इन सवालों का निश्चित जवाब नहीं दिया जा सकता है। क्योंकि रामनंदन मिश्र ने 1967 में देश की मिट्टी सड़ जाने की बात कही थी और 1985 में हरिशंकर परसाई ने लिखा था कि ‘समाज में धिक्कार की एक शक्ति होती है, जो समाज ने खो दी है’। पहले कोई भ्रष्टाचार से कमाई करता था तो उसे अपमान की दृष्टि से देखा जाता था। लेकिन अब जिसके पास जितनी ज्यादा अपराध और भ्रष्टाचार की कमाई है वह उतना ज्यादा सम्मानित नागरिक है।

जो जितना ज्यादा वैचारिक समझौते करता है वह उतना ज्यादा सम्मानित नेता है। जो जितना ज्यादा दलबदल करता है वह उतना कामयाब नेता है। घूस खाना सामान्य शिष्टाचार की बात है। कोई अधिकारी घूस लेकर लेकर काम कर दे तो वह सम्मान का पात्र माना जाता है क्योंकि घूस लेकर काम नहीं करे तब भी आप उसका कुछ नहीं कर सकते हैं।

निजी और सार्वजनिक जीवन में नैतिकता का लोप, उपभोग और दिखावे की संस्कृति की प्रधानता और योग्यता की अनदेखी को इसका मुख्य कारण माना जा सकता है। देश में जब कोई भी काम योग्यता के आधार पर नहीं होगा तो किसी भी काम में योग्यता नहीं तलाश सकते हैं। ज्ञान की जगह मूढ़ता को प्रोत्साहित करने, योग्यता की जगह स्वामीभक्ति को प्रश्रय देने, ईमानदारी व वैचारिक निष्ठा की जगह बेईमानी व सिद्धांतहीनता को बढ़ावा देने, राजनीतिक फायदे के लिए सामाजिक विभाजन को बढ़ाने और सत्ता के लिए हर नैतिक पैमाने को ध्वस्त करने का दुष्परिणाम आज जीवन के हर क्षेत्र में दिखाई देने लगा है। इसे बहुत जल्दी नहीं बदला जा सकेगा। आने वाले दिनों में और गिरावट आएगी।


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