क्या अब युवाओं से लड़ेगी सरकार?

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

पिछले कुछ दिनों से राजनीतिक संदर्भ में जिस ‘जेन जी’ की बात हो रही थी उसके आक्रोश की एक झलक जंतर मंतर पर दिखी है। हजारों की संख्या में छात्र और युवा जंतर मंतर पर इकट्ठा हुए और उन्होंने सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के उठाए मुद्दों का समर्थन किया। विपक्ष और सिविल सोसायटी के किसी भी आंदोलन से अपने को पूरी तरह से सुरक्षित मान रही केंद्र सरकार के लिए यह हैरान करने वाला घटनाक्रम था। सरकार में शायद किसी ने नहीं सोचा था कि जिस युवा वर्ग या आकांक्षी युवा वर्ग के अंदर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति एक समय इतना आकर्षण था वह कैसे सरकार के खिलाफ किसी प्रदर्शन का हिस्सा हो सकता है? सरकार को लग रहा था कि उसके खिलाफ कोई लोकप्रिय प्रदर्शन नहीं हो सकता है।

इसी वजह से कॉकरोच जनता पार्टी और सोनम वांगचुक के प्रदर्शन को भी सरकार ने गंभीरता से नहीं लिया। सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में ऐसे टूल्स विकसित कर लिए हैं, जिनसे हर आंदोलन की साख बिगाड़ी जा सकती है। किसान और पहलवान आंदोलन में उस टूल का इस्तेमाल हुआ। कहीं आंदोलनकारियों को खाप से जोड़ा गया तो कहीं खालिस्तानियों से। किसी आंदोलन को अर्बन नक्सल यानी उग्र वामपंथ का आंदोलन बताया गया तो किसी को सोरोस प्रायोजित यानी विदेशी साजिश बताया गया। विपक्ष की साख पहले बिगाड़ी जा चुकी है। इसलिए सरकार पूरे भरोसे में थी कि कम से कम अभी उसे जनता के किसी लोकप्रिय विरोध का सामना नहीं करना पड़ेगा। तभी उसने युवाओं को प्रदर्शन को कानून व्यवस्था की समस्या की तरह समझा और उसी तरह हैंडल करने का प्रयास किया।

लेकिन इस अति आत्मविश्वास और जनता को फॉर गारंटेड लेने की सोच सरकार पर भारी पड़ गई। अब तक सरकार असहमति और प्रतिरोध को जिस चश्मे से देख रही उसी चश्मे से उसने छात्रों और युवाओं के इस प्रतिरोध को भी देखा था। यही सरकार मात खा गई। हालांकि इस आधार पर अभी कोई राजनीतिक निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है। लेकिन सरकार के लिए यह चेतावनी की तरह है। इस आंदोलन की सबसे खास बात यह है कि इसे वामपंथ या दक्षिणपंथ के सिद्धांतों से परिभाषित नहीं किया जा सकता है। यह भी कह सकते हैं कि इसे किसी भी स्थापित सिद्धांत से परिभाषित नहीं कर सकते हैं क्योंकि यह सिद्धांत से ज्यादा एक पीढ़ी से जुड़ा आंदोलन है। यह आंदोलन एक पीढ़ी की आकांक्षाओं को प्रतीकित करता है।

यह वो पीढ़ी है, जिसकी स्मृति में वो चीजें नहीं हैं, जो अभी तक राजनीति को प्रभावित करती आ रही थीं। ध्यान रहे भारत की राजनीति पिछले करीब चार दशक से मंडल और कमंडल के इर्द गिर्द घूम रही है। जाति का समीकरण और धर्म के आधार पर एकजुटता ये दो बुनियादी तत्व हैं, जिनसे भारत की समकालीन राजनीति परिभाषित होती है। लेकिन शिक्षा और परीक्षा की व्यवस्था की गड़बड़ियों को दूर करने की मांग लेकर जंतर मंतर पर जो युवा पहुंचे और सोशल मीडिया पर जिन लोगों ने इस आंदोलन को समर्थन दिया वे मंडल और मंदिर के आंदोलन के प्रत्यक्षदर्शी नहीं हैं। उन्होंने इनके बारे में सुना है। इसे अनुभव नहीं किया है। तभी इन दो मुद्दों ने देश की राजनीति की जो बाइनरी तय की है, उसे यह आंदोलन तोड़ सकता है। यह सिर्फ सत्तारूढ़ दल के लिए, बल्कि देश की सभी पार्टियों के लिए राजनीति को समझने का एक नया टेम्पलेट देता है। यह जाति व धर्म, वामपंथ व दक्षिणपंथ और देशभक्त व देशद्रोही की बाइनरी से अलग है।

ध्यान रहे मंडल की राजनीति करने वाली पार्टियां जितनी सहजता से पुरानी पीढ़ी के लोगों को यकीन दिलाती थीं कि पहले समाज ऐसा था कि ऊंची जाति के लोग पिछड़ी जातियों को अपने दरवाजे पर बैठने नहीं देते थे, उतनी सहजता से यह बात ‘जेन जी’ को समझना मुश्किल है। 14 से लेकर 28 साल तक की उम्र के नौजवान की अपनी स्मृति ऐसी बातों की नहीं है। वह समाज की ज्यादातर व्यवस्था में एकरूपता देख रहा है। यह सही है कि मंडल के बाद की राजनीति ने समाज की तस्वीर बदलने और एकरूपता लाने में बड़ी भूमिका निभाई। लेकिन जिस पीढ़ी ने बदली हुई तस्वीर देखी है उसे पुरानी तस्वीर दिखा कर बहुत समय तक अपने साथ नहीं जोड़े रखा सकता है।

बिल्कुल यही बात मंदिर आंदोलन वालों के लिए है। ‘जेन जी’ ने उनका आंदोलन नहीं देखा है। ‘जेन जी’ देश भर में शिला पूजन का गवाह नहीं रहा है। उसने लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा नहीं देखी है। उसने कारसेवकों पर गोली चलते भी नहीं देखा और न अयोध्या में विवादित ढांचा गिराने वाली कार सेवा देखी। इसलिए उन बातों की याद दिला कर आप लंबे समय तक इस पीढ़ी के युवाओं की भावनाओं को उद्वेलित नहीं रख सकते हैं। जिन लोगों ने 2014 में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए वोट किया उन्होंने भी उनके विकास के वादे पर ज्यादा भरोसा किया था। महंगाई रोकने और काला धन वापस लाने के उनके वादे ने लोगों को उनके साथ जोड़ा था। दुर्भाग्य से बाद के चुनावों में ये सारे मुद्दे गौण होते गए और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का मुद्दा केंद्र में आता गया।

इस बार युवाओं के आंदोलन ने जाति और धर्म या वामपंथी व दक्षिणपंथ और देशभक्त व देशद्रोही की बाइनरी में समाज को देखने के सिद्धांत की सीमाओं को उजागर कर दिया है। इस देश में 60 से 65 फीसदी आबादी 35 साल से कम उम्र के लोगों की है। जंतर मंतर के प्रदर्शन और सोशल मीडिया में उसे मिले समर्थन ने दिखा दिया है कि इतने युवा देश में निरंतर जाति औऱ धर्म का मुद्दा नहीं चल सकता है। यह आंदोलन युवाओं की निराशा और उनके आक्रोश की अभिव्यक्ति है। प्रदर्शन के लिए जुटे युवाओं और उनके परिजनों के जीवन में भी धर्म का स्थान है लेकिन वही मुख्य सरोकार नहीं है। वे चाहते हैं कि सस्ती और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले। वे चाहते हैं कि साफ सुथरे तरीके से परीक्षा हो और पारदर्शी तरीके से उत्तर पुस्तिकों की जांच हो।

वे चाहते हैं कि दाखिले या नौकरी वाली प्रतियोगिता परीक्षाएं समय पर हों और समय पऱ उनके नतीजे आए। उनको पता है कि सरकारी नौकरियां बहुत कम बची हैं। इसके लिए प्रतिस्पर्धा करने में उनको कोई समस्या नहीं है। लेकिन जब सरकार उसके लिए भी ठीक तरीके से परीक्षा नहीं करा पाए, नौकरी का विज्ञापन आने के बाद बरसों तक परीक्षा लंबित रहे, परीक्षा हो तो पेपर लीक हो जाए, पेपर हो जाए तो उत्तर पुस्तिकों की जांच में गड़बड़ी सामने आ जाए. नतीजे आएं तो उन्हें अदालत में चैलेंज कर दिया जाए, जहां सुनवाई महीनों लंबित रहे तो इन सबसे युवाओं में फ्रस्ट्रेशन बढ़ता है।

ध्यान रहे आज का युवा किसी पारंपरिक सिद्धांत से नहीं बंधा है और न पिछले चार दशक से देश की राजनीति को परिभाषित करने वाले जाति व धर्म के एजेंडे से बहुत प्रभावित है। अगर था भी तो आज मोहभंग की स्थिति है। ऐसे युवाओं से लड़ना सरकार के लिए आसान नहीं होगा। सरकार को इनसे लड़ने की बजाय इस वास्तविकता को समझना होगा कि सोनम वांगचुक किसी विचारधारात्मक आंदोलन का नेतृत्व नहीं कर रहे हैं, बल्कि एक पीढ़ी के आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं, जो अपने भविष्य को लेकर आशंकित है। उसके अंदर व्यवस्था के प्रति अविश्वास बन गया है। वह इस बात से भी आक्रोशित है कि उसके सरोकारों की सुनवाई नहीं हो रही है। इससे पहले कि वह अपने आक्रोश की हिंसक अभिव्यक्ति का रास्ता चुने सरकार को पहल करनी चाहिए और शिक्षा व परीक्षा की व्यवस्था को दुरुस्त करनी चाहिए। उससे पहले यह भी दिखना चाहिए कि सरकार युवाओं के सरोकारों के प्रति असंवेदनशील नहीं है।


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