विपक्ष में रह कर लड़े नहीं हैं मोदी

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

भारत की राजनीति का व्याकरण पिछले 12 साल में पूरी तरह से बदल गया है। सत्तारूढ़ दल और सरकार में अब कोई अंतर नहीं रह गया है। विपक्ष प्रतिद्वंद्वी की बजाय दुश्मन मान लिया गया है। समय के साथ विपक्ष के लिए चुनाव लड़ना मुश्किल होता जा रहा है तो एंटी इन्कम्बैंसी की जगह प्रो इन्कम्बैंसी की अवधारणा पर शोध किए जा रहे हैं। वैसे बिना शोध किए ही कहा जा सकता है कि यह कोई सकारात्मक अवधारणा नहीं है। ऐसा नहीं है कि सरकारें बहुत अद्भुत काम कर रही हैं, जिससे प्रभावित होकर लोग वोट दे रहे हैं।

सत्तारूढ़ दल का हारना दिन प्रतिदिन इसलिए मुश्किल होता जा रहा है क्योंकि उसे चुनाव जीतने के लिए सत्ता के कैसे भी दुरुपयोग से कोई परहेज नहीं रह गया है। सरकारें अर्थव्यवस्था की परवाह किए बगैर मुफ्त की चीजें बांटती हैं। सत्ता के संसाधनों का खुला इस्तेमाल करती हैं। एजेंसियों आदि का इस्तेमाल कर विपक्ष की संभावना को कमजोर किया जाता है। चुनावी रणनीति के नाम पर सांप्रदायिक या जातीय विभाजन को बढ़ाया जाता है हैं। यही प्रो इन्कम्बैंसी की परिभाषा है।

भारत का विपक्ष इन तमाम मुश्किलों का सामना कर रहा है और इस बीच यह कमाल का संयोग है कि लगातार चुनाव जीत रहे नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने कभी भी विपक्ष में रह कर चुनाव नहीं लड़ा है। नरेंद्र मोदी तो मुख्यमंत्री पहले बने और विधानसभा का चुनाव बाद में लड़ा। उनकी कमान में पहला विधानसभा चुनाव 2002 का था, जब वे मुख्यमंत्री थे और गुजरात का दंगा हो चुका था। कहा जाता है कि 1995 के चुनाव में उनकी अहम भूमिका थी। लेकिन उस समय तक कांग्रेस बहुत कमजोर हो गई थी और उससे पहले वाले चुनाव यानी 1990 के चुनाव में जनता दल को 70 व भाजपा को 67 सीटें मिली थी। कांग्रेस 33 सीट पर सिमट गई थी। सो, 1995 में भाजपा वहां बड़ी ताकत थी और केशुभाई पटेल, शंकर सिंह वाघेला, सुरेश मेहता आदि बड़े नेता थे।

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने 2014 का लोकसभा चुनाव लड़ा तो उस समय वे करीब 13 साल से गुजरात के मुख्यमंत्री थे और भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के दावेदार घोषित कर दिए गए थे। गुजरात के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी जब चुनाव लड़ रहे थे तो उनके पास सारे संसाधन थे। भाजपा की ताकत तो उनके साथ थी ही लेकिन गुजरात की सरकार उनकी थी और वहां के उद्योग समूहों का सद्भाव उनके साथ था। ऊपर से अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल के आंदोलन से देश में कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के खिलाफ माहौल बना हुआ था। संचार और कोयला घोटाले की सच्ची झूठी कहानियां घर घर पहुंची थी। हालांकि ऐसा नहीं है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने चुनाव में मेहनत कम की।

यहां उनकी मेहनत और रणनीति को कमतर बताना मकसद नहीं है। बस यह तथ्य सामने रखना है कि उस समय भी वे विपक्ष में नहीं थे। साथ ही जो सत्ता पक्ष में थे वे विपक्ष को दबाने और अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए सत्ता के अनैतिक इस्तेमाल की सीमा से बहुत दूर थे। हां, 2009 का चुनाव लड़ते समय लालकृष्ण आडवाणी वास्तव में विपक्ष में थे। वे हर चीज के लिए दूसरों पर निर्भर थे। ऐसी निर्भरता के साथ मोदी और शाह ने कभी चुनाव नहीं लड़ा। न गुजरात विधानसभा चुनाव और न देश का चुनाव। 2014 में एक बार केंद्र में सरकार बन गई तो उसके बाद की कहानी सबको पता है।

तभी सवाल है कि अगर कभी नरेंद्र मोदी और अमित शाह को विपक्ष में रह कर लड़ना पड़े तो क्या होगा? राहुल गांधी और दूसरे विपक्षी प्रादेशिक नेता जिन स्थितियों में अभी चुनाव लड़ते हैं अगर वैसी स्थिति में मोदी और शाह को लड़ना पड़ा तो क्या होगा? ऐसी स्थिति की कल्पना करें, जब मोदी और शाह के पास विशेष विमानों का बेड़ा नहीं हो, जेड प्लस या उससे भी ऊपर की सुरक्षा नहीं हो, पार्टी के खातों में हजारों करोड़ रुपए नहीं हों या पार्टी के बैंक खातों को केंद्रीय एजेंसियों ने सील कर दिया हो, देश के हर राज्य में कोई न कोई मुकदमा दर्ज हुआ हो, केंद्रीय एजेंसियों के अधिकारी आपको रिपोर्ट नहीं करते हों, राजभवनों में आपके लोग नहीं बैठे हों, मीडिया स्वतंत्र हो या जैसे अभी विपक्ष विरोधी है वैसा ही आपके प्रति हो, संवैधानिक संस्थाएं स्वंतत्र व निष्पक्ष होकर काम कर रही हों या तत्कालीन सत्ता के असर में हों, राज्यों में आपकी सरकारें न हों या गिनती की हों और अगर हों तो उसके खिलाफ केंद्रीय एजेंसियों की जांच चल रही हो और सबसे ऊपर जो सत्ता में बैठा हो वह हर अनैतिक साधन का इस्तेमाल करके आपकी पार्टी तोड़ रहा हो तब भी क्या मोदी और शाह का करिश्मा और उनकी रणनीति वैसे ही काम करेगी, जैसे अभी कर रही है?

ये सारे काल्पनिक सवाल हैं और निकट भविष्य में ऐसा होने की कोई संभावना नहीं दिख रही है। लेकिन इस बारे में विचार करना रोचक है। कहा जा सकता है कि नरेंद्र मोदी से भी गुजरात दंगों के मामलों में एसआईटी ने पूछताछ की थी या सोहराबुद्दीन कांड में अमित शाह की गिरफ्तारी हुई थी। लेकिन स्थितियां अलग थीं। गुजरात दंगों को लेकर जब नरेंद्र मोदी निशाने पर आए तो उस समय केंद्र में भाजपा की ही सरकार थी। दंगों की जांच के लिए एसआईटी गठन का मामला सुप्रीम कोर्ट में था और सुप्रीम कोर्ट के कहने पर एसआईटी बनी थी। हालांकि यह सही है कि उस समय केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार थी। अमित शाह के खिलाफ भी जो मामला दर्ज हुआ वह कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार के समय हुआ औऱ सीबीआई ने मामले की जांच की। निश्चित रूप से तब भी एजेंसी ने राजनीतिक दबाव में काम किया होगा।

तभी यह भी सवाल है कि क्या इसलिए दोनों नेताओं के मन में कांग्रेस के प्रति कड़वाहट पैदा हुई? आज जो कटुता दिख रही है क्या उसके बीज उसी समय पड़े थे या कड़वाहट, कटुता की बजाय विपक्ष के प्रति अभी जैसा बरताव है वह सोची समझी रणनीति का हिस्सा है? जो हो यह तथ्य है कि मोदी और शाह ने विपक्ष में रह कर चुनाव नहीं लड़ा है और जब भाजपा विपक्ष में थी तब उसके नेताओं जैसे अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी को वैसी स्थितियों का सामना नहीं करना पड़ा था, जैसी स्थितियों का सामना आज के विपक्षी नेताओं को करना पड़ रहा है।


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