विपक्ष की मुश्किल होती लड़ाई

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

विपक्ष के लिए चुनाव लड़ना मुश्किल होता जा रहा है। हर छोटे बड़े चुनाव के बाद उनके सामने नई चुनौतियां आ जा रही हैं। ऐसी चुनौती, जिनके बारे में कभी सोचा भी नहीं गया। सोचें, क्या कोई कल्पना कर सकता है कि एक समय ऐसा आएगा, जब विपक्षी उम्मीदवार का नामांकन रद्द कर दिया जाएगा और उसे चुनाव लड़ने से रोक दिया जाएगा? मध्य प्रदेश में राज्यसभा के 2026 के दोवार्षिक चुनावों में यह भी हुआ। कांग्रेस की उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन एक ऐसे कारण से रद्द किया गया, जिसका अस्तित्व नहीं था। कहा गया कि उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज एक मुकदमे का ब्योरा नहीं दिया था। हालांकि वह मुकदमा नहीं था। एक निजी शिकायत थी, जो अदालत में की गई थी और अदालत ने नोटिस भेज कर पूछा था क्यों नहीं आपके खिलाफ इस मामले में कार्रवाई की जाए? खबर है कि मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होने के बाद वह नोटिस भी वापस हो गया।

चिंता की बात यह भी है कि चुनाव अधिकारी ने उम्मीदवार को बुला कर यह खामी बताई और इसे ठीक करने का मौका देने की बजाय नामांकन रद्द कर दिया। दूसरी ओर झारखंड में भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार और देश की सबसे बड़ी कंपनी रिलायंस समूह के बड़े अधिकारी परिमल नाथवानी के नामांकन में तीन गलतियां थीं तो उन्हें बुला कर इसकी जानकारी दी गई और ठीक करने के लिए 24 घंटे का समय दिया गया। जाहिर है कि चुनाव अधिकारी की नजर में भाजपा और विपक्ष के उम्मीदवार के लिए नियम के पैमाने अलग अलग हैं।

असल में मीनाक्षी नटराजन के साथ जो हुआ वह कुछ समय पहले शुरू किए गए एक प्रयोग का विस्तार था। प्रयोग की शुरुआत गुजरात की सूरत लोकसभा सीट से हुई थी। 2024 के लोकसभा चुनाव में सूरत सीट पर कांग्रेस के उम्मीदवार नीलेश कुंभानी का नामांकन रद्द कर दिया गया क्योंकि उनके प्रस्तावकों के दस्तखत जाली निकले। इसके बाद बसपा सहित आठ अन्य उम्मीदवारों ने अपना नाम वापस से लिया और भाजपा के मुकेश दलाल निर्विरोध चुनाव जीत गए। सूरत की योजना बहुत व्यापक थी। क्योंकि ऐसा नहीं हो सकता है कि बरसों राजनीति करने वाले और एक राष्ट्रीय पार्टी का उम्मीदवार बने नेता के पास पांच भरोसे के लोग नहीं हों। बहरहाल, उसी चुनाव में इंदौर में भी इस प्रयोग को अलग तरीके से दोहराने की कोशिश हुई। वहां भी कांग्रेस के उम्मीदवार अक्षय कांति बाम ने ऐन मौके पर अपना नाम ही वापस ले लिया और बाद में भाजपा में शामिल हो गए। लेकिन वहां फिर भी चुनाव हुआ क्योंकि बाकी सभी उम्मीदवारों के नाम वापस नहीं कराए जा सके। ऐसे ही 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में कम से कम तीन सीटों पर मुख्य उम्मीदवार का नामांकन रद्द हुआ, जिनमें से दो विपक्षी गठबंधन के थे और एक एनडीए का था। हालांकि वहां भी निर्विरोध चुनाव नहीं हुआ लेकिन सबको पता है कि एक मुख्य उम्मीदवार के हटने के बाद चुनाव एकतरफा हो जाता है। वैसे अब सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका पर सुनवाई हो रही है, जिसमें कहा गया है कि निर्विरोध चुनाव किसी हाल में नहीं होना चाहिए। अगर सारे उम्मीदवार नाम वापस ले लेते हैं तब भी नोटा का विकल्प देकर चुनाव कराना चाहिए ताकि एक बचे हुए उम्मीदवार के विरोधी मतदाता अपनी राय व्यक्त कर सकें।

सो, यह नहीं समझना चाहिए कि सूरत या इंदौर लोकसभा सीट पर कोई संयोग घटित हुआ या मध्य प्रदेश में मीनाक्षी नटराजन के साथ कोई संयोग घटित हुआ है या बिहार की सुगौली, कैमूर और मढौरा सीट पर नामांकन रद्द होना कोई संयोग था। यह सब एक प्रयोग का हिस्सा है। इससे पहले कभी भी इतनी बड़ी संख्या में नामांकन रद्द होने की खबर नहीं आती थी। दो साल के अंदर विधानसभा, लोकसभा और राज्यसभा तीनों चुनावों में यह एक परिघटना के तौर पर दिखा है। सो, विपक्ष के लिए एक नई और बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। वह चुनौती है कि नामांकन स्वीकार कराने की। इन प्रयोगों के तहत विपक्षी पार्टी के उम्मीदवार के नाम वापस लेने, प्रस्तावक के दस्तखत फर्जी होने, कथित तौर पर सूचना छिपाने, गलत जानकारी देने के आधार पर नामांकन खारिज हुए हैं। इसमें कई चीजें और जुड़ सकती हैं। एक काल्पनिक स्थिति के बारे में सोचें, अगर कोई मजबूत विपक्षी उम्मीदवार हलफनामे के साथ नामांकन दाखिल कर दे, जिसमें कोई आपराधिक मामला न दर्ज हो लेकिन उसके बाद राज्य के किसी थाने में पिछली तारीख में दर्ज कोई मामला सामने आ जाए और उस आधार पर उसका नामांकन खारिज हो जाए तो कोई क्या कर लेगा?

आजादी के बाद भारत में सिर्फ एक स्तर पर चुनाव लड़ा जाता था। उम्मीदवार जनता का वोट लेने के लिए लड़ते थे। प्रचार करते थे, वादे करते थे, धार्मिक या सामाजिक समीकरण बनाते थे, कई बार वोट खरीदने या छीनने की घटनाएं भी होती थीं लेकिन जो होता था वो खुले में होता था और चुनाव के दौरान होता था। हालांकि उसमें भी विपक्ष के लिए कभी भी लेवल प्लेइंग फील्ड नहीं होता था। जो सत्ता में होता था उसको कई चीजों की एडवांटेज होती थी लेकिन उसके सामने एंटी इन्कम्बैंसी का खतरा भी होता था। अब एडवांटेज कई गुना बढ़ गई है क्योंकि जो लोग सत्ता में हैं उनको सत्ता के हर टूल के कैसे भी इस्तेमाल से कोई परहेज नहीं है। दूसरी ओर एंटी इन्कम्बैंसी कई कारणों से प्रो इन्कम्बैंसी में बदलती जा रही है। सो, विपक्षी उम्मीदवार पहले से ही कमजोर पोजिशन से चुनाव लड़ता है। अब उसको कई और स्तरों पर लड़ना पड़ेगा।

पहला स्तर तो यही होगा कि उसका नामांकन स्वीकार हो जाए। नामांकन स्वीकार होने के बाद चुनाव प्रचार के दौरान किसी बात को लेकर उसे अयोग्य न ठहरा दिया जाए इसकी चिंता भी उसे लगी रहेगी। चुनाव के बाद मतगणना ठीक तरीके से हो, यह भी एक सरोकार बन गया है। उसके बाद एक लड़ाई अदालत की भी है। वहां अगर मामला जाता है तो विपक्ष के उम्मीदवारों के साथ ज्यादा संभावना वैसा ही होने की है, जैसा मीनाक्षी नटराजन के साथ हुआ है। इसमें दो स्तर और जोड़े जा सकते हैं। पहला मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर, जिसने पश्चिम बंगाल में एक बड़ा मकसद पूरा किया। दूसरा स्तर है परिसीमन, जिसकी तैयारी चल रही है। सोचें, इससे पहले कब विपक्ष को इतनी चुनौतियों के बीच लड़ना पड़ता था! अब तो चुनाव के पहले ही पलड़ा सत्ता पक्ष की ओर झुका दिखता है। आगे इस पर चर्चा करेंगे कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह के साथ हमेशा कैसे सत्ता का एडवांटेज रहा है। मोदी कभी भी विपक्ष में रह कर चुनाव नहीं लड़े हैं। अगर विपक्ष में रह कर लड़ना पड़े तो क्या करिश्मा और प्रबंधन वैसे ही काम करेगा, जैसे अभी कर रहा है? (जारी)


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