नेता नहीं होंगे पर समाजवाद का विचार रहेगा

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

एक एक करके समाजवादी नेता भारतीय राजनीति के क्षितिज से विदा होते जा रहे हैं। जेडीएस के संस्थापक, कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री और वास्तविक अर्थों में भारत के पहले एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर एचडी देवगौड़ा अब संसद में नहीं दिखेंगे। उनका कार्यकाल समाप्त हो गया है। भाजपा पर निर्भर उनकी पार्टी फिर से उनको राज्यसभा में भेजने की स्थिति में नहीं थी और भाजपा ने उनको राज्यसभा भेजने का उपक्रम नहीं किया। इससे पहले उन्हीं की राजनीतिक पाठशाला से निकले सिद्धारमैया की कर्नाटक की सत्ता से विदाई हुई। कांग्रेस ने उनको मुख्यमंत्री पद से हटा कर डीके शिवकुमार को सीएम बनाया।

सिद्धारमैया थोड़े समय तक राजनीति में सक्रिय रहेंगे लेकिन करीब 80 साल की उम्र में मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद राजनीतिक या वैचारिक प्रासंगिकता बनाए रखना लगभग नामुमकिन होता है। उनसे पहले बिहार में नीतीश कुमार की विदाई हुई। जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से निकले सबसे चमकदार सितारे नीतीश कुमार थे, जिन्होंने सार्वजनिक जीवन में शुचिता का अंत तक पालन किया। वे राज्यसभा में जरूर हैं लेकिन शारीरिक व मानसिक रूप से ऐसी अवस्था में नहीं हैं कि अपनी वैचारिक, राजनीतिक यात्रा जारी रख सकें। मुलायम सिंह यादव और शरद यादव का निधन हो चुका है और लालू प्रसाद यादव चुनाव नहीं लड़ सकते हैं।

यह बहस का विषय हो सकता है कि भारत के समाजवादी नेताओं ने देश को क्या दिया या देश के विकास में उनका क्या योगदान है लेकिन यह बहस तो हर विचार के नेता या पार्टी को लेकर हो सकती है। उदार लोकतांत्रिक व पूंजीवादी पार्टियों ने देश को क्या दिया या उसके नेताओं का क्या योगदान है यह भी सवालों के घेरे में है। फिर भी उस बहस में गए बगैर इस पर विचार करने की जरुरत है कि एक एक करके समाजवादी नेताओं की विदाई हो रही है और उनके राजनीतिक स्पेस से विदा हो जाने का देश की राजनीति और समाज पर क्या असर हो सकता है।

कह सकते हैं कि जब राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण गए या मधु लिमये और किशन पटनायक गए तब भी यह सवाल उठा होगा कि समाजवाद के विचार का क्या होगा और अब इस विचार पर आधारित राजनीति कैसे चलेगी? लेकिन तब भी राजनीति चलती रही और यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि इन लोगों की पाठशाला से निकले नेताओं ने विचार के स्तर पर भले समाजवाद को समृद्ध नहीं किया हो लेकिन राजनीतिक रूप से बड़ी कामयाबी दिलाई। लोहिया, जेपी, लिमये आदि जो कामयाबी नहीं हासिल कर पाए वह चंद्रशेखर, मुलायम, लालू, शरद, नीतीश आदि ने प्राप्त की।

परंतु अब यह परंपरा आगे कायम नहीं रह पाएगी और इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए कोई बहुत बौद्धिक कसरत करने की आवश्यकता नहीं है। इसका सीधा कारण है कि लोहिया और जेपी के शिष्यों ने अपने वैचारिक उत्तराधिकारी नहीं बनाए। उन्होंने न तो समाजवाद के विचार का प्रसार किया और न उस विचार को आगे ले जाने वाले नेता तैयार किए। इन सभी लोगों ने अनिवार्य रूप से अपने परिवार के सदस्यों को ही अपनी राजनीतिक और वैचारिक विरासत का उत्तराधिकारी बनाया। लोहिया, जेपी या किशन पटनायक, मधु लिमये या मधु दंडवते ने अपने परिवार के लोगों को समाजवाद की विरासत नहीं सौंपी थी। लेकिन मुलायम सिंह से लेकर शरद यादव और लालू प्रसाद से लेकर नीतीश कुमार और सिद्धारमैया तक सबने अपना उत्तराधिकारी अपने बेटों को ही बनाया है। इसलिए इस बात की शून्य संभावना है कि ये लोग समाजवाद की राजनीति को विचार के स्तर पर आगे ले जा पाएंगे।

वैसे भी यह व्यापक रूप से पूंजीवादी उदार लोकतांत्रिक व्यवस्था को स्वीकार करने और वैकल्पिक राजनीतिक विचार के समाप्त होने का समय है। जैसे पूरी दुनिया में पूंजीवादी उदार लोकतांत्रिक व्यवस्था एक स्वाभाविक विकल्प के रूप में स्वीकार की जा रही है वैसे ही भारत में भी होगा। किसी भ्रम में रहने की जरुरत नहीं है कि दुनिया के कई देशों में लेफ्ट, लेबर या सोशल डेमोक्रेट्स की सरकारें बन रही हैं तो वह पूंजीवादी उदार लोकतांत्रिक व्यवस्था से अलग होगी। भारत में भी उदार आर्थिक नीतियों वाली कांग्रेस के बरक्स जो वैकल्पिक राजनीति करने वाली ताकतें थीं वो सब अब एक धारा की राजनीति करती हैं।

जो थोड़ी बहुत अलग राजनीति कर सकते थे उनकी विदाई हो रही है या उनकी राजनीति कमजोर हो रही है। समाजवादी पार्टियों के साथ साथ कम्युनिस्ट पार्टियों का भी ह्रास हुआ है और द्रविड राजनीति भी हाशिए में जाती दिख रही है। बहरहाल, अगर चेहरों की बात करें तो निश्चित रूप से पिछले पांच दशक से देश की राजनीति को किसी न किसी रूप में प्रभावित कर रहे समाजवादी चेहरे देश की राजनीतिक क्षितिज से विदा हो गए हैं।

अब सवाल है कि क्या समाजवादी मुद्दे भी उनके साथ विदा हो गए हैं या वे बचे हुए हैं? यह बहुत दिलचस्प है कि पारंपरिक रूप से पूरी दुनिया में समाजवाद और साम्यवाद कमजोर हुआ है लेकिन उनके मुद्दे ज्यादा प्रभावी ढंग से उभर कर आए हैं। तभी ‘जेन जी समाजवाद’ का जुमला पूरी दुनिया में चल रहा है। कई जगह ‘मिलेनियल’ और ‘जेन जी’ को मिला कर ‘एमजी’ का जुमला गढ़ा गया है। जेन जी का मतलब ऐसे युवाओं से है, जिनका जन्म 1997 से 2012 के बीच हुआ और मिलेनियल का मतलब ऐसी आबादी जो 1981 से 1996 के बीच पैदा हुआ।

इन दोनों को मिला कर देखें तो 14 से 45 साल के लोग इस श्रेणी में आते हैं। इनका समाजवाद वही है, जो पारपंरिक रूप से रहा है। फर्क यह है कि ये, ‘जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी’ या ‘जितनी आबादी उतना हक’ का नारा नहीं दे रहे हैं। ये किसी कॉमन गुड के लिए संगठित होकर पार्टी नहीं कर रहे हैं और न यह मांग कर रहे हैं कि सर्वहारा की सरकार बने या सभी फैक्टरियों को सरकार अपने नियंत्रण में ले ले।

दुनिया की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘द इकोनॉमिस्ट’ ने इनके लिए ‘जेन जी समाजवाद’ का जुमला गढ़ा। इनकी मांग वही है, जो समाजवादी सिद्धांत का मूल है। ये मांग कर रहे हैं कि सबको सम्मानजनक नौकरी व समय पर वेतन मिले, सबको अफोर्डेबल घर मिले, चाइल्ड केयर की सुविधा मिले, सस्ती शिक्षा व स्वास्थ्य की सुविधा मिले, शिक्षा लोन ब्याज मुक्त हो, परिवहन सुविधा सस्ती हो, सिर्फ अमीरों पर टैक्स लगे आदि आदि। अगर इस पीढ़ी का युवा यह मांग करता है और इसके लिए ऑनलाइन या सड़क पर उतर कर आंदोलन करता है तो तय मानिए कि समाजवादी नेता या समाजवादी नाम वाली पार्टियां बचें या न बचें समाजवाद का एजेंडा जरूर बचा रहेगा।


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