पेट्रोल, डीजल की कीमतें कब तक नहीं बढ़ेंगी?

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

हर व्यक्ति इस सवाल का जवाब जानना चाह रहा है कि आखिर कब तक पेट्रोल और डीजल के दामों में बढ़ोतरी नहीं होगी। हालांकि देश की जनता होशियार है और खुद ही इसका जवाब भी दे रही है। आम बातचीत में भी लोग कह रहे हैं कि पांच राज्यों के चुनाव हैं इसलिए कीमत नहीं बढ़ाई जा रही है। चुनाव खत्म होते ही कीमतें बढ़ने लगेंगी। असल में पहले अनेक बार ऐसा हो चुका है इसलिए जनता अपने अनुभव के आधार पर यह निष्कर्ष निकाल रही है। वैसे पेट्रोलियम मार्केटिंग कंपनियों ने अलग अलग किस्म के ईंधन की कीमत में बढ़ोतरी शुरू कर दी है। प्रीमियम पेट्रोल की कीमतों में 2.35 रुपए प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई है।

थोक में बिकने वाली डीजल यानी इंडस्ट्रियल फ्यूल की कीमत में तो एक बार में 22 रुपए प्रति लीटर यानी 25 फीसदी की बढ़ोतरी की गई है। इसका असर आने वाले दिनों में कई उत्पादों की कीमतों में दिखाई देगा। इसी तरह जेट फ्यूल यानी एटीएफ की कीमतों में भी इजाफा हो गया है। रसोई गैस के दाम तो बढ़ाए ही गए हैं। ईरान में जंग शुरू होने के साथ ही घरेलू रसोई गैस के सिलेंडर की कीमत में 60 रुपए और कॉमर्शियल रसोई गैस सिलेंडर की कीमत में 115 रुपए की बढ़ोतरी हुई।

सो, अब सिर्फ सामान्य पेट्रोल और डीजल या सीएनजी व पीएनजी बचे हैं, जिनकी कीमत में बढ़ोतरी नहीं हुई है। क्या सरकार सचमुच पांच राज्यों के चुनाव खत्म होने तक पेट्रोलियम मार्केटिंग कंपनियों को इन उत्पादों की कीमत नहीं बढ़ाने देगी? ध्यान रहे यह बच्चों को बहलाने वाली बात है कि सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत बाजार के ऊपर छोड़ दी है। अगर ऐसा होता तो जब कच्चे तेल की कीमत 60 डॉलर प्रति बैरल तक कम हुई थी तो भारत में भी पेट्रोल और डीजल की कीमतें उसी अनुपात में कम हुई होतीं और अब जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का दाम 115 डॉलर प्रति बैरल हो गया है तो उसी अनुपात में कीमत बढ़नी भी चाहिए थी। ध्यान रहे कच्चे तेल की कीमत भले 115 डॉलर प्रति बैरल है लेकिन इंडियन बास्केट में तेल की कीमत डेढ़ सौ डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है और डॉलर की कीमत 94 रुपए हो गई है। इसलिए भारत में पेट्रोलियम कंपनियों की सांस फूल रही है।

यह ध्यान रखने की जरुरत है कि जिस संकट की वजह से कच्चे तेल की कीमत बढ़ रही है वह संकट तुरंत समाप्त नहीं होने वाला है। यह संकट बहुआयामी है। ईरान पर अमेरिका और इजराइल के हमले से इस संकट की शुरुआत हुई। लेकिन जैसे जैसे जंग की समय अवधि बढ़ती गई और उसका स्वरूप बदलता गया वैसे वैसे संकट बढ़ता गया। खुद अमेरिका ने माना कि उसने नहीं सोचा था कि अगर ईरान पर हमला करेगा तो ईरान खाड़ी के दूसरे देशों पर हमला बोल देगा। उसने यह भी नहीं सोचा था कि ईरान होरमुज की खाड़ी को बंद कर देगा, जहां से दुनिया की 20 फीसदी तेल और गैस गुजरता है। ईरान की जंग में यह सब हो रहा है। ईरान ने होरमुज की खाड़ी बंद कर दी है। वहां से दुनिया का 20 फीसदी तो भारत का 40 फीसदी तेल और गैस गुजरता है।

लेकिन कीमत बढ़ने या आपूर्ति कम होने का एकमात्र कारण होरमुज की खाड़ी का बंद होना नहीं है। जंग के बीच इजराइल ने ईरान के साउथ पार्स गैस फील्ड पर हमला किया, जिसके जवाब में ईरान ने कतर के सबसे बड़े गैस प्लांट रास लफान पर हमला कर दिया. उसने सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, बहरीन, ओमान जैसे देशों के ऑयल और गैस फैसिलिटी पर भी हमला किया। जब से ईरान ने तेल और गैस ठिकानों पर हमले किए हैं, तब से संकट और गहरा हो गया है। होरमुज की खाड़ी बंद होने से कई खाड़ी देशों में रिफाइनरी का काम बंद हो गया था क्योंकि टैंकर नहीं भरे जाने की वजह से उनकी स्टोरेज फुल है। सो, तेल के कुएं बंद हो गए। उन्हें चालू करने में बहुत समय लगेगा। दूसरे, ईरान के हमले से बुनियादी ढांचे को इतना नुकसान हुआ है कि उसे ठीक करने में भी कई बरस लगेंगे।

यानी अगर युद्ध अभी समाप्त हो जाए और होरमुज की खाड़ी खुल जाए तब भी पहले जैसी तेल और गैस की आपूर्ति बहाल होने में बहुत समय लगेगा। यह भी समझ लेना चाहिए कि ईरान के साथ युद्धविराम की संधि हुए बगैर किसी हाल में या किसी तरीके से दुनिया होरमुज की खाड़ी नहीं खुलवा सकती है। असल में होरमुज की खाड़ी ईरान की धमकी से ज्यादा इस वजह से बंद है कि दुनिया की बीमा कंपनियों ने जहाजों को बीमा देना बंद कर दिया है। अगर युद्धविराम नहीं होता है तो कोई कंपनी बीमा देने की जोखिम नहीं लेगी। इसलिए चुनिंदा टैंकर ही वहां से निकल पाएंगे। ईरान और इजराइल के बीच सहमति से युद्धविराम संधि पर दस्तखत हो जाए तभी जहाजों की सुरक्षा की गारंटी हो पाएगी। अन्यथा होरमुज की खाड़ी से गुजरने वाले जहाजों पर संकट की तलवार लटकी रहेगी। ध्यान रहे ईरान के पास ड्रोन की क्षमता है तो समुद्र के अंदर अनमैन्ड व्हीकल की क्षमता भी है, जिससे वह समुद्र के तल में विस्फोटक बिछा सकता है। इसलिए सैन्य बल से होरमुज की खाड़ी खुलवाने का विकल्प कभी भी कारगर नहीं होगा।

संधि के बाद भी होरमुज की खाड़ी से और इस तरह की दूसरी करीब आधा दर्जन खाड़ियों से कार्गो जहाजों या तेल टैंकरों का गुजरना महंगा हो सकता है क्योंकि ईरान ने होरमुज से गुजने वाले जहाजों पर टोल लगाने का फैसला किया है। अगर ईरान को इसकी मंजूरी मिल जाती है तो फिर दुनिया के दूसरे रास्तों के लिए भी मौका होगा उन रास्तों पर नियंत्रण रखने वाले देश जहाजों से टोल वसूलना शुरू करेंगे। हो सकता है कि युद्धविराम हो तो संधि के तहत इसका भी रास्ता निकाला जाए। बहरहाल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद संसद में दिए भाषण में माना कि ईरान युद्ध का असर लंबे समय तक रहेगा। इसका अर्थ है कि सब कुछ सामान्य होने के बाद भी भारत में पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति सामान्य रूप से बहाल होने और कीमतों की स्थिरता में समय लगेगा। ध्यान रहे रूस ने भी भारत को पहले जितनी छूट देनी बंद कर दी है। एक सिल्वर लाइनिंग यह है कि नुकसान की भरपाई के लिए तेल उत्पादक देश खास कर ओपेक देश उत्पादन बढ़ाएंगे और उससे कीमतों में कमी आएगी। ध्यान रहे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से युद्धविराम की बात करने भर से कच्चे तेल की कीमत एक सौ डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गई। चूंकि गैर ओपेक देशों जैसे अमेरिका, अफ्रीकी देश और लैटिन अमेरिका में भी तेल का उत्पादन बढ़ा है। इससे ओपेक देश उत्पादन कम नहीं कर पा रहे हैं। पहले वे उत्पादन कम करके कीमत बढ़ाते थे। लेकिन अब ऐसा नहीं कर रहे हैं। इससे एक उम्मीद है कि ओपेक और गैर ओपेक देशों का उत्पादन बढ़ेगा तो कीमतें स्थिर होंगी। फिर भी उसमें समय लगेगा।


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