यह कैसा अविश्वास प्रस्ताव था?

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

विपक्षी नेताओं की ओर से कहा जा रहा है कि अविश्वास प्रस्ताव लाने का उनका मकसद पूरा हो गया। वे देश को बताना चाहते थे कि स्पीकर ओम बिरला पक्षपात करते हैं और नेता विपक्ष राहुल गांधी को बोलने नहीं दिया जाता है। दूसरे विपक्षी सांसदों को भी बोलने से रोका जाता है और उनके माइक बंद कर दिए जाते हैं। लेकिन इसमें से कौन सी ऐसी बात है, जो विपक्ष के सांसद हमेशा नहीं कहते रहते हैं? जब भी सत्र चलता हा या नहीं भी चल रहा होता है तो जहां मौका मिलता है वहां ये बातें कही जाती हैं। इसके लिए अविश्वास प्रस्ताव लाने की क्या जरुरत थी? ऐसा लग रहा है कि विपक्ष इस प्रस्ताव को लेकर गंभीर नहीं था। एक औपचारिकता के तौर पर इसे पेश कर दिया गया।

ऐसा होने के कई कारण हैं। पहला कारण तो यही है कि विपक्ष ने अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के बाद वोटिंग नहीं कराई। सरकार की ओर से कहा जा रहा है कि वह वोटिंग कराना चाहती थी लेकिन विपक्ष इसके लिए तैयार नहीं हुआ। यह सही है कि इससे पहले जब भी स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आया तो वोटिंग नहीं हुई और प्रस्ताव ध्वनिमत से ही खारिज हुआ। लेकिन उस समय की स्थितियां अलग थीं। 1987 में बलराम जाखड़ के खिलाफ प्रस्ताव आय़ा था तब कांग्रेस के पास 415 सांसद थे। इसी तरह उससे पहले हुकूम सिंह के खिलाफ प्रस्ताव आया तो प्रस्ताव ही स्वीकार नहीं हुआ क्योंकि 50 सांसद पूरे नहीं हुए। उससे पहले जीवी मावलंकर के खिलाफ प्रस्ताव आया तो उस समय देश की पहली लोकसभा का मामला था, जिसमें कांग्रेस के पास प्रचंड बहुमत था। लेकिन इस बार भाजपा को बहुमत नहीं है और एनडीए के पास भी 293 सांसद ही हैं। दूसरी ओर ममता बनर्जी को मिला कर विपक्ष के पास 233 सांसद हैं। इतिहास में कभी भी विपक्ष इतना मजबूत नहीं रहा है। विपक्ष को अपनी यह मजबूती संसद में दिखानी चाहिएअ थी, जो उसने नहीं दिखाई।

सवाल है कि क्या विपक्ष को अपने अंदर बिखराव की समस्या दिख रही थी? यह भी सवाल है कि अगर चर्चा के बाद वोटिंग नहीं करानी थी तो व्हिप जारी करने का क्या मतलब था? वास्तविकता सबको पता थी कि प्रस्ताव खारिज हो जाएगा। फिर भी विपक्ष ने इसे पेश किया था तो चर्चा के बाद वोटिंग के लिए जोर देना चाहिए था। वोटिंग होती तो सरकार की ताकत का भी पता चलता। यह भी पता चलता है कि विपक्ष कितना एकजुट है। सरकार और विपक्ष दोनों से दूरी बना कर चलने वाले 17 सांसदों के रूझान का भी पता चलता। अगर विपक्ष अपनी पूरी ताकत दिखाता तो शायद आगे उसकी बात ज्यादा सुनी जाती। लेकिन विपक्ष ने यह मौका गंवा दिया और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी में जुट गया। उसका हस्र भी ऐसा ही होगा, जैसा स्पीकर के मामले का हुआ है और उस समय भी कोई ऐसी बात नहीं कही जाएगी, जो अभी नहीं कही जा रही है।

बहरहाल, वोटिंग के लिए दबाव नहीं डालने के अलावा कई और कारण हैं, जिनसे लग रहा है कि विपक्ष इस प्रस्ताव को लेकर गंभीर नहीं था। इसमें एक कारण तो यह है भी है कि जिस समय प्रस्ताव पेश किया गया उस समय विपक्ष में एकता नहीं दिखी। लोकसभा में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता राहुल गांधी और दूसरी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने इस पर दस्तखत नहीं किए। तीसरी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी तृणमूल कांग्रेस इससे दूर रही। उसके सांसदों ने प्रस्ताव पर दस्तखत ही नहीं किए। हालांकि बाद में ममता बनर्जी ने कहा कि उनके सांसद प्रस्ताव का समर्थन करेंगे लेकिन हो सकता है कि कांग्रेस को तृणमूल और दूसरी विपक्षी पार्टियों के सांसदों पर भरोसा नहीं रहा हो इसलिए वोटिंग के लिए दबाव नहीं डाला गया।

विपक्ष की अगंभीरता का पता इस बात से भी चलता है कि अविश्वास प्रस्ताव पर किसी बड़े नेता ने बोलने की जरुरत नहीं समझी। कांग्रेस ने असम चुनाव का ध्यान रखते हुए गौरव गोगोई से भाषण की शुरुआत कराई। राहुल गांधी भी दूसरे दिन तब बोले, जब केसी वेणुगोपाल ने रविशंकर प्रसाद के भाषण के बाद प्वाइंट ऑफ ऑर्डर उठाया और राहुल के जवाब देने के अधिकार की बात कही। इस पर आसन पर बैठे दिलीप सैकिया ने उनको बोलने का मौंका दिया। विपक्ष की अगंभीरता सोमवार, नौ मार्च को दिखाई दी, जब सत्र शुरू होते ही विपक्षी पार्टियों ने पश्चिम एशिया में चल रही जंग पर चर्चा कराने की मांग लेकर हंगामा शुरू कर दिया। सोचें, यह पहले से तय था कि संसद के बजट सत्र का दूसरा चऱण शुरू होगा तो पहले दिन स्पीकर के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा होगी। लेकिन पहले दिन विपक्ष पश्चिम एशिया में जंग पर चर्चा की मांग करने लगा। कोई चर्चा नहीं हुई फिर भी विपक्ष ने वह मांग छोड़ दी और 10 मार्च को अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के लिए तैयार हो गया।

स्पीकर के खिलाफ चर्चा के लिए 10 घंटे का समय आवंटित किया गया लेकिन पहले दिन सात घंटे में से सवा छह घंटे विपक्ष के हंगामे में खराब हो गए। सोचें, विपक्ष ने खुद ही प्रस्ताव पेश किया था और उस प्रस्ताव पर चर्चा में हंगामा ही होता रहा। पहले दिन सिर्फ 47 मिनट चर्चा हुई। अगले दिन जरूर छह घंटे की चर्चा चली। लेकिन उसके बाद ध्वनिमत से अविश्वास प्रस्ताव को खारिज कर दिया गया। विपक्ष अगर वोटिंग कराता तो सत्तापक्ष की पार्टियों की एकजुटता का भी पता चलता। ध्यान रहे बिहार में जो कुछ हो रहा है और चंद्रबाबू नायडू जिस तरह मौके का इस्तेमाल करते हैं उसे देखते हुए सरकार के संसदीय प्रबंधकों को ज्यादा मोलभाव करना पड़ सकता था। बहरहाल, कारण जो भी रहा हो वास्तविकता यह है कि बिना कोई प्रभाव छोड़े विपक्ष का अविश्वास प्रस्ताव खारिज हो गया।

ऊपर से ऐसा लगा, जैसे विपक्ष ने स्पीकर को जितना एक्सपोज किया उससे ज्यादा अमित शाह ने नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को कर दिया। अमित शाह ने तथ्यों के साथ बताया कि राहुल गांधी 2004 में 14वीं लोकसभा के सदस्य बन कर आए थे और 18वीं लोकसभा तक वे संसद की कार्यवाही में कितना शामिल हुए हैं। शाह ने बताया कि राहुल की उपस्थिति औसत से बेहतर नहीं है और उन्होंने ज्यादातर अहम मौकों पर संसद की कार्यवाही में हिस्सा नहीं लिया। इसमें राष्ट्रपति के अभिभाषण, बजट और अहम विधायकों का मामला शामिल है। अमित शाह ने यह भी बताया कि पिछली लोकसभा में भाजपा के पास कांग्रेस से छह गुना ज्यादा सांसद थे फिर भी कांग्रेस को बोलने का ज्यादा समय दिया गया। तभी ऐसा लग रहा है कि सरकार ने ही विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव का इस्तेमाल कर लिया।


Previous News Next News

More News

किसान सम्मान के नाम से ई-20 पेट्रोल बिकेगा

July 30, 2026

भारतीय जनता पार्टी और उसकी केंद्र सरकार के बारे में एक बात माननी होगी। दोनों अपने किसी फैसले को जस्टिफाई करने के लिए कोई भी तर्क खोज सकते हैं। जरूरी नहीं है कि फैसले को जस्टिफाई करने के लिए प्राइमरी तर्क पर ही अड़े रहे हैं। आमतौर पर कोई भी व्यक्ति या सरकार अपने फैसले…

ओवैसी का बिहार वाला दांव यूपी में भी

July 30, 2026

एमआईएम के नेता असदुद्दीन ओवैसी ने बिहार में एक दांव चला था। उन्होंने पिछले साल बिहार विधानसभा चुनाव से पहले लालू प्रसाद और कांग्रेस के सामने प्रस्ताव रखा था कि उनकी पार्टी को गठबंधन में शामिल किया जाए। बिहार के प्रदेश अध्यक्ष अख्तरुल इमान गाजे बाजे के साथ लालू प्रसाद के निवास के बाहर पहुंच…

जस्टिस यशवंत वर्मा की क्या स्थिति है?

July 30, 2026

यह लाख टके का सवाल है कि दिल्ली हाई कोर्ट से इलाहाबाद हाई कोर्ट भेजे गए जस्टिस यशवंत वर्मा की क्या स्थिति है? साथ यह भी सवाल है कि उनके खिलाफ लंबित महाभियोग के मामले की क्या स्थिति है? संसद के सत्र आ रहे हैं और जा रहे हैं। दुनिया भर की दूसरी बातों की…

केरल हारने का कारण खोज लिया सीपीएम ने

July 30, 2026

केरल में लगातार 10 साल राज करने के बाद सीपीएम के नेतृत्व वाला गठबंधन एलडीएफ इस साल मई के चुनाव में हार गया था। उसके बाद से पार्टी में इस बात को लेकर मंथन चल रहा था कि सब कुछ ठीक था तो पार्टी क्यों हारी? इसके लिए पार्टी के बड़े नेताओं के बीच मंथन…

नीलेकणी क्या नीट खत्म करने की सिफारिश करेंगे?

July 30, 2026

इंफोसिस के सह संस्थापक और भारत में आधार क्रांति के सूत्रधार नंदन नीलेकणी के ऊपर केंद्र सरकार ने परीक्षा प्रणाली में सुधार के सुझाव देने का जिम्मा सौंपा है। भारत की अंतरिक्ष एजेंसी इसरो के पूर्व प्रमुख एस सोमनाथ को भी इस उच्चाधिकार प्राप्त कमेटी का सदस्य बनाया गया है। पता नहीं लोगों को याद…

logo