‘आत्मनिर्भर भारत’ और तेल का संकट

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

दस साल हो गए, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि भारत अपनी ऊर्जा जरुरतों के लिए दूसरे देशों पर निर्भरता को कम करेगा। प्रधानमंत्री मोदी ने सात फरवरी 2016 को ओडिशा के पारादीप में भारत की सबसे बड़ी पेट्रोलियम मार्केटिंग कंपनी इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन यानी आईओसी की एक रिफाइनरी का उद्घाटन करते हुए यह बात कही थी। उन्होंने उस समय एक लक्ष्य भी तय किया था। प्रधानमंत्री ने कहा था कि 2022 तक भारत अपनी ऊर्जा जरुरतों को पूरा करने के लिए विदेशी निर्भरता को 10 फीसदी तक कम करेगा। उस समय भारत 80 फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता था।

आज 10 साल बाद भारत का कच्चे तेल का आयात 85 फीसदी से ज्यादा हो गया है। यानी जहां दस फीसदी आयात कम होना था वहां पांच फीसदी बढ़ गया है। प्रधानमंत्री ने आयात पर निर्भरता 10 फीसदी घटाने के लक्ष्य के साथ साथ यह भी कहा था कि ऊर्जा जरुरतों के क्षेत्र में भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए काम किया जाएगा। इसके लिए उन्होंने चार क्षेत्र बताए थे, जहां काम किया जाना था। इसमें इथेनॉल मिश्रण, इलेक्ट्रिक गाड़ियों को बढ़ावा देने, नवीकरणीय ऊर्जा के स्रोतों को बढ़ाना और तेल, गैस आदि की खोज को प्रोत्साहित करना शामिल था।

सोचें, 10 साल पहले ऊर्जा के क्षेत्र में भारत को आत्मनिर्भर बनाने की बात प्रधानमंत्री के मुंह से सुनना कितना अच्छा लगा होगा! उसमें भी तात्कालिक लक्ष्य आयात में 10 फीसदी की कमी का रखा गया था। एक ब्लूप्रिंट भी पेश किया गया। लेकिन 10 साल के बाद देश कहां पहुंचा? आज स्थिति यह है कि भारत अपनी ऊर्जा जरुरतों के लिए दूसरे देशों पर पहले से ज्यादा निर्भर हो गया है। ऐसा नहीं कि सिर्फ तेल के मामले में भारत की निर्भरता बढ़ी है। हकीकत यह है कि जिस नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देकर भारत को आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ाने का संकल्प किया गया था उनके लिए भी भारत दूसरे देशों पर निर्भर है। इलेक्ट्रिक गाड़ियों को बढ़ावा देना है पर उसकी लिए बैटरी और दूसरी कई तकनीकी चीजें चीन से आएंगी। इसी तरह नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों जैसे सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने का मामला है तो उसके लिए भी सोलर प्लेट्स में लगने वाले कल पुर्जे और दूसरे उपकरण चीन से आएंगे। सोचें, हम तेल के साथ साथ वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों के मामले में भी दूसरे देशों पर निर्भर हो गए हैं।

ऐसा नहीं है कि 10 साल में इन क्षेत्रों में कोई काम नहीं हुआ। लेकिन थोड़े से काम होने से तो देश ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर नहीं बन जाएगा? जब प्रधानमंत्री ने कहा कि तेल आयात में 10 फीसदी की कमी की जाएगी और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देकर भारत को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की ओर बढ़ा जाएगा तो निश्चित रूप से उनके दिमाग में कोई योजना होगी, लंबे समय की कोई प्लानिंग होगी! फिर किसने उनको उस योजना पर काम नहीं करने दिया? ऐसा तो नहीं हो सकता है कि आत्मनिर्भरता की योजना के नाम पर थोड़ा सा उत्पादन बढ़ाने की योजना हो? जब इतनी बड़ी घोषणा की जाती है तो उसे पूरा करने के लिए उतना ही बड़ा प्रयास करना होता है। उस प्रयास में स्पष्ट कमी दिख रही है। ऐसा लग रहा है कि समय समय पर इस तरह की बातें करके प्रधानमंत्री ने लोगों को भरोसा तो दिया कि वे देश की समस्या को समझ रहे हैं और उसका समाधान करना चाहते हैं। लेकिन समाधान की दिशा में कोई गंभीर प्रयास नहीं किया। उन्होंने 2016 के बाद तेल आयात कम करने और ऊर्जा के क्षेत्र में भारत को आत्मनिर्भर बनाने की बात अनेक बार कही। लेकिन सवाल है कि क्या वे देख नहीं रहे थे कि उनकी बातों या दावों में और देश की वास्तविकता में कितना अंतर है?

आज जब संकट देश के सामने आया तो सबका ध्यान इस वास्तविकता की ओर गया है। ईरान में जंग शुरू हुए 12 दिन हुए हैं और भारत में हाहाकार मचा है। भारत सरकार को आवश्यक वस्तु अधिनियम यानी एस्मा लागू करना पड़ा है। हालांकि रसोई गैस का मामला कालाबाजारी का भी है। लेकिन यह भी सही है कि किल्लत बढ़ रही है क्योंकि भारत अपनी एलपीजी की जरुरतों का 80 फीसदी से ज्यादा खाड़ी के देशों से आयात करता है और उसके भंडारण की भी वैसी व्यवस्था देश में नहीं है, जैसी कच्चे तेल के लिए है। इसलिए संकट तो है। तभी देश भर में होटल और रेस्तरां बंद हो रहे हैं और सरकार को प्राथमिकता के आधार पर आपूर्ति के नियम बनाने पड़े हैं। सरकार ने घरेलू आवंटन को सौ फीसदी रखने को कहा है लेकिन उद्योगों और व्यावसायिक संस्थाओं के आवंटन में 20 से 30 फीसदी की कटौती हुई है। एलपीजी के अलावा तेल का संकट भी है तभी विमानन कंपनियों ने किराया बढ़ाना शुरू कर दिया है। प्राकृतिक गैस की आपूर्ति कम होने से उर्वरक से लेकर प्लास्टिक उद्योग तक करीब 75 उद्योग हैं, जहां असर हुआ है। उर्वरक के उत्पादन पर असर होगा तो अंततः उससे खाद्यान्न सुरक्षा भी प्रभावित होगी।

ऊर्जा के क्षेत्र में आयात पर निर्भरता कम करने और भारत को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में बढ़ने की घोषणा के 10 साल हुए हैं तो ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ के भी छह साल होने जा रहे हैं। कोरोना महामारी के बीच 12 मई 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस अभियान की शुरुआत की थी। सरकार की ओर से 20 लाख करोड़ रुपए के एक राहत पैकेज की घोषणा भी हुई थी। हालांकि वह पूरी तरह से क्रेडिट गारंटी की योजना थी। किसी को मदद के तौर पर इसमें से एक रुपया नहीं मिला, बल्कि सबको कर्ज देने की व्यवस्था की गई थी। लेकिन वह अलग कहानी है।

‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ के तहत तय किया गया कि भारत में बुनियादी ढांचे का विकास किया जाएगा, युवा शक्ति का अधिकतम इस्तेमाल होगा, देश की अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ेगा, तकनीक के क्षेत्र में देश को बेहतर बनाया जाएगा और मांग को पूरा करना की आत्मनिर्भर व्यवस्था बनेगी। लेकिन छह साल के बाद कोई नया क्षेत्र ऐसा नहीं है, जिसमें आत्मनिर्भरता बनी है। जब आत्मनिर्भर भारत अभियान की घोषणा हुई थी लगभग उसी समय भारत ने चीन से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को रोकने के लिए एक नियम बनाया था। अब उस नियम में ढील दे दी गई है। ऐसा लग रहा था कि चीन से दूरी बना कर भारत आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ेगा लेकिन छह साल के बाद भारत फिर उसी रास्ते पर लौटा है। ध्यान रहे चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा 10 लाख करोड़ रुपए के करीब है। भारत अगर तेल और ऊर्जा जरुरतों के लिए खाड़ी देशों या रूस, अमेरिका पर निर्भर है तो फार्मा से लेकर फार्म सेक्टर तक और ईवी से लेकर नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत तक और रोजमर्रा की जरुरत की चीजों के लिए चीन पर निर्भर है। पता नहीं आत्मनिर्भर भारत कब बनेगा अभी तो निर्भरता कम होती भी नहीं दिख रही है।


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