क्या कोई तीसरा मोर्चा भी बन सकता है?

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

अभी राष्ट्रीय राजनीति दो ध्रुवीय हो गई है। एक तरफ भाजपा के नेतृत्व वाला एनडीए है तो दूसरी ओर बिना नेतृत्व वाला ‘इंडिया’ ब्लॉक है। सोचें, आधिकारिक रूप से विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ का कोई नेता नहीं है। कोई अध्यक्ष या संयोजक नहीं है। इसका कोई सचिवालय नहीं बन पाया है, जिसकी चर्चा 2023 में हुई थी। तभी इसमें शामिल पार्टियों के नेता आपस में लड़ते रहते हैं कि अमुक व्यक्ति को इसका नेतृत्व दिया जाना चाहिए। दिलचस्प बात यह भी है कि जैसे कांग्रेस के अंदर राहुल गांधी को सर्वोच्च नेता माना जाता है वैसे ही विपक्षी गठबंधन का नेता भी उनको ही मान लिया गया है। तभी उनकी जगह नया नेता चुनने की बात होती है। हकीकत यह है कि राहुल गांधी ‘इंडिया’ ब्लॉक के नेता नहीं हैं। जब वे इसके अध्यक्ष या संयोजक नहीं हैं तो फिर उन्हें हटाने और उनकी जगह ममता बनर्जी या एमके स्टालिन या किसी और लाने की बात कहां से आती है?

फिर भी पिछले कुछ दिनों से इसकी खूब चर्चा चल रहा है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव कोलकाता गए तो उन्होंने वहां ममता बनर्जी के साथ मीडिया से बात करते हुए कह दिया कि भाजपा से लड़ने के लिए एकमात्र नेता ममता बनर्जी हैं। इसके बाद उनको विपक्ष का नेता बनाने की मांग होने लगी। मणिशंकर अय्यर ने एमके स्टालिन को विपक्षी गठबंधन के लिए बेहतर नेंता बताया और फिर कुछ दिन के बाद उन्होंने भी ममता बनर्जी को ही विपक्षी गठबंधन का नेता बनाने की वकालत की। इस बहस में उद्धव ठाकरे की शिव सेना भी कूद पड़ी। उसके मुखपत्र ‘सामना’ में भी ‘इंडिया’ ब्लॉक के नेतृत्व को लेकर लिखा गया।

हकीकत यह है कि राहुल गांधी विपक्षी गठबंधन के आधिकारिक नेता नहीं है। वे इसकी बैठकों की अध्यक्षता भी नहीं करते हैं। संसद सत्र के दौरान फ्लोर कोऑर्डिनेशन के लिए होने वाली बैठकें राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के कमरे में होती हैं। वे ही इसका नेतृत्व करते हैं। फिर भी राहुल गांधी का नाम नेता के तौर पर इसलिए आता है क्योंकि वे सबसे ज्यादा साहस के साथ केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाना बनाते हैं। वे खुल कर क्रोनी कैपिटलिज्म की बात करते हैं और अडानी व अंबानी का नाम भी लेते हैं। ऊपर से कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी है, जिसके वे सर्वोच्च नेता हैं। तभी स्वाभाविक रूप से उनको नेता मान लिया जाता है।

राहुल गांधी भले आम लोगों की नजर में विपक्ष के सबसे बड़े नेता हों लेकिन उनके साथ गठबंधन में शामिल कई पार्टियों को यह बात रास नहीं आती है। वे कांग्रेस और राहुल से अलग अपनी स्वतंत्र राजनीति करते हैं। उन्हें हमेशा इस बात की चिंता रहती है कि कांग्रेस को पुनर्जीवन मिला और उसने वापसी की तो सबसे पहले प्रादेशिक पार्टियों का पत्ता साफ होगा। इसलिए कांग्रेस के साथ प्रादेशिक पार्टियों का लव एंड हेट का रिलेशनशिप है। एक तरफ राहुल गांधी का कद बढ़ रहा है और वे विपक्ष के स्वाभाविक नेता के तौर पर स्वीकार किए जा रहे हैं तो दूसरी ओर एनडीए की तीसरी सरकार में ठीक वैसी ही गलतियां हो रही हैं या वैसा ही माहौल बन रहा है, जैसा यूपीए की दूसरी सरकार में बन रहा था। सरकार अलोकप्रिय हो रही है। अपने सबसे हार्डकोर समर्थकों के बीच वह समर्थन गंवा रही है। अंतरराष्ट्रीय हालात ऐसे बने हैं, जिसमें भारत की छवि धूमिल हुई है। इससे अंदाजा लगाया जा रहा है कि अगले चुनाव में भाजपा को अभी से ज्यादा नुकसान हो सकता है।

तभी इस साल हो रहे पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजों के बाद विपक्ष की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। अगर पश्चिम बंगाल में फिर से ममता बनर्जी जीत जाती हैं और केरल में कांग्रेस पार्टी नहीं जीत पाती है तो ममता बनर्जी को विपक्ष का नेता बनाने की मांग तेज होगी और कांग्रेस का स्टॉक तेजी से गिरेगा। उधर तमिलनाडु के नतीजे कुछ भी हों, कांग्रेस के संबंध डीएमके से प्रभावित होंगे। असल में विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने डीएमके पर इतना दबाव बनाया है कि कांग्रेस के सबसे भरोसेमंद सहयोगी एमके स्टालिन भी नाराज हुए हैं। कांग्रेस ने दबाव बना कर राज्यसभा की एक सीट ली और विधानसभा की ज्यादा सीटों के लिए भी दबाव बनाया। इससे अविश्वास बढ़ा। ध्यान रहे स्टालिन ने कमल हसन और प्रेमलता विजयकांत की पार्टी को गठबंधन में शामिल कराया है, जिन्हें वे अपने कोटे से सीट दे रहे हैं। इसलिए उनके लिए कांग्रेस या किसी भी पार्टी की सीट बढ़ाना आसान नहीं है। यह जानते हुए भी कांग्रेस ने दबाव बनाया। इसके अलावा सरकार में शामिल करने के लिए भी दबाव बनाया गया। तभी डीएमके का बिना शर्त समर्थन कांग्रेस के लिए नहीं रहेगा।

इस प्रक्रिया में अगले साल और तेजी आ सकती है। अगले साल के शुरू में पंजाब में विधानसभा के चुनाव हैं, जहां अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी लगातार दूसरी बार चुनाव जीतने का प्रयास करेगी। शराब नीति घोटाले में केजरीवाल और मनीष सिसोदिया के बरी होने और उनका केस खारिज किए जाने के विशेष अदालत के फैसले के बाद आम आदमी पार्टी के लिए माहौल बदला है। अगले ही साल गोवा का विधानसभा चुनाव है, जहां पिछली बार आम आदमी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस की वजह से कांग्रेस की दुर्दशा हुई थी। दोनों को 14 फीसदी के करीब वोट मिले थे। अगले साल के अंत में हिमाचल प्रदेश और गुजरात का चुनाव भी है। गुजरात में पिछली बार आम आदमी पार्टी ने 13 फीसदी वोट लेकर कांग्रेस की ऐसी हालत कर दी कि वह मुख्य विपक्षी पार्टी भी नहीं बन पाई। अगर अगले साल भी ऐसी ही स्थिति रहती है और कांग्रेस हिमाचल में सत्ता गंवा देती है तो 2029 के चुनाव में कांग्रेस के लिए विपक्षी गठबंधन का नेतृत्व करना नामुमकिन हो जाएगा।

अब सवाल है कि क्या अगले दो साल में होने वाले एक दर्जन राज्यों के चुनावों  में कमजोर प्रदर्शन के बाद कांग्रेस किसी दूसरी पार्टी के नेता को ‘इंडिया’ ब्लॉक का नेता मान लेगी? इसमें संदेह है। सबसे बड़ी और अखिल भारतीय पार्टी होने के आधार पर कांग्रेस ही नेतृत्व करना चाहेगी। उसके नेता कतई नहीं चाहेंगे कि ममता बनर्जी या एमके स्टालिन या अरविंद केजरीवाल या अखिलेश यादव जैसे किसी नेता का नाम घोषित करके चुनाव लड़ा जाएगा। उनका दबाव होगा कि राहुल गांधी को नेता घोषित कर चुनाव लड़ा जाए। अगर कांग्रेस चुनाव पूर्व गठबंधन में किसी दूसरी पार्टी के नेता को स्वीकार कर ले तब तो कोई बात नहीं है। तब तो ‘इंडिया’ ब्लॉक बना रहेगा। लेकिन अगर कांग्रेस ने किसी दूसरे का नेतृत्व स्वीकार नहीं किया तो फिर तीसरे मोर्चे का गठन हो सकता है। ममता बनर्जी जीतती हैं या हारती हैं इससे उनकी राजनीति नहीं बदलेगी। दोनों ही स्थितियों में वे भाजपा विरोध के चेहरे के तौर पर अखिल भारतीय राजनीति करेंगी और इसमें दूसरी पार्टियों का समर्थन उनको मिलेगा।

अब सवाल है कि ‘इंडिया’ ब्लॉक अगर एकजुट हो जाता है तो क्या वह भाजपा को हरा पाएगा? इसकी जवाब आसान नहीं है। क्योंकि विपक्षी गठबंधन अभी जिस रूप में है उसे भाजपा को हराने के लिए कुछ और करने की जरुरत है। जमीनी स्तर पर संगठन के लेकर चुनावी नैरेटिव तक के लिए उसे और मेहनत करनी होगी। दूसरा सवाल यह है कि अगर कोई तीसरा मोर्चा बना तो क्या भाजपा की राह आसान हो जाएगी? यह भी पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता है। ध्यान रहे पिछली बार भी ममता बनर्जी विपक्षी गठबंधन से अलग लड़ी थीं और उन्होंने अपने असर वाले राज्य में भाजपा को रोक दिया। इसी तरह अगर अगले चुनाव में प्रादेशिक पार्टियां मोर्चा बना कर लड़ती हैं तो वे अपने असर वाले राज्यों में भाजपा को रोक सकती है। कांग्रेस का नेतृत्व तभी बना रह सकता है, जब वह केरल जीते और असम में बेहतर प्रदर्शन करे। साथ ही अगले साल पंजाब, उत्तराखंड, गोवा, हिमाचल प्रदेश आदि राज्यों में वह चुनाव जीते। अगर ऐसा नहीं होता है तो 2029 के लिए नेतृत्व कांग्रेस के हाथ से निकलेगा या तीसरा मोर्चा बना कर प्रादेशिक पार्टियां चुनाव लड़ेंगी।


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