नीतीश के बाद बिहार की राजनीति कैसे होगी?

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

बिहार की राजनीति में बुनियादी बदलाव हो रहा है। ऐसा सिर्फ इसलिए नहीं हो रहा है कि पिछले तीन दशक से ज्यादा समय तक बिहार की राजनीति के केंद्र में रहे चेहरे बदल रहे हैं, बल्कि इसलिए हो रहा है कि पहली बार बिहार में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनाने जा रही है। पहली बार उसका मुख्यमंत्री बनने जा रहा है। भाजपा पहली बार बिहार की केंद्रीय राजनीतिक शक्ति बनने जा रही है। अभी तक वह समाजवादी पार्टियों के पीछे पीछे चल कर सत्ता में आती थी या राजनीति करती थी। भारतीय जनसंघ के जमाने में कर्पूरी ठाकुर हों या रामसुंदर दास या महामाया प्रसाद सिन्हा, समाजवादी नेताओं को जनसंघ का समर्थन रहता था और उनकी सरकार में उसके नेता मंत्री बनते थे। नब्बे के दशक की शुरुआत लालू प्रसाद यादव के राज से हुई, जिसे भारतीय जनता पार्टी ने समर्थन दिया था। ध्यान रहे उस समय 324 सदस्यों की विधानसभा थी और वीपी सिंह के नेतृत्व वाले जनता दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिला था। तब केंद्र में भी वीपी सिंह की सरकार भाजपा और लेफ्ट के समर्थन से बनी थी तो बिहार में भी इन्हीं के समर्थन से सरकार बनी।

हालांकि जल्दी ही भाजपा ने लालू प्रसाद को छोड़ दिया और जब 1994 में नीतीश कुमार ने जनता दल से अलग अपनी समता पार्टी बनाई तो थोड़े समय के बाद भाजपा के साथ उनका गठबंधन हो गया, जो एकाध बार टूटने के बावजूद अभी तक बना हुआ है। नीतीश कुमार ने दो बार राजद के साथ सरकार बनाई लेकिन वह थोड़े थोड़े समय की सरकार थी। 1995 के बाद से दो अपवादों को छोड़ कर हर बार लोकसभा और विधानसभा के चुनाव दोनों पार्टियों ने एक साथ लड़ा। हर बार भाजपा नीतीश कुमार के पीछे रही। नीतीश कुमार के चेहरे पर चुनाव लड़ा गया और वे मुख्यमंत्री बने। अब दो बदलाव होते दिख रहे हैं। पहला तो यह कि मंडल राजनीति की शुरुआत करने वाले नेताओं में से आखिरी नेता नीतीश कुमार की विदाई हो रही है और दूसरे भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार बन सकती है। ये दोनों बातें बुनियादी रूप से बिहार की राजनीति को बदलेंगी।

इस समय यह बात करने का कोई मतलब नहीं है कि कौन मुख्यमंत्री बनेगा। असली विषय यह है कि बिहार की राजनीति कैसे बदलेगी? सबसे पहला बदलाव यह दिख रहा है कि भाजपा सामाजिक समीकरण के आधार पर होने वाली राजनीति को व्यापक हिंदुत्व की राजनीति से बदलने का प्रयास करेगी। इसकी शुरुआत हो गई है। यह अनायास नहीं था कि भाजपा के नेताओं और राज्य सरकार के मंत्रियों ने बिहार में धर्मांतरण विरोधी कानून की चर्चा शुरू की। बिहार भाजपा के कई नेताओं ने कथित लव जिहाद रोकने के लिए धर्मांतरण विरोधी कानून बनाने की मांग की तो भाजपा के बड़े नेता और विधानसभा के स्पीकर प्रेम कुमार ने कहा कि दूसरे राज्यों के धर्मांतरण विरोधी कानूनों का अध्ययन किया जाएगा और जरुरत हुई तो बिहार में इसे लागू किया जाएगा। यह भी अनायास नहीं था कि भाजपा के उप मुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा ने खुले में मांस, मछली की बिक्री का विरोध किया और उस पर रोक लगाने की घोषणा की। ये दो चीजें प्रतीकात्मक हैं, जो पिछले 35 साल की राजनीति के बिल्कुल उलट हैं। बिहार के राजनीतिक स्पेस को डोमिनेट करने वाले तीन चेहरों लालू प्रसाद, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान की राजनीति से यह बिल्कुल अलग है।

हिंदुत्व के अलावा बिहार की राजनीति में राष्ट्रवाद की भी एंट्री होने वाली है। सेना की पृष्ठभूमि वाले रिटायर लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन को बिहार का राज्यपाल बनाना कोई अचानक या यूं ही हुआ फैसला नहीं है। इससे पहले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह सीमांचल के पूर्णिया में तीन दिन बैठे। उन्होंने अपनी पार्टी के नेताओं के साथ साथ केंद्र व राज्य के अधिकारियों के साथ बैठक की। उसी समय घुसपैठ रोकने और राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बिहार के कुछ मुस्लिम बहुल जिलों को पश्चिम बंगाल के मुस्लिम बहुल जिलों के साथ मिला कर अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाने की चर्चा शुरू हुई। हालांकि बाद में केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने इसका खंडन किया। परंतु वह खंडन बंगाल चुनाव की वजह से हुआ। सो, 18 फीसदी मुस्लिम आबादी और बांग्लादेश की सीमा से लगने की वजह से बिहार हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की प्रयोगशाला बनने जा रहा है। यह कितना कामयाब होगा यह नहीं कहा जा सकता है। लेकिन भाजपा इसे आने वाले दिनों में आजमाएगी।

सैद्धांतिक व राजनीतिक मुद्दों में बदलाव के अलावा एक बड़ा बदलाव यह हो सकता है कि देश के दूसरे कई राज्यों की तरह बिहार की राजनीति भी दो दलीय व्यवस्था की ओर बढ़े। यह तब होगा, जब भाजपा सबसे बड़ी ताकत के तौर पर स्थापित हो और उसका विरोध करने वाली पार्टी के तौर पर लालू प्रसाद की राजद दूसरी बड़ी ताकत बने। भाजपा का यह प्रयास होगा। अब भी बिहार की राजनीति दो ध्रुवीय रही है लेकिन दो दलीय नहीं रही है। भाजपा और कांग्रेस के अलावा राजद, जदयू, लोजपा जैसी पार्टियों की मजबूत उपस्थिति है। नीतीश कुमार को राजनीतिक स्पेस से हटाने के बाद भाजपा का प्रयास होगा कि उनकी पार्टी का वोट उसकी ओर शिफ्ट हो। अगर भाजपा यह प्रयास करती है, जो कि वह निश्चित रूप से करेगी तो नीतीश कुमार के गैर यादव पिछड़ा व अति पिछड़ा वोट का एक हिस्सा लालू प्रसाद की पार्टी राजद की ओर लौट सकता है। ध्यान रहे बिहार की तासीर में सांप्रदायिक राजनीति नहीं है और अगर भाजपा इसे बढ़ाएगी तो उसका कुछ लाभ राजद को मिल सकता है। यह स्थिति भाजपा के भी अनुकूल होगी। वह चाहेगी कि जैसे उत्तर प्रदेश में भाजपा बनाम सपा या पश्चिम बंगाल में भाजपा बनाम तृणमूल कांग्रेस या ओडिशा में भाजपा बनाम बीजू जनता दल या झारखंड में भाजपा बनाम झारखंड मुक्ति मोर्चा की लड़ाई है वैसे ही बिहार में भाजपा बनाम राजद की लड़ाई हो और बाकी पार्टियां हाशिए में जाएं।

भाजपा कुछ सैद्धांतिक बदलाव कर सकती है या ऐसे मुद्दे उठा सकती है, जो नीतीश कुमार की राजनीति के अनुरूप नहीं हैं, इस बात को नीतीश की पार्टी भी समझ रही है। तभी उसकी ओर से अपनी राजनीति को बचाने का प्रयास भी शुरू हो गया है। नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार को जनता दल यू में शामिल करा कर उनको पार्टी व बिहार के भविष्य के तौर पर पेश किया गया। पार्टी में शामिल होने के बाद निशांत एक मजार पर माथा टेकने गए तो नीतीश कुमार 10 मार्च से समृद्धि यात्रा पर निकल रहे हैं और मुस्लिम बहुल सीमांचल जा रहे हैं, जहां अमित शाह ने तीन दिन तक कैम्प किया था। जनता दल यू की कोशिश कोईरी, कुर्मी और धानुक वोट के साथ महादलित और कुछ अति पिछड़ा वोट साधने और साथ साथ पसमांदा मुस्लिम को भरोसा दिलाने की होगी। इससे जाहिर होता है कि भाजपा की राजनीति के जवाब में जनता दल यू ने अपनी पुरानी और वैकल्पिक राजनीति के दांव आजमाने शुरू कर दिए हैं। पोस्ट नीतीश पॉलिटिक्स में नेतृत्व बड़ा मुद्दा होने जा रहा है। लालू प्रसाद, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान और शकुनि चौधरी इन चारों नेताओं के बेटों ने बिहार में राजनीति संभाल ली है। इनके बीच प्रशांत किशोर भी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी राजनीति पर भी नजर रखने की जरुरत होगी।


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