नितिन नबीन बदलाव नहीं निरंतरता हैं

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

भारतीय जनता पार्टी के 12वें अध्यक्ष के रूप में नितिन नबीन की नियुक्ति हो गई है। भाजपा ने संगठन पर्व मना कर उनको अध्यक्ष के पद पर आसीन किया। पिछले महीने 14 दिसंबर को जब उनको कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया उस समय से यह चर्चा चल रही है भाजपा में ये ‘नबीन युग’ की शुरुआत है। यह एक वर्ड प्ले की तरह है। यहां नए अध्यक्ष के नाम के साथ एक नए युग की शुरुआत का संदेश देने का प्रयास किया जा रहा है। लेकिन सवाल है कि क्या भाजपा में सचमुच नए अध्यक्ष के साथ नए युग की शुरुआत होगी और दूसरा सवाल यह है कि क्या सचमुच भाजपा का जो अध्यक्ष होता है उसका कोई युग होता है?

भाजपा के अब तक 11 अध्यक्ष हुए हैं लेकिन सबके कार्यकाल को उसके युग के तौर पर नहीं देखा जाता है। 45 साल पहले जब भाजपा बनी तब से मोटे तौर पर दो ही युग रहे। एक अटल-आडवाणी का युग था और अब मोदी-शाह का युग है। बाकी इनके बीच संक्रमण का काल रहा है। सो, भाजपा में यह मोदी-शाह के युग की ही निरंतरता है। हां, उसमें नितिन नबीन को अपने आप को साबित करना है। उनका कार्यकाल इस बात से साबित होगा कि वे आगे बढ़ कर कितनी चुनौतियां स्वीकार करते हैं और उसको पूरा करने में किस तरह की भूमिका निभाते हैं।

निश्चत रूप से नए अध्यक्ष का चुनाव भाजपा के नए दौर की या नए युग की शुरुआत नहीं है, बल्कि मोदी-शाह युग की निरंतरता है। इसलिए संगठन का कामकाज पहले की तरह ही चलता रहेगा। फिर भी नितिन नबीन को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने का एक बड़ा संदेश आगे की राजनीति के लिए है। भाजपा ने दिखाया है कि वह आगे की राजनीति के लिए किसी तरह का प्रयोग करने का जोखिम उठाने को तैयार रहती है। यह मामूली फैसला नहीं था कि, जिस नेता के पास संगठन का सामान्य से ज्यादा कोई अनुभव न हो, जिसने पार्टी के राष्ट्रीय संगठन में कोई भूमिका नहीं निभाई हो और अपने राज्य में भी अपने चुनाव क्षेत्र से बाहर की राजनीति में बहुत सीमित काम किया हो उसको सीधे राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया जाए। भाजपा ने यह किया तो इसका एक बड़ा संदेश भाजपा के नेताओं के लिए था तो साथ साथ राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के लिए भी था।

याद करें कि पिछले तीन साल में राष्ट्रीय अध्यक्ष को लेकर कितने तरह के कयास लगाए जा रहे थे। जून 2024 में लोकसभा चुनाव में भाजपा की सीटें कम होकर 240 पर आने के बाद कैसे कहा जा रहा था कि अब राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ तय करेगा कि राष्ट्रीय अध्यक्ष कौन होगा। संघ की पसंद के तौर पर भाजपा के कई दिग्गज नेताओं के नाम की चर्चा हो रही थी। मोदी और शाह की पसंद के तौर पर भी आधा दर्जन से ज्यादा नेताओं के नाम की चर्चा हो रही थी। लेकिन न तो जिनको संघ की पसंद बनाया जा रहा था वे अध्यक्ष बने और न जो बड़े अनुभवी और संगठन से जुड़े नेता थे वे बने। तभी नितिन नबीन का अध्यक्ष बनना एक चुनौतीपूर्ण और जोखिम वाला फैसला भी है।

नितिन नबीन से ज्यादा चुनौती मोदी और शाह की इसलिए है क्योंकि आगे के चुनाव नतीजों और संगठन के कामकाज के लिए जिम्मेदारी उनके ऊपर ही आयद होगी। इस साल पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। उनकी सफलता और विफलता का आकलन नितिन नबीन के कामकाज से नहीं होगा। भाजपा जीतती है तो उसका श्रेय जरूर नितिन नबीन को भी मिल सकता है लेकिन हार का ठीकरा उनके ऊपर नहीं फूटेगा। न तो विपक्ष उनको जिम्मेदार ठहराएगा और न भाजपा के नेता और कार्यकर्ता उनको जिम्मेदार मानेंगे। संगठन के मामले में मोदी और शाह के अब तक के ज्यादातर फैसले मास्टरस्ट्रोक साबित होते रहे हैं या यूं कहें कि लगातार चुनावी कामयाबी मिल रही है इसलिए संगठन में किसको कहां बैठाया गया यह ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं रह जाता है। यह बात मोटे तौर पर पार्टी संगठन के पदाधिकारियों, प्रदेश अध्यक्षों और भाजपा शासित राज्यों के ज्यादातर मुख्यमंत्रियों के बारे में भी सही है। क्योंकि हर जगह चुनाव मोदी और शाह ही लड़ते दिखते हैं।

आने वाले दिनों में भाजपा की इस राजनीति की निरंतरता बनी रहेगी। अब जो काम जेपी नड्डा करते थे वह काम नितिन नबीन करेंगे। गुणात्मक रूप से कुछ भी बदलने नहीं जा रहा है। प्रतीकात्मक रूप से कुछ संदेश जरूर जाएंगे। जैसे एक संदेश अगड़ी जाति के नेता को अध्यक्ष बनाने का है। पिछले 20 साल से भारतीय जनता पार्टी अगड़ा अध्यक्ष चुनती रही है। नितिन नबीन का चुना जाना उस नीति की भी निरंतरता है। नितिन नबीन के जरिए इसका संदेश पूरे देश में होगा। एक प्रतीकात्मक संदेश पश्चिम बंगाल में भी होगा, जहां ब्राह्मण और कायस्थ भद्रलोक पहले लेफ्ट का समर्थक था और अब ममता बनर्जी का समर्थक है।

नितिन नबीन के जरिए दूसरा संदेश युवाओं का है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके अध्यक्ष चुने के बाद के भाषण में कहा कि नितिन नबीन मिलेनियल युवा हैं। उनका जन्म उस साल हुआ था, जिस साल भाजपा का गठन हुआ था। यानी भाजपा के साथ ही 1980 में उनका जन्म हुआ। हालांकि 45 साल का अध्यक्ष बनना भी भाजपा के लिए कोई आश्चर्य की बात नहीं है। अटल बिहारी वाजपेयी जब पहली बार भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष बने थे तब उनकी उम्र 44 साल थी। अमित शाह भी 49 साल की उम्र में राष्ट्रीय अध्यक्ष बने थे और नितिन गडकरी जब अध्यक्ष बने थे तब उनकी उम्र 52 साल थी

इस निरंतरता के बावजूद नितिन नबीन के जरिए भाजपा के कार्यकर्ताओं और नेताओं को यह बताया गया है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष या किसी भी बड़े पद पर पहुंचने के लिए उम्र, अनुभव या पृष्ठभूमि बहुत अहम नहीं है। नितिन नबीन के मामले में उम्र के पहलू पर ज्यादा जोर इसलिए है क्योंकि इस समय कांग्रेस के राहुल गांधी से लेकर देश के ज्यादातर राज्यों की प्रादेशिक पार्टियों का नेतृत्व अपेक्षाकृत युवा नेताओं के हाथ में है या उनके हाथ में आने वाली है। बिहार में 36 साल के तेजस्वी यादव ने कमान संभाल ली है तो झारखंड में 50 साल के हेमंत सोरेन ने पार्टी और सरकार की कमान संभाली है। उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव कमान संभाल चुके हैं। तमिलनाडु में उदयनिधि स्टालिन, पश्चिम बंगाल में अभिषेक बनर्जी, महाराष्ट्र में आदित्य ठाकरे जैसे नेता कमान संभालने वाले हैं। उससे पहले भाजपा ने अपनी तीसरी पीढ़ी के नितिन नबीन को मैदान में उतार दिया है।

सो, उम्र का मामला हो या कामकाज के तौर तरीके का उसमें निरंतरता रहेगी। अंत में प्रधानमंत्री ने भी अपने भाषण में कह दिया है कि भाजपा के अध्यक्ष बदलते हैं आदर्श नहीं बदलते। इससे भी जाहिर है कि नीतिगत तौर पर भी कुछ नहीं बदलने वाला है। इसलिए नितिन नबीन की नियुक्ति को भाजपा की मौजूदा राजनीति की निरंतरता के तौर पर ही देखने की जरुरत है।


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