पांच राज्यों में पहचान के मुद्दे पर चुनाव

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

राजनीतिक और सामाजिक बदलाव के लिहाज से यह बहुत दिलचस्प समय दिख रहा है। एक तरफ भारतीय जनता पार्टी पैन इंडिया हिंदुत्व की राजनीति को स्थापित करने की बेहद आक्रामक राजनीति कर रही है। उसने 80 और 20 वाली राजनीति को उत्तर प्रदेश की सीमा से निकाल कर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पूरे देश में आजमाने की राजनीति शुरू की है तो दूसरी ओर प्रादेशिक पार्टियों के पास इसकी काट के लिए सिर्फ भाषायी और क्षेत्रीय पहचान का मुद्दा दिख रहा है। कांग्रेस इस पूरे विमर्श से बाहर हो गई दिखती है। ऐसा लग रहा है कि उसको कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि किस वैचारिक धरातल पर अपनी राजनीतिक रणनीति बनाए।

तभी देश का राजनीतिक मुकाबला भाजपा बनाम प्रादेशिक पार्टियों का बनता जा रहा है। महाराष्ट्र में इसकी एक परीक्षा हुई है और भाजपा ने मराठी मानुष की पहचान की उद्धव और राज ठाकरे की राजनीति को बुरी तरह से परास्त किया। ध्यान रहे भाजपा की हिंदुत्व की राजनीति के प्रत्युत्तर के तौर पर ही उद्धव ठाकरे ने मुंबई में कांग्रेस और शरद पवार की एनसीपी का साथ छोड़ा और राज ठाकरे से हाथ मिलाया। उद्धव नरम तो राज ठाकरे गरम राजनीति कर रहे थे। राज ठाकरे ने उत्तर और दक्षिण भारतीयों के खिलाफ जहर उगला तो गुजरातियों के खिलाफ भी जबरदस्त आक्रामकता दिखलाई। लेकिन चुनाव जीतने के लिहाज से यह राजनीति कम पड़ गई। मुंबई में तो फिर भी उद्धव ठाकरे की जमीन कुछ बची लेकिन वहां से बाहर उनकी पार्टी पूरी तरह से साफ हो गई।

बृहन्नमुंबई महानगरपालिका यानी बीएमसी के चुनाव से भाषायी और क्षेत्रीय पहचान की राजनीति की सीमाएं उजागर हुई हैं। हालांकि मुंबई या किसी अन्य महानगर में पहचान की राजनीति की विफलता के आधार पर यह नहीं माना जा सकता है कि पूरे प्रदेश में यह राजनीति विफल हो जाएगी। इसका कारण यह है कि महानगरों की जनसंख्या संरचना काफी बदल गई है। मुंबई जैसे महानगर में 25 फीसदी के करीब आबादी उत्तर भारतीयों की है। लेकिन अगर पूरे महाराष्ट्र में मराठी अस्मिता के आधार पर चुनाव हो तो नतीजे अलग हो सकते हैं। तभी भाजपा भी मराठी और हिंदुत्व दोनों अस्मिताओं को एक साथ लेकर चलती है।

बहरहाल, इस राजनीति की पड़ताल अभी पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में होने वाली है। ये पांचों राज्य भाषायी और क्षेत्रीय पहचान की राजनीति वाले राज्य हैं। पश्चिम बंगाल में बांग्ला अस्मिता का मुद्दा है तो असम में भाषा और संस्कृति दोनों राजनीतिक संघर्ष का विषय  बने हैं। उधर तमिलनाडु में भाषायी और क्षेत्रीय दोनों अस्मिता का मुद्दा है तो केरल में अब जाकर सत्तारूढ़ लेफ्ट पार्टी ने मलयालम भाषा की अस्मिता को राजनीति में आजमाने का फैसला किया है। राज्य की लेफ्ट मोर्चा की सरकार ने केंद्र सरकार की ओर से हिंदी थोपे जाने का मुद्दा उठाया है और मलयालम भाषा बिल पेश किया है, जिसका मकसद मलयालम को नंबर एक और पहली भाषा बनाना है।

हालांकि इसे लेकर हिंदी की बजाय कन्नड़ से उसका टकराव शुरू हो गया है। कर्नाटक से लगती सीमा के पास बड़ा इलाका ऐसा है, जहां केरल के लोग कन्नड़ बोलते हैं। खैर यह स्थानीय मामला है, जिसे वही के स्तर पर सुलझाया जाएगा। लेकिन केरल में मलयालम भाषा का मुद्दा बनना यह दिखाता है कि पहचान की राजनीति किस दौर में पहुंच गई है और भाजपा के हिंदुत्व व विकास के नैरेटिव का मुकाबला करने के लिए पार्टियां किस हद तक इसका इस्तेमाल कर सकती हैं।

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी भाजपा की बढ़ती ताकत से आशंकित हैं। इसलिए वे भाजपा के हिंदुत्व और विकास के नैरेटिव का मुकाबला करने के लिए इस बार सिर्फ बांग्ला भाषा, अस्मिता व संस्कृति के नैरेटिव पर भरोसा नहीं कर रही हैं, बल्कि उसमें हिंदुत्व का तड़का भी लगा रही हैं। उन्होंने बुनियादी रूप से बांग्ला अस्मिता का मुद्दा बनाया है और बांग्ला भाषियों पर दूसरे राज्यों में हो रहे कथित उत्पीड़न को बार बार उठा रही हैं। लेकिन उनको इसकी सीमा का पता है क्योंकि यह मुद्दा उठाने के बावजूद पिछले सात-आठ साल में भाजपा 40 फीसदी वोट तक पहुंच गई है और यह बात ममता बनर्जी को चिंता में डाले हुए है। इसलिए उन्होंने इस बार हिंदुत्व का मुद्दा उसमें जोड़ दिया है।

उन्होंने न्यू कोलकाता टाउन में दुर्गा आंगन की नींव रखी है, जहां सरकार 332 करोड़ रुपए में सबसे बड़ा दुर्गा मंदिर बनवाएगी। इसी तरह सिलिगुड़ी में सबसे बड़े महाकाल मंदिर की नींव उन्होंने रखी। इस मंदिर पर करीब चार सौ करोड़ रुपए सरकार खर्च करेगी। इसकी नींव रखते हुए ममता ने जितनी बार ‘हर हर महादेव’ और ‘रक्षा करो महादेव’ के नारे लगाए उससे नरेंद्र मोदी के काशी में दिए जाने वाले भाषण याद आ गए। इससे पहले ममता दीघा में जगन्नाथ धाम बनवा चुकी हैं। उन्होंने दुर्गापूजा में पंडालों को पहले से ज्यादा पैसे बांटे हैं। सो, वे भाषायी और सांस्कृतिक अस्मिता के साथ हिंदुत्व का मुद्दा जोड़ रही हैं ताकि भाजपा का मुकाबला कर सकें। भाजपा महाराष्ट्र और गुजरात में ऐसे चुनाव लड़ती है।

उधर एमके स्टालिन पूरी तरह से भाषायी और क्षेत्रीय अस्मिता के मुद्दे पर भाजपा से टक्कर लेते दिख रहे हैं। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि उनके प्रदेश की भौगोलिक स्थिति पश्चिम बंगाल से भिन्न है और जनसंख्या संरचना भी उससे अलग है। बंगाल से शेष भारत की भौगोलिक दूरी कभी भी वैसी नहीं रही है, जैसे विंध्य पार के राज्यों की है और ऊपर से बंगाल में 30 फीसदी मुस्लिम आबादी होने की वजह से ममता की मुश्किलें स्टालिन के मुकाबले ज्यादा हैं। बहरहाल, स्टालिन पूरी तरह से तमिल अस्मिता और भौगोलिक विभाजन पर चुनाव लड़ रहे हैं। उनका जवाब देने के लिए भाजपा के पास सीधे कोई मुद्दा नहीं है और इसलिए उसने अन्ना डीएमके से तालमेल करके उसको आगे किया। भाजपा का कुछ काम नई बनी पार्टी के नेता विजय भी कर सकते हैं। फिर भी बाकी राज्यों के मुकाबले तमिलनाडु का मामला अलग है। वहां भाजपा के पास भाषायी और क्षेत्रीय अस्मिता के मुद्दे का जवाब नहीं है।

असम की स्थिति तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के बीच वाली है। असमिया भाषा और अहोम संस्कृति का मुद्दा असम में केंद्रीय नहीं है। वहां भाजपा ने बड़ी होशियारी से सांप्रदायिकता के एजेंडे को घुसपैठ से जोड़ दिया है। वह जनसंख्या संरचना बदलने और घुसपैठियों द्वारा भारत की लाखों एकड़ जमीन कब्जा करने का मुद्दा बना कर लड़ रही है। ध्यान रहे असम में भी 30 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम आबादी है। तभी भाजपा घुसपैठ का मुद्दा बना कर 70 फीसदी हिंदुओं में से ज्यादातर का वोट लेने में कामयाब हो जाती है। इस काम में उसे असम गण परिषद और बीपीएफ या यूपीपीएल जैसी क्षेत्रीय पार्टियों का साथ मिल जाता है। इस बार कांग्रेस के गौरव गोगोई ने असम की सांस्कृतिक व जातीय पहचान का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टियों से तालमेल किया है। इससे वहां की लड़ाई दिलचस्प हो गई है।


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