बंगाल में भाजपा के पास सिर्फ नैरेटिव है

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले माहौल पूरा गरम है। केंद्र की भाजपा सरकार ने अपने आजमाए हुए दांव के तौर पर चुनाव से ठीक पहले प्रदेश की भाजपा विरोधी पार्टी यानी तृणमूल कांग्रेस को केंद्रीय एजेंसियों के दम पर परेशान करने लगी है तो दूसरी ओर ममता बनर्जी अपनी आदत के मुताबिक सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन कर रही हैं और टकराव को नए मुकाम तक ले जा रही हैं। लेकिन अगर वस्तुनिष्ठ तरीके से देखें और पश्चिम बंगाल में भाजपा की ताकत व कमजोरी का आकलन करें तो पता चलेगा कि ताकत के नाम पर भाजपा के पास सिर्फ नैरेटिव है। उसके पास न तो बहुत मजबूत संगठन है, न मजबूत नेता हैं और न भाषा व संस्कृति के जरिए राजनीति को प्रभावित करने की सलाहियत है। इन सबमें वह तृणमूल कांग्रेस के मुकाबले कमजोर है।

भाजपा की सबसे बड़ी ताकत हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की राजनीति का नैरेटिव है, जिसका बहुत प्रभावी तरीके से वह राजनीतिक इस्तेमाल करती है। इस नैरेटिव का व्यावहारिक पहलू घुसपैठिए हैं। हिंदुत्व और राष्ट्रवाद दोनों की राजनीति घुसपैठियों के दम पर ही चलने वाली है। भाजपा का आरोप है कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने बांग्लादेश से आने वाले घुसपैठियों को फ्री पास दे रखा है। केंद्र सरकार कहती है कि ममता बनर्जी की सरकार जमीन नहीं देती है ताकि सीमा पर बाड़ेबंदी हो सके। यह भी आरोप है कि ममता बनर्जी की वजह से पश्चिम बंगाल की जनसंख्या संरचना बदल रही है। मुस्लिम आबादी बढ़ रही है। कई जिलों में हिंदू अल्पसंख्यक होते जा रहे हैं। हिंदुओं को अपने धार्मिक त्योहार मनाने से रोका जाता है। पूजा करने, पंडाल बनाने और विसर्जन के लिए सरकार के साथ साथ मुस्लिम समुदाय के लोगों की अनुमति लेनी होती है।

दूसरी ओर मुस्लिम समुदाय के लोग सड़कों पर कब्जा करके जो करना होता है वह करते हैं। भाजपा की सरकार बनी तो वह इस स्थिति को बदलेगी। घुसपैठ रोकेगी और राज्य में रह रहे तमाम घुसपैठियों की पहचान करके उनको बाहर निकालेगी। हालांकि दूसरे राज्यों में भाजपा के रिकॉर्ड को देखते हुए कहा जा सकता है कि इस नैरेटिव के पीछे आंकड़ों का कोई मजबूत आधार नहीं है। आखिर 10 साल उत्तर प्रदेश में और 11 साल हरियाणा में रहने के बाद भी भाजपा वहां घुसपैठियों का मुद्दा बना रही है। 10 साल सत्ता में रहने के बाद असम में भी घुसपैठ का ही मुद्दा है। वह किसी भी राज्य को घुसपैठ से मुक्त नहीं कर सकी। तभी यह नैरेटिव झारखंड में बुरी तरह से फेल हुआ था।

बहरहाल, भाजपा की सीमाओं या कमजोरियों की बात करें तो भाषायी अस्मिता वाले राज्यों में उसके लिए हमेशा समस्या रही है। यह समस्या नेतृत्व से जुड़ी हुई है। ऐसा लगता है कि भाजपा का मौजूदा नेतृत्व इस बात को समझ नहीं रहा है या समझ रहा है तो इस जिद में है कि मोदी और शाह जब पूरे देश में जीत रहे हैं तो बंगाल कैसे नहीं जीत सकते हैं। अगर दोनों नेता यह जिद छोड़ दें और वस्तुनिष्ठ आकलन करें तो पता चलेगा कि भाषायी अस्मिता वाले किसी भी राज्य में भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व ने जीत नहीं दिलाई। भाषायी अस्मिता वाले राज्यों या भाषा के आधार पर बने राज्यों में भाजपा को प्रादेशिक नेताओं ने ही जीत दिलाई। भाषा के आधार पर बने राज्यों में भाजपा को पहली जीत गुजरात में मिली थी।

भले मंदिर आंदोलन से माहौल बना हुआ था और उस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे लालकृष्ण आडवाणी गुजरात के थे फिर भी 1995 की वह जीत अटल बिहारी वाजपेयी या लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी ने नहीं दिलाई थी, बल्कि केशुभाई पटेल, शंकर सिंह वाघेला, कांशीराम राणा, नरेंद्र मोदी, संजय जोशी आदि नेताओं की मेहनत के दम पर मिली थी। ऐसे ही 1995 की ही महाराष्ट्र की जीत वाजपेयी, आडवाणी और जोशी की तिकड़ी की नहीं थी, बल्कि बाल ठाकरे, गोपीनाथ मुंडे, प्रमोद महाजन आदि की थी।

2008 में कर्नाटक की जीत भी भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व की नहीं, बल्कि बीएस येदियुरप्पा की थी। भाषा के आधार पर बने दूसरे राज्यों में भाजपा इसलिए कामयाब नहीं हो पाई है क्योंकि वहां उसके पास मजबूत नेता नहीं हैं और राष्ट्रीय नेतृत्व वहां की भाषा और संस्कृति के राजनीतिक पहलू को साधने में सफल नहीं हो पा रहा है। पश्चिम बंगाल में भी भाजपा की यह बड़ी कमजोरी है।

भाषायी अस्मिता वाले राज्यों में कामयाबी के लिए पहली जरुरत मजबूत स्थानीय नेता की है या फिर किसी मजबूत गठबंधन की है। असम भी भाषायी अस्मिता वाला राज्य है लेकिन वहां बांग्लादेशी घुसपैठ की वजह से भाजपा ने पहले ही पैर जमा लिए थे और बाद में असम गण परिषद का साथ उसको मिल गया। धीरे धीरे असम गण परिषद अप्रासंगिक होती गई और भाजपा सबसे बड़ी ताकत बन गई। हालांकि अब भी उसे अगप के साथ साथ बीपीएफ और यूपीपीएल जैसी पार्टियों की जरुरत पड़ती है।

बांग्लादेश में उसके पास न तो बहुत मजबूत स्थानीय नेतृत्व है और न किसी पार्टी के साथ उसका गठबंधन है। तभी वह नैरेटिव की ताकत पर राजनीति कर रही है। उसके पास केंद्र की सरकार है, मीडिया की ताकत है, अथाह पैसा है, राजभवन का भी राजनीतिक इस्तेमाल करने में भी कोई हिचक नहीं है तो वह माहौल बना देती है। लेकिन सिर्फ माहौल बना कर बंगाल में चुनाव नहीं जीता जा सकता है। जमीन पर ममता बनर्जी के संगठन की ताकत का मुकाबला करने वाली ताकत भाजपा के पास नहीं है।

ममता बनर्जी ने लेफ्ट पार्टियों के मोर्चे की तरह बिल्कुल नीचे तक अपना संगठन बनाया है और अपने कैडर को मजबूत किया है। उनको आर्थिक रूप से सक्षम और मजबूत बनाया है। दूसरी ओर भाजपा अपने नेताओं के प्रयोग करती रही और अंत में ममता बनर्जी की पार्टी के ही शुभेंदु अधिकारी के सहारे लड़ना शुरू किया। उसको लग रहा है कि पूर्वोत्तर के दूसरे राज्यों की तरह ही वह बंगाल में भी कर लेगी। जैसे असम में हिमंत बिस्वा सरमा या त्रिपुरा में माणिक सरकार या अरुणाचल में पेमा खांडू हैं

वैसे ही शुभेंदु अधिकारी बंगाल में नेता बन जाएंगे। लेकिन ममता बनर्जी के रहते यह आसान नहीं दिख रहा है। तभी माना जा रहा था कि अगर ईडी की छापेमारी को बाधित करने के मामले में राज्य में राष्ट्रपति शासन लग जाता तो ममता बनर्जी की मुश्किलें बढ़तीं। उनके लोग कमजोर होते और जमीन पर लड़ने की ताकत घटती। लेकिन वह नहीं हुआ है। सो, हिंदुत्व, राष्ट्रवाद और भ्रष्टाचार के नैरेटिव पर भाजपा चुनाव लड़ेगी। नैरेटिव की ताकत उसे एक सीमा तक ले जा सकती थी। वहां तक भाजपा पहुंच गई है। उसके आगे जाने के लिए ठोस और व्यावहारिक राजनीतिक ताकत की जरुरत है, जो अभी भाजपा के पास नहीं दिख रही है।


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