भारत रत्न का मतलब संन्यास नहीं होता

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

बिहार और झारखंड दोनों जगह इन दिनों भारत रत्न की चर्चा बहुत हो रही है। रोचक बात यह है कि देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान की चर्चा राजनीतिक कारणों से हो रही है। कुछ साल पहले तक भारत रत्न सम्मान को राजनीति से परे देखा जाता था। लेकिन अब यह राजनीति को प्रभावित करने वाला एक माध्यम बन गया है। 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले चौधरी चरण सिंह और कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देने की घोषणा हुई। इसके बाद चौधरी चरण सिंह के पोते जयंत चौधरी ने अपनी पार्टी राष्ट्रीय लोकदल का तालमेल एनडीए के साथ किया और उधर कर्पूरी ठाकुर की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा रहे नीतीश कुमार फिर से एनडीए में लौटे। अब एक बार फिर नीतीश कुमार को भारत रत्न देने की चर्चा है और इस चर्चा के साथ ही यह भी जुड़ा हुआ है कि उसके बाद उनकी लंबी राजनीतिक पारी का अंत हो जाएगा।

उधऱ झारखंड की स्थापना में सबसे बड़ी भूमिका निभाने वाले शिबू सोरेन को भारत रत्न देने की चर्चा है और उसके साथ यह राजनीति जुड़ी है कि उसके बाद हेमंत सोरेन अपनी पार्टी को एनडीए में शामिल कराएंगे। राज्य में जेएमएम और भाजपा की साझा सरकार बनेगी। पता नहीं ऐसा होगा या नहीं लेकिन जेएमएम और भाजपा की साझा सरकार बनने की संभावना को बहुत मजबूत तर्कों से न्यायसंगत ठहराने का प्रयास हो रहा है। भारतीय जनता पार्टी के नेता, हिंदुत्व व राष्ट्रवाद समर्थक न्यूज चैनल और सोशल मीडिया में राइटविंग का इकोसिस्टम इस नैरेटिव को बहुत प्रचारित कर रहा है, जिससे लग रहा है कि भाजपा को अपनी प्रासंगिकता बचाने और आदिवासी राजनीति की खोई हुई जमीन को वापस हासिल करने के लिए जेएमएम के साथ जाने की बड़ी जरुरत महसूस हो रही है।

बहरहाल, कुछ दिन पहले पटना में जनता दल यू के मुख्यालय में नीतीश कुमार को भारत रत्न की मांग करने वाले होर्डिंग्स लगे। लेकिन जैसे ही मीडिया में इसकी खबर आई वैसे ही आनन फानन में होर्डिंग्स हटा दी गईं। पिछले दिनों पार्टी के बड़े नेता केसी त्यागी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखी और उसमें नीतीश कुमार को समाजवादी राजनीति का बचा हुआ ‘अनमोल रत्न’ बताते हुए उनको भारत रत्न देने की मांग की। यह चिट्ठी सामने आते ही जनता दल यू के नेता केसी त्यागी पर टूट पड़े। कहा गया कि उनकी मांग से पार्टी का कोई संबंध नहीं है। अच्छी बात है कोई संबंध नहीं है तो लेकिन इसके लिए क्या उनको पार्टी से निकाल दिया जाएगा या पार्टी की ओर से यह कहा जाएगा कि उनका पार्टी से कोई लेना देना नहीं है?

क्या नीतीश कुमार के लिए भारत रत्न की मांग करके केसी त्यागी ने उनकी गरिमा गिराने वाला काम किया है? ऐसा कतई नहीं है। लेकिन जिस तरह से जनता दल यू के नेताओं ने प्रतिक्रिया दी है वह उनकी घबराहट और चिंता दिखाती है। ऐसा लग रहा है कि जनता दल यू नेता इस आशंका में जी रहे हैं कि किसी भी समय भाजपा कोई दांव चल सकती है और नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद से हटा कर अपना मुख्यमंत्री बना सकती है। नीतीश की पार्टी के नेताओं में भय का यह स्थायी भाव हो गया है। वे भारत रत्न की मांग को भी इसी भय की दृष्टि से देख रहे हैं।

लेकिन सवाल है कि क्या भारत रत्न मिलने का मतलब संन्यास लेना होता है? अगर किसी को अपने क्षेत्र की महान उपलब्धियों के लिए भारत रत्न मिले तो क्या उससे यह उम्मीद की जानी चाहिए कि वह उस काम को छोड़ देगा, जिसके लिए उसे भारत रत्न मिला है?

अगर कोई ऐसा सोचता है तो देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान की इससे बुरी व्याख्या कुछ नहीं हो सकती है। भारत में पंडित जवाहरलाल नेहरू की मिसाल है, जिनको तत्कालीन राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने अपनी पहल पर 1955 में भारत रत्न से सम्मानित किया और उसके बाद नेहरू अगले नौ साल तक, अपनी मृत्यु के दिन तक भारत के प्रधानमंत्री बने रहे थे। अगर भारत रत्न पाकर पंडित नेहरू प्रधानमंत्री बने रह सकते हैं तो भारत रत्न पाकर नीतीश कुमार मुख्यमंत्री क्यों नहीं बने रह सकते हैं! इस तरह की अनगिनत मिसालें हैं। भारत रत्न से सम्मानित होने के बाद सचिन तेंदुलकर ने क्रिकेट नहीं छोड़ दिया या लता मंगेशकर ने गाना नहीं छोड़ दिया था।

जिस क्षेत्र में असाधारण कार्य के लिए किसी व्यक्ति को सर्वोच्च सम्मान मिलता है उससे उम्मीद की जानी चाहिए कि वह उस कार्य को आगे जारी रखे। जैसे किसी को साहित्य का सर्वोच्च सम्मान यानी नोबल या बुकर मिलता है तो उससे उम्मीद की जाती है कि वह और श्रेष्ठ साहित्य की रचना करे। यह बात दूसरे क्षेत्र के नोबल पुरस्कार के बारे में भी कही जा सकती है। आखिरी नोबल मिलने के बाद अपना काम जारी रखा तभी मैडम क्यूरी को दूसरी बार नोबल मिला। सो, भारत रत्न मिलना राजनीति से संन्यास की शर्त नहीं है।

तभी सवाल है कि जनता दल यू के नेता इतने आशंकित क्यों हैं? जैसे ही कोई नीतीश कुमार को भारत रत्न देने की बात करता है वैसे ही जदयू नेता अतिवादी प्रतिक्रिया क्यों देने लगते हैं? असल में उनके इस भय या अतिवादी प्रतिक्रिया की जड़ें कहीं और हैं। इसकी बारीकी पर ध्यान देने की जरुरत है। भाजपा ने इस बार बिहार विधानसभा चुनाव से पहले यह ऐलान नहीं किया था कि अगर एनडीए चुनाव जीतेगी तो नीतीश कुमार मुख्यमंत्री होंगे। उसने बार बार कहा कि नीतीश कुमार के नेतृत्व में चुनाव लड़ा जाएगा। बाद के दिनों में यह भी कहा गया कि सीएम पद की वैकेंसी नहीं है। लेकिन नीतीश को सीएम का चेहरा घोषित नहीं करने का भाजपा ने जो फैसला किया उसका सीधा मतलब था कि मुख्यमंत्री का फैसला विधायकों की संख्या से होगा।

अभी संख्या ऐसी है कि दोनों में से कोई पार्टी अकेले दम पर सरकार नहीं बना सकती है। भाजपा अगर चिराग पासवान, जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा को जोड़ ले तब भी उसकी संख्या 117 ही पहुंचती है, जो बहुमत के जादुई आंकड़े 122 से कम है। ऐसे ही अगर नीतीश कुमार पहले की तरह पाला बदलें तो महागठबंधन के साथ मिल कर उनकी संख्या 120 पहुंचती है। इसमें ओवैसी की पार्टी और बसपा को जोड़ने पर आंकड़ा 125 पहुंचता है। लेकिन जाहिर है कि इसमें बहुत जोड़ तोड़ करने की जरुरत होगी और अब नीतीश कुमार व लालू प्रसाद दोनों इस स्थिति में नहीं हैं कि ऐसा कर सकें। दूसरी चुनौती यह है कि अगर ऐसा कोई प्रयास होगा तो अब भाजपा अब चुपचाप तमाशा नहीं देखेगी।

जनता दल यू की असली चिंता यही है कि भाजपा अब अकेले 89 सीट वाली पार्टी है और तीन छोटी सहयोगी पार्टियां लोजपा (आर), हम और रालोमो के 28 विधायक उसके साथ जा सकते हैं। असल में इस बार विधानसभा की जो तस्वीर बनी है वह पहले से काफी अलग है। नीतीश कुमार 85 सीट जीत कर भी उतने मजबूत नहीं हैं, जितने 43 सीट जीत कर थे। इस अंकगणित की वजह से जदयू आशंकित है। हालांकि अभी तक भाजपा ने ऐसा कोई संकेत नहीं दिया है कि वह नीतीश को हटा कर अपना मुख्यमंत्री बनाना चाहती है लेकिन ऐसा भी नहीं है कि उसकी ऐसी चाहत नहीं है।

तभी हर छोटी बड़ी बात पर जदयू के नेता डर जा रहे हैं और उसके पीछे साजिश देखने लग जा रहे हैं। उनको साहस के साथ सामने आना चाहिए और नीतीश कुमार के लिए भारत रत्न की मांग करनी चाहिए। उनको यह संदेश देना चाहिए कि नीतीश भारत रत्न के हकदार हैं और बिहार का मुख्यमंत्री बने रहने के भी हकदार हैं क्योंकि बिहार की जनता ने 202 का बहुमत उनके लिए दिया है।


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