केरल में पहली बार लेफ्ट और कांग्रेस को चुनौती

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

पांच साल बीत जाने के बाद भी कांग्रेस यह नहीं समझ पाई है कि 2021 के विधानसभा चुनाव में वह कैसे हारी। 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने राज्य की 20 में से 19 सीटों पर जीत हासिल की। राहुल गांधी अमेठी की पारंपरिक सीट से हार गए थे लेकिन केरल की वायनाड सीट से रिकॉर्ड वोटों से जीते। वे दो साल केरल की राजनीति में सक्रिय भी रहे लेकिन 2021 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस बुरी तरह से चुनाव हार गई। कांग्रेस के नेता आजतक किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचे कि आखिर केरल में हारे कैसे। यह गुत्थी कांग्रेस के लिए चिंता की बात इसलिए है क्योंकि आजादी के बाद से केरल में पांच साल पर सत्ता बदलने का रिवाज रहा है। लेकिन वह रिवाज 2021 में टूट गया। सीपीएम के नेतृत्व वाला लेफ्ट मोर्चा लगातार दूसरी बार चुनाव जीता। इससे पहले इसी तरह का रिवाज तमिलनाडु में टूटा था, जहां 2016 में अन्ना डीएमके लगातार दूसरी बार जीत गई थी। लेकिन 2021 में डीएमके ने शानदार वापसी की और बड़ी जीत हासिल की।

सो, कांग्रेस को उम्मीद है है कि 2021 का चुनाव अपवाद रहा और इस बार वह बड़ी जीत हासिल करेगी। 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस गठबंधन ने शानदार प्रदर्शन किया और इस बार तो 20 में से 20 सीटें जीत गई। कांग्रेस को सिल्वर लाइनिंग स्थानीय निकाय चुनाव में दिखी है। दिसंबर में हुए स्थानीय निकाय चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ ने बड़ी जीत दर्ज की और छह नगरीय निकायों में से चार में कांग्रेस का एक में सीपीएम का मेयर बना। एक तिरूवनंतपुरम का मेयर पद भाजपा के खाते में गया। ध्यान रहे 2019 के लोकसभा चुनाव में जीत के बाद 2020 में कांग्रेस स्थानीय निकाय चुनावों में पिछड़ गई थी। इस बार ऐसा नहीं हुआ है। इस बार लोकसभा और स्थानीय निकाय दोनों में कांग्रेस का गठबंधन जीता है। सो, 2021 जीतने का भरोसा है।

आमतौर पर केरल के बारे में हिंदी पट्टी में बहुत सी गलत धारणाएं हैं। जैसे यह धारणा है कि वहां मुस्लिम और ईसाई आबादी 45 फीसदी के करीब है तो ये दोनों ही तय करेंगे कि किसकी सरकार बनेगी। लेकिन असल में केरल की राजनीति 55 फीसदी हिंदू तय करते हैं। केरल के ब्राह्मण राजनीति में अहम भूमिका अदा करते हैं तो पिछड़ी जातियां खास कर एझवा का भी अहम रोल होता है। ऐसे ही एझवा के एक बड़े और लोकप्रिय नेता वेल्लापल्ली नतेशन को साथ लेकर मुख्यमंत्री पिनरायी विजयन घूम रहे हैं। नतेशन मुस्लिम विरोधी भाषणों के लिए चर्चित रहे हैं फिर भी विजयन उनको साथ रखे हुए हैं तो कारण यह है कि अगर मुस्लिम वोट कांग्रेस की ओर रूझान दिखाता है तो पिछड़ी जातियों के वोट लेफ्ट के साथ जुड़ें। कांग्रेस के पास एझवा समुदाय के दिग्गज नेता वायलार रवि थे लेकिन उनके नहीं रहने के बाद इस स्पेस में कांग्रेस की राजनीति कमजोर हुई है। पारंपरिक रूप से केरल के ब्राह्मण लेफ्ट पार्टियों का समर्थन करते रहे हैं।

दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी ने हिंदू वोटों की गोलबंदी की राजनीति तेज की है। उसका वोट प्रतिशत हर चुनाव के साथ बढ़ रहा है। उसे पिछले विधानसभा चुनाव में 12 फीसदी से ज्यादा वोट मिले थे। हालांकि उसे एक भी सीट नहीं मिली थी। उसके बाद हुए लोकसभा चुनाव 2024 में भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए को 19 फीसदी से ज्यादा वोट मिले और उसका खाता भी खुला। त्रिशुर में सुरेश गोपी चुनाव जीते तो तिरूवनंतपुरम में राजीव चंद्रशेखर सिर्फ 16 हजार वोट से शशि थरूर के हाथों हारे। पांच लोकसभा सीटों पर भाजपा को दो लाख से ज्यादा वोट मिले, जिनमें से दो सीटों पर उसके वोट तीन लाख से ज्यादा थे। तभी भाजपा अब एक बड़ी ताकत के तौर पर इस बार चुनाव मैदान में उतर रही है। अगर उसे ओवरऑल 20 फीसदी वोट मिलता है और तिरूवनंतपुरम, त्रिशुर, कासरगौड, अलापुझा आदि इलाकों में फोकस करके वह चुनाव लड़ती है तो वह अच्छा प्रदर्शन कर सकती है और यह कांग्रेस व लेफ्ट दोनों के लिए चिंता की बात होगी।

अगर कांग्रेस की बात करें तो गुटबाजी उसके लिए सबसे बड़ी समस्या है। केरल कांग्रेस में कई गुट हैं और कोई एक केंद्रीय नेता नहीं है। जब तक एके एंटनी सक्रिय थे तब तक केरल के फैसले वे करते थे। उनके साथ वायलार रवि और ओमन चांडी भी बड़े नेता थे। उनके बाद रमेश चेन्निथला धुरी बन सकते थे लेकिन राहुल गांधी के प्रयोगों के कारण केसी वेणुगोपाल बड़े नेता बन गए हैं। उनके अलावा वीडी सतीशन, के सुधाकरन, सनी जोसेफ सहित कई और नेता हो गए हैं। कम से कम आधा दर्जन नेताओं ने अपने गुट बनाए हैं। यह आम धारणा बनी है कि अगर कांग्रेस जीती तो वेणुगोपाल मुख्यमंत्री हो सकते हैं।

इस तरह की बातों से कांग्रेस का प्रचार बिखरा हुआ दिख रहा है। शशि थरूर वैसे तो अब कांग्रेस लाइन पर ही चलने की बात कर रहे हैं लेकिन उनकी राजनीति का ऊंट चुनाव तक किस करवट बैठेगा यह नहीं कहा जा सकता है। प्रियंका गांधी वाड्रा वायनाड सीट से सांसद हैं और वे अगर सक्रिय होकर पार्टी को एकजुट करने की कोशिश करती हैं तभी कांग्रेस मजबूती से लड़ने के लिए आगे बढ़ेगी। दूसरी समस्या इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग की ज्यादा सीटों की मांग है। पिछली बार वह 20 सीटों पर लड़ी थी लेकिन इस बार वह सीधे दोगुनी सीटों की मांग कर रही है। कांग्रेस केरल की 140 में से एक सौ से ज्यादा सीटों पर लड़ना चाहती है। उसे मुस्लिम लीग के अलावा केरल कांग्रेस के दो और आरएसएपी के दो खेमों को एडजस्ट करना होता है। तीसरी समस्या मुस्लिम वोट पर कांग्रेस की निर्भरता की है। कांग्रेस के लिए अच्छी बात यह है कि भाजपा से लड़ने वाली इकलौती मजबूत ताकत के तौर पर कांग्रेस और राहुल गांधी को देखा जा रहा है। इसलिए हो सकता है कि मुस्लिम और ईसाई दोनों भाजपा को रोकने के लिए कांग्रेस का साथ दें।

दूसरी ओर लेफ्ट के गठबंधन की चुनौती 10 साल की एंटी इन्कम्बैंसी की वजह से है। 10 साल से पिनरायी विजयन मुख्यमंत्री हैं और इस दौरान गोल्ड स्मलिंग से लेकर कई तरह के आरोप भी लगे हैं। उनकी बेटी के खिलाफ ईडी की जांच चल रही है। सहयोगी पार्टी सीपीआई ने केंद्रीय मदद के लिए भाजपा के एजेंडे पर सरकार चलाने के आरोप लगाया है तो मुस्लिम विरोधी वेल्लापल्ली नतेशन के साथ विजयन के संबंधों को लेकर भी निशाना साधा है। लोकसभा चुनाव और स्थानीय निकाय चुनाव में लेफ्ट की हार से पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरा है। हालांकि लेफ्ट के नेता इस नैरेटिव पर यकीन कर रहे हैं कि केरल के लोग दिल्ली के लिए कांग्रेस और तिरुवनंतपुरम के लिए लेफ्ट को चुनेंगे। कांग्रेस नेतृत्व वाले यूडीएफ और सीपीएम के नेतृत्व वाले एलडीएफ की इस सीधा लड़ाई में पहली बार भाजपा मजबूत चुनौती पेश कर रही है।


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