चुनाव से बड़ी बंगाल की लड़ाई

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

पश्चिम बंगाल विधानसभा की लड़ाई एक समान्य चुनावी लड़ाई नहीं है। यह उससे कहीं ज्यादा है। भारतीय जनता पार्टी और उसके दोनों सर्वोच्च नेताओं नरेंद्र मोदी और अमित शाह के लिए यह प्रतिष्ठा की लड़ाई है। मोदी और दीदी यानी नरेंद्र मोदी और ममता बनर्जी के कल्ट की ल़डाई है। भाजपा और भाजपा विरोध के बुनियादी नैरेटिव की लड़ाई है और भाजपा के हिंदुत्व बनाम हिंदू धर्म की विविधता का भी मुकाबला है। ध्यान रहे दक्षिण के राज्यों को छोड़ दें तो बंगाल एकमात्र राज्य है, जहां मोदी और शाह का जादू नहीं चल पा रहा है। बिहार में भी नहीं चला लेकिन वहां 2015 का चुनाव हारने के बाद भाजपा को समझ में आ गया था कि नीतीश कुमार के रहते अकेले दम पर चुनाव जीतना संभव नहीं है। इसलिए भाजपा ने नीतीश के साथ गठबंधन को प्राथमिकता दी।

इसी तरह झारखंड में 2014 में जादू चल गया था और भाजपा जीत गई थी। लेकिन उसके बाद लगातार दो बार से हार रही है। तभी वहां भी झारखंड मुक्ति मोर्चा को एनडीए में लाने के प्रयासों की गाहेबगाहे खबर आती रहती है। परंतु पश्चिम बंगाल में भाजपा ऐसा नहीं कर सकती है। वहां उसे ममता बनर्जी के खिलाफ ही लड़ना है और दोनों साथ नहीं आ सकते हैं। आखिर ममता के मुकाबले लेफ्ट और कांग्रेस की ताकत पूरी तरह से समाप्त करके ही भाजपा वहां मजबूत हुई है। लेकिन अभी इतनी मजबूत नहीं हो पाई है कि ममता बनर्जी को हरा कर सत्ता प्राप्त कर ले।

भारतीय जनता पार्टी पश्चिम बंगाल की लड़ाई जीवन मरण की तरह लड़ रही है। कह सकते हैं कि भाजपा हर जगह ऐसे ही लड़ती है। यह सही है फिर भी पश्चिम बंगाल की लड़ाई अलग है। यह हिंदू बनाम मुस्लिम के ध्रुवीकरण की राजनीति का टेस्ट केस है। गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी 30 फीसदी के करीब है। बाकी करीब 70 फीसदी हिंदू आबादी है। यह आम धारणा है कि पश्चिम बंगाल में बांग्लादेशी घुसपैठियों या मुसलमानों की प्रजनन दर की वजह से राज्य की जनसंख्या संरचना बदल रही है। तेजी से मुस्लिम आबादी बढ़ती जा रही है और ममता बनर्जी की मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति के कारण हिंदू परेशान हैं।

इसमें भी कोई संदेह नहीं है कि हिंदू सचमुच की परेशानी या बनाई गई धारणा के कारण भाजपा की ओर मुड़े हैं। पिछले तीन चुनावों में, जिनमें 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव और 2021 का विधानसभा चुनाव शामिल है, भाजपा को औसतन 40 फीसदी के करीब वोट मिले हैं। इसका मतलब है कि उसे 70 फीसदी हिंदुओं में से 60 फीसदी का वोट मिला है। यह बहुत बड़ा ध्रुवीकरण है। आमतौर पर दूसरे राज्यों में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण में हिंदू 50 फीसदी वोट भाजपा को करे तो वह बड़ी जीत हासिल करती है। लेकिन बंगाल में 60 फीसदी पर भी वह जीत नहीं पाती है।

इसका अर्थ है कि और ज्यादा हिंदू ध्रुवीकरण होने पर ही भाजपा के लिए मौका बनेगा। क्या इस बार यह संभव हो पाएगा? अगर भाजपा 70 फीसदी हिंदू आबादी में से 70 फीसदी वोट प्राप्त करे तब उसकी जीत सुनिश्चित होगी। ऐसा गणित इसलिए है क्योंकि पश्चिम बंगाल में बिल्कुल आमने सामने का चुनाव होता है। तृणमूल कांग्रेस बनाम भाजपा का मुकाबला होता है। लेफ्ट और कांग्रेस की ताकत पूरी तरह से समाप्त हो गई है। दोनों को मिला कर 10 फीसदी के करीब वोट मिलता है। 87 से 88 फीसदी वोट तृणमूल और कांग्रेस में बंटते हैं। अगर कोई ऐसी ताकत आए, जिसकी वजह से मुस्लिम वोट का बंटवारा हो तब भाजपा के लिए मौका है या वह 70 फीसदी हिंदू वोट ले और बचा हुआ हिंदू वोट अकेले तृणमूल की तरफ जाने की बजाय दूसरी पार्टियों में बंटे तब उसके लिए मौका बने।

पिछले चुनाव में हुगली के फुरफुरा शरीफ के पीरजादा अब्बास सिद्दीकी ने इंडियन सेकुलर फ्रंट बनाया था और कांग्रेस व लेफ्ट के साथ तालमेल करके लड़े थे। इन तीनों पार्टियों के गठबंधन को 294 में से सिर्फ एक सीट पर जीत मिली थी वह सीट भी आईएसएफ को मिली थी। इसका मतलब है कि तमाम गठबंधन के बावजूद मुस्लिम पूरी तरह से ममता बनर्जी के साथ रहे। इस बार अलग तरह से प्रयास हो रहा है। मुर्शिदाबाद में तृणमूल से निष्कासित विधायक हुमायूं कबीर ने बेलडांगा में बाबरी मस्जिद बनाने का ऐलान किया है। उन्होंने नींव रख दी है और फरवरी में निर्माण कार्य शुरू होगा। उन्होंने जातीय उन्नयन पार्टी का गठन किया है। वे असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एमआईएम से तालमेल की तैयारी कर रहे हैं।

दूसरी ओर कांग्रेस पार्टी ने एक बार फिर जोर लगाया है। ममता बनर्जी की पार्टी से राज्यसभा सांसद मौसम बेनजीर नूर की कांग्रेस में वापसी हुई है। वे एबीए गनी खां चौधरी यानी बरकतदा के परिवार की हैं, जिसका मालदा में बड़ा असर है। उनके चचेरे भाई ईशा खान चौधरी बंगाल में कांग्रेस के इकलौते सांसद हैं। सो, कांग्रेस भी मुस्लिम वोट के लिए जोर लगा रही है। इंडियन सेकुलर फ्रंट तो है ही। हालांकि इतनी भीड़ के बावजूद मुस्लिम वोट टूटेंगे इसमें संदेह है।

अब सवाल है कि क्या हिंदू वोट का 70 फीसदी भाजपा के साथ जाएगा? यह एक मुश्किल लक्ष्य लग रहा है। इसका कारण यह है कि ममता बनर्जी भी पश्चिम बंगाल की संस्कृति से जुड़ी धार्मिकता को बढ़ावा दे रही हैं। पिछला चुनाव उन्होंने मां काली का मंत्र पढ़ कर जीता था। इस बार उन्होंने दीघा में जगन्नाथ धाम बनाया है। यह बंगाल की संस्कृति से जुड़ा मामला है। ध्यान रहे बंगाल में चैतन्य महाप्रभु का बड़ा असर है और जगन्नाथ धाम उनके भक्तों को आकर्षित कर रहा है। इसी तरह उन्होंने न्यू कोलकाता टाउन में सबसे बड़े दुर्गा मंदिर की नींव रखी है। वे दुर्गा आंगन बनवा रही हैं। उधर सिलिगुड़ी में वे सबसे बड़ा महाकाल मंदिर बनवाएंगी। ध्यान रहे बंगाल में शिव शक्ति की पूजा की संस्कृति रही है। ममता बनर्जी ने दुर्गापूजा करे सभी पंडालों को पहले से ज्यादा पैसे भी दिए।

इस तरह वे भाजपा और संघ के पूरे देश को जय श्रीराम के नारे के साथ वैष्णव बनाने के प्रोजेक्ट को चैलेंज कर रही हैं। ध्यान रहे संघ और भाजपा हिंदू धर्म की विविधता को एकरूपता में बदलने की परियोजना चला रहे हैं। पश्चिम बंगाल शक्ति की पूजा वाला प्रदेश है। वहां शाक्त संप्रदाय के लोगों की बड़ी आबादी है। वे मातृ शक्ति की पूजा करते हैं। सो, एक तरफ भाजपा के सामने सांप्रदायिक ध्रुवीकऱण को एक्सट्रीम तक ले जाने की चुनौती है तो दूसरी ओर हिंदू धर्म की बहुलता, विविधता को एकरुपता में ढालने के उसके दीर्घकालिक प्रयोग की भी परीक्षा है।

बहरहाल, अगर 30 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले प्रदेश में भी भाजपा हिंदू ध्रुवीकरण करा कर चुवाव नहीं जीतती है तो क्या वह इस राजनीति की सीमाओं को समझेगी और इसमें कोई बदलाव करेगी? इस बार पश्चिम बंगाल का चुनाव घुसपैठिया भगाओ के नैरेटिव की भी परीक्षा है। भाजपा ने इसे बड़ा मुद्दा बनाया है। असम की तर्ज पर बंगाल में ङुसपैठियों को निकालमे और जमीन खाली कराने का दावा किया जा रहा है। इसके अलावा एक परीक्षा एसआईआर की भी है। दावा किया जा रहा है कि एसआईआर के जरिए जो वोट कटे हैं उसका ममता बनर्जी को बड़ा नुकसान होगा। इस दावे का आधार यह है कि भाजपा के लोग कह रहे हैं कि मृत या शिफ्ट कर गए मतदाताओं के नाम पर तृणमूल के लोग वोट डालते थे। वो नाम कट गए हैं तो इससे भाजपा का वोट कटेगा।

दूसरी ओर तृणमूल का कहना है कि भाजपा समर्थकों के वोट ज्यादा कटे हैं और इसलिए तृणमूल की सीटें बढ़ेंगी। गौरतलब है कि मालद, मुर्शिदाबाद, नादिया, दिनाजपुर जैसे मुस्लिम बहुल इलाकों में कम वोट कटे हैं। बंगाल के विकास के नैरेटिव की भी एक परीक्षा है। पश्चिम में उद्योग धंधे बंद हो गए हैं और जीडीपी से लेकर प्रति व्यक्ति आय तक में बंगाल पहले से काफी पीछे चला गया है। अंत में एक परीक्षा भ्ऱष्टाचार के आरोपों की भी है। चिटफंड से लेकर शिक्षक भर्ती घोटाले तक में तृणमूल के अनेक नेता फंसे। हालांकि ममता बनर्जी बेदाग रही हैं। जो हो इस साल के पांच चुनावों में सबसे ज्यादा दिलचस्प चुनाव पश्चिम बंगाल का होने वाला है।


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