तमिलनाडु में त्रिकोणीय चुनावी मुकाबला

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

इस साल जिन पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं उनमें पश्चिम बंगाल के बाद सबसे अहम तमिलनाडु का चुनाव है। हालांकि पहली नजर में ऐसा लग रहा है कि डीएमके के नेतृत्व वाले सेकुलर प्रोग्रेसिव अलायंस यानी एसपीए की राह आसान है और इस बार फिर सत्ता में उसकी वापसी हो सकती है। तमिलनाडु में काफी समय से पांच साल पर सत्ता बदलने का रिवाज था, जो 2016 में बदला था, जब जयललिता की पार्टी अन्ना डीएमके लगातार दूसरी बार सत्ता में आई थी। 10 साल सत्ता में रहने के बाद अन्ना डीएमके 2021 में हारी। अब जयललिता नहीं हैं और उनकी पार्टी में खूब बिखराव भी हुआ है। उनके बनाए मुख्यमंत्री ओ पनीरसेल्वम पार्टी से अलग हो गए हैं। जयललिता की सबसे करीबी सहयोगी रही वीके शशिकला सक्रिय राजनीति से लगभग दूर हैं और उनके भतीजे टीटीवी दिनाकरण की पार्टी भी एनडीए से अलग हो गई है।

सो, अन्ना डीएमके पहले के मुकाबले कमजोर हुई है। उससे अलग हुए खेमे अपनी अपनी राजनीति कर रहे हैं। अन्य विपक्षी पार्टियों में पीएमके का विभाजन हो गया है। एक खेमे का नेतृत्व पार्टी के संस्थापक रामदॉस कर रहे हैं तो दूसरे का नेतृत्व उनके बेटे अंबुमणि के हाथ में है। जहां तक भाजपा का सवाल है तो उसकी अपनी ताकत इतनी ज्यादा नहीं है कि वह गठबंधन को गाइड कर सके। अभी तक अन्ना डीएमके नेताओं के हिसाब से एनडीए काम कर रहा है। लेकिन अमित शाह पूरा जोर लगा रहा है।

अमित शाह ने तमिलनाडु में अप्रैल 2026 में एनडीए की सरकार बनाने का ऐलान किया है। यह अलग बात है कि एनडीए की सबसे बड़ी पार्टी अन्ना डीएमके ने कहा हुआ है कि जीत हुई तो सरकार अन्ना डीएमके की होगी, उसमें भाजपा को शामिल नहीं किया जाएगा। यानी वह एनडीए की सरकार नहीं होगी। फिर भी एनडीए के लिए और भाजपा के लिए यह संतोष की बात हो सकती है कि एमके स्टालिन और कांग्रेस के गठबंधन को उसने हरा दिया। भाजपा इसको जरूरी इसलिए भी मान रही है क्योंकि उसे स्टालिन के सनातन विरोध का जवाब देना है।

गौरतलब है कि उनके बेटे उदयनिधि ने सनातन को डेंगू जैसी बीमारी बता कर समाप्त करने की बात कही थी। इसके अलावा स्टालिन की पार्टी के साथ भाजपा का एक टकराव भाषा का भी है। हालांकि काशी तमिल संगम का आयोजन लगातार एनडीए की केंद्र सरकार करवा रही है लेकिन तमिलनाडु में डीएमके का गठबंधन सनातन और भाषा दोनों को मुद्दा बनाए हुए है। भाजपा ने तमिलनाडु के सीपी राधाकृष्णन को उप राष्ट्रपति बनवाया है। उनके जरिए भी दूरी को पाटने की कोशिश की जा रही है। अमित शाह तमिलनाडु में पोंगल मना रहे हैं और लगातार सक्रियता दिखा कर भाजपा के लिए ज्यादा सीटों की मोलभाव करेंगे।

उधर सत्तारूढ़ डीएमके ने चुनाव को तमिल अस्मिता की राजनीति से जोड़ दिया है। स्टालिन और उनके बेटे के निशाने पर अन्ना डीएमके नहीं है, बल्कि भाजपा है। उनको पता है कि भाषा, संस्कृति और धर्म को लेकर अन्ना डीएमके की वही राय होगी, जो डीएमके की है। इसलिए उनका हमला भाजपा पर है, जिसे हिंदी और हिंदू धर्म के बहाने एक धुरी बना कर द्रविडियन अस्मिता के वोटों का ध्रुवीकरण कराया जा सकता है। संसद में भी डीएमके सांसद अक्सर हिंदी को लेकर विरोध जताते रहते हैं। भाषा और अस्मिता के मुद्दे के अलावा डीएमके को सरकार में होने का एडवांटेज है। उसने वेलफेयर की कई योजनाएं चुनाव से पहले घोषित कर दी हैं।

पोंगल के बहाने सरकार ने नकद पैसे बांटने से लेकर कई तरह के उपहार बांटने शुरू कर दिए हैं। इसके साथ ही आर्थिक विकास के आंकड़े पेश करके भाजपा शासित राज्यों से तुलना की जा रही है और तमिलनाडु को बेहतर साबित किया जा रहा है। उसके गठबंधन में कांग्रेस जरूर कुछ पेंच डाल रही है। वह ज्यादा सीटों और सरकार में शामिल किए जाने की मांग कर रही है। लेकिन अंदाजा है कि अंत में एसपीए एक होकर ही चुनाव मैदान में उतरेगा।

तमिलनाडु का चुनाव इस बार ज्यादा दिलचस्प इसलिए हो गया है क्योंकि लंबे अरसे बात प्रदेश का विधानसभा चुनाव त्रिकोणात्मक होता दिख रहा है। कैप्टेन विजयकांत ने पार्टी बना कर 2011 का चुनाव लड़ा था लेकिन तब वे अन्ना डीएमके से अलायंस में थे और 2016 में अकेले लड़े तो एक भी सीट नहीं जीत पाए। आखिरी बार एमजी रामचंद्रन के निधन के बाद जब 1989 में अन्ना डीएमके टूटी थी तब त्रिकोणात्मक मुकाबला हुआ था। उस समय एक धड़े का नेतृत्व एमजीआर की पत्नी जानकी रामचंद्रन कर रही थीं और दूसरे गुट का नेतृत्व जयललिता के हाथ में था। अंत में जययलिता ने बाजी मारी और अन्ना डीएमके उनकी पार्टी हो गई। उस समय फिल्म स्टार शिवाजी गणेशन ने भी टीएमएम नाम से पार्टी बनाई थी और चुनाव लड़े थे।

उस चुनाव के 27 साल बाद तमिलनाडु में त्रिकोणात्मक मुकाबला होता दिख रहा है। तमिल फिल्मों के सुपरस्टार थलपति विजय की वजह से ऐसा हुआ है। उन्होंने तमिलगा वेत्री कझगम यानी टीवीके नाम से पार्टी बनाई है। वे पूरे दमखम के साथ चुनाव मैदान में उतरे हैं। उन्होंने चुनाव के कई महीने पहले से प्रचार अभियान शुरू कर दिया है। एमजीआर और जयललिता की तरह उन्होंने भी डीएमके को बुरी शक्ति बताया है और उसे हराने का आह्वान किया है। वे बेहद लोकप्रिय हैं और राजनीति के लिए उन्होंने फिल्मों से संन्यास की घोषणा की है। उनमें एमजीआर या जयललिता की तरह राजनीतिक सफलता की संभावना देखी जा रही है।

सो, डीएमके नेतृत्व वाले एसपीए के साथ अन्ना डीएमके नेतृत्व वाले एनडीए और विजय की पार्टी टीवीके के बीच त्रिकोणात्मक मुकाबला है। इनके अलावा भी कई छोटी छोटी पार्टियां चुनाव में होंगी। कैप्टेन विजयकांत की पार्टी उनकी पत्नी प्रेमलता संभाल रही हैं और वे भी चुनाव लड़ेंगी। बहरहाल, विजय की पार्टी के लिए चुनाव रणनीति प्रशांत किशोर बना रहे हें और पिछले साल उन्होंने विजय के एक कार्यक्रम में कहा था कि अभी तमिलनाडु में सबसे लोकप्रिय बिहारी एमएस धोनी हैं लेकिन एक साल बाद सबसे लोकप्रिय प्रशांत किशोर होंगे। उन्होंने विजय की सरकार बनवाने का दावा किया है। अगर वे विजय के सहारे तमिलनाडु विधानसभा को त्रिशंकु बनवा देते हैं तब भी उनकी बड़ी जीत होगी। भाजपा को भी विजय से यही उम्मीद होगी। उसको लग रहा है कि विजय जो वोट हासिल करेंगे वह डीएमके गठबंधन का होगा। इसका लाभ एनडीए को मिलेगा।

सो, भाजपा के नेता विजय की वजह से जीत जाने या त्रिशंकु विधानसभा की संभावना देख रहे हैं। एमके स्टालिन के साथ एडवांटेज की बात यह है कि वे सत्ता में हैं। दूसरे, कांग्रेस के अलावा दोनों कम्युनिस्ट पार्टियां, मुस्लिम लीग, वीसीके, एमडीएमके जैसी अलग अलग समूहों में असर रखने वाली पार्टियां उसके गठबंधन में हैं। तीसरे, एनडीए में बिखराव है। ई पलानीस्वामी गठबंधन का नेतृत्व कर रहे हैं और खुद को सीएम का दावेदार घोषित कर चुके हैं। इससे नाराज होकर पनीरसेल्वम और टीटीवी दिनाकरण अलग हो गए हैं। चौथे, पलानीस्वामी से नाराज होकर पिछले दिनों एक बेहद मजबूत नेता केए सेंगोटैयन ने पार्टी छोड़ी है और विजय के संपर्क में हैं। सो, अन्ना डीएमके और एनडीए में बिखराव है, जिसका लाभ डीएमके को मिल सकता है।


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