उम्मीद-ए-सहर की बात सुनो!

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

नई सुबह और नई उम्मीदों के साथ नए साल का स्वागत है। बीता हुआ साल अच्छा नहीं था। अप्रैल में पहलगाम में बड़ा आतंकवादी हमला हुआ था, जिसमें देश के अलग अलग हिस्सों के 25 बेकसूर सैलानियों और एक स्थानीय कश्मीर व्यक्ति की हत्या कर दी गई थी। उसके बाद भारत ने जवाबी कार्रवाई में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के जरिए छह और सात मई की दरम्यानी रात को आतंकवादी ठिकानों को नष्ट किया लेकिन दुर्भाग्य से यह ऑपरेशन पाकिस्तान के साथ सीमित युद्ध में बदल गया।

पहले के बालाकोट या उरी स्ट्राइक से उलट पाकिस्तान ने जवाबी हमला कर दिया। इसका अंत 10 नवंबर को बिल्कुल अप्रत्याशित तरीके से हुआ। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सीजफायर का ऐलान किया। उसके बाद से वे करीब एक सौ बार कह चुके हैं कि उन्होंने व्यापार बंद करने और टैरिफ बढ़ाने का दबाव डाल कर भारत और पाकिस्तान को सीजफायर के लिए तैयार कराया। इसके बाद साल के अंत में राजधानी दिल्ली में लाल किले के सामने कार बम धमाका हुआ, जिसमें एक दर्जन से ज्यादा लोग मारे गए। इन दो घटनाओं ने सरकार के बनाए सुरक्षा नैरेटिव को पूरी तरह से बदल दिया।

जुलाई का महीना एक अलग स्ट्राइक लेकर आया, जब राष्ट्रपति ट्रंप ने अमेरिका जाने वाले भारत के उत्पादों पर पर 25 फीसदी का टैरिफ लगाया और रूस से तेल खरीदने की सजा देते हुए 25 फीसदी का अतिरिक्त टैरिफ लगाया। इसके बाद से भारतीय मुद्रा यानी रुपए में गिरावट का ऐसा सिलसिला चला है कि एक डॉलर 90 रुपए से ज्यादा का हो गया है। भारत के पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश में पूरी तरह से भारत विरोधी माहौल बन गया है, जिसका फायदा पाकिस्तान और चीन दोनों उठा रही हैं। शेख हसीना के तख्तापलट और उनके भारत आने के बाद से हिंदुओं पर हो रहे हमलों में पिछले साल अचानक तेजी आई।

हिंदुओं पर हमले की दर्जनों घटनाएं हुई हैं और दिसंबर 2025 के आखिरी 15 दिन में तीन हत्याएं हुईं। वहां हालात 1971 जैसे बन रहे हैं और उसी तरह शरणार्थियों के भारत की सीमा पर जमा होने की आशंका बन गई है। नेपाल में भी सत्ता परिवर्तन हुआ और केपी शर्मा ओली का तख्तापलट करा कर जेन जी ने सुशीला कार्की को सत्ता सौंपी। एक तरह से पूरा साल भारत के लिए सामरिक नीति, कूटनीति और अर्थनीति तीनों में नैरेटिव गंवाने का रहा। दुनिया निश्चित रूप से दुविधा में रही कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में सचमुच क्या हुआ था? उधर पाकिस्तान ने दुनिया की तीनों महाशक्तियों अमेरिका, रूस और चीन का सद्भाव हासिल किया। उसके सेना प्रमुख का व्हाइट हाउस में स्वागत हुआ।

अगर घरेलू राजनीति की बात करें तो सरकार का विपक्ष के साथ टकराव बढ़ता गया है। 2024 में लोकसभा चुनाव में खराब प्रदर्शन के बाद भाजपा की जीत का जो सिलसिला हरियाणा, महाराष्ट्र में बना वह 2025 में दिल्ली और बिहार में जारी रहा। लेकिन लगातार जीत के बावजूद भाजपा का शीर्ष नेतृत्व लोकसभा में बहुमत गंवाने के बाद से सहज नहीं हो पाया है। मुख्य विपक्षी पार्टी ने ‘वोट चोरी’ को ऐसा मुद्दा बनाया है, जिससे देश की पूरी चुनाव प्रक्रिया संदेह के घेरे में आई है। दुर्भाग्य की बात है कि चुनाव आयोग लोगों का संशय दूर करने की बजाय विपक्ष के विरोधी की तरह बरताव कर रहा है। विपक्ष की दूसरी पार्टियां ‘वोट चोरी’ के मामले में भले कांग्रेस के साथ पूरी तरह से सहमत नहीं हैं लेकिन संसद में चुनाव सुधार पर चर्चा के दौरान सबने चुनाव आयोग के पक्षपात का मुद्दा बनाया। चुनाव प्रक्रिया पर बन रहा अविश्वास अंततः लोकतंत्र को कमजोर करेगा। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर एक सही कदम है लेकिन इसे जिस तरह से जल्दबाजी में लागू किया गया उससे संदेह पैदा हुआ है। 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में हुई एसआईआर की प्रक्रिया में कई तरह की कमियां सामने आई हैं। भारत में राजनीति का विभाजन जितना गहरा हुआ है उसी अनुपात में समाज का विभाजन भी बढ़ा है। यह सामाजिक विभाजन लंबे समय में भारत की एकता और अखंडता को प्रभावित करने वाला होगा।

सो, नए साल में गालिब की तरह यह तो नहीं कह सकते हैं कि, ‘एक बिरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है’, लेकिन फैज की तरह ‘सहर की बात उम्मीद-ए-सहर की बात’ यानी कर सकते हैं। उम्मीद कर सकते हैं कि सब कुछ ठीक होगा। भारत ने ब्रिटेन से लेकर न्यूजीलैंड कर सात देशों के साथ मुक्त व्यापार संधि की है और उम्मीद है कि नए साल में जनवरी या फरवरी में अमेरिका के साथ व्यापार संधि हो जाएगी। अमेरिका के साथ व्यापार संधि से बहुत कुछ बदलेगा। भारत का अलगाव समाप्त होगा। टैरिफ कम होगा, जिससे निर्यात बढ़ेगा और आर्थिकी पर दबाव कम होगा। यूरोपीय संघ के साथ भी भारत की व्यापार वार्ता अंतिम चरण में है। इससे भारत की आर्थिकी में एक ठहराव आने की उम्मीद है। अमेरिका के साथ व्यापार संधि होने के बाद कूटनीतिक मोर्चे पर भी भारत को निश्चित रूप से फायदा होगा। नेपाल में भी नए साल के शुरू में चुनाव होने वाले हैं। वहां भी राजनीतिक स्थिरता आती है तो भारत के लिए बेहतर होगा।

नए साल में फरवरी में बांग्लादेश में चुनाव होना वाले हैं। हालांकि शेख हसीना की आवामी लीग के चुनाव लड़ने पर पाबंदी है लेकिन बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी चुनाव लड़ रही है। बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री रहीं बेगम खालिदा जिया का निधन हो गया है लेकिन उससे ठीक पहले उनके बेटे तारिक रहमान अपने वतन लौट आए और चुनाव में अपनी पार्टी बीएनपी का नेतृत्व कर रहे हैं। जनरल इरशाद की जातीय पार्टी भी मुकाबले में है। जमात ए इस्लामी भी चुनाव लड़ रही है। सो, चुनाव लड़ रही लगभग सभी पार्टियों का रुख भारत विरोधी रहा है। फिर भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत चुनी गई सरकार के साथ संवाद बहाल बेहतर होगा और उम्मीद कर सकते हैं कि हिंदुओं पर हमले रुकेंगे।

अंतरराष्ट्रीय और आर्थिक मोर्चे पर स्थिरता के बाद भी ऐसा लग रहा है कि नए साल में लेकिन घरेलू राजनीति का मैदान टकराव वाला बना रहेगा। अप्रैल और मई में पांच राज्यों पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में विधानसभा के चुनाव हैं। पश्चिम बंगाल और असम का चुनाव बहुत ज्यादा कटुता बढ़ाने वाला होगा। भारत में चुनाव पिछले कुछ समय से जंग की तरह लड़े जा रहे हैं। इसमें इतनी कटुता पैदा होती है कि चुनाव के बाद भी वह समाप्त नहीं होती है। पहले पार्टियां और देश की जनता भी चुनाव के समय राजनीतिक टकराव के मोड में आती थी और चुनाव के बाद सब पहले जैसा सामान्य हो जाता था। लेकिन अब सालों भर राजनीति और समाज की खदबदाहट बनी रहती है। इससे सामाजिक विभाजन बढ़ता जा रहा है और टकराव की आशंका स्थायी रूप से बनी रहती है।

सरकार बीते साल को सुधारों का साल बता रही है क्योंकि उसमें श्रम कानूनों को बदला गया। भारत की परमाणु ऊर्जा नीति को बदला गया। रोजगार गारंटी की योजना बदली गई। सरकार ने ‘एक देश, एक चुनाव’ का बिल पेश किया, जिस पर संयुक्त संसदीय समिति में विचार हो रहा है तो जेल जाने वाले विधायकों, सांसदों को पद से हटाने का कानून भी लाया जा रहा है। इसके बिल पर भी संयुक्त संसदीय समिति विचार कर रही है। जो कानून बन गए हैं वो भी जो बिल लाए गए वो भी, सब टकराव बढ़ाने वाले हैं और विपक्ष इसके लिए कमर कस कर तैयार है। महात्मा गांधी नरेगा की जगह लाए गए विकसित भारत जी राम जी बिल पर तो जनवरी के पहले हफ्ते से ही कांग्रेस का विरोध प्रदर्शन शुरू होने वाला है। सो, कह सकते हैं कि चुनाव और राजनीति के मोर्चे पर नए साल में टकराव बना रहेगा।


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