विफलता नेहरू की, उपलब्धियां गांधी और पटेल की!

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

यह इतिहास से ज्यादा राजनीति का सवाल है भाजपा की नजर में पंडित जवाहरलाल नेहरू कितने बड़े नेता थे? भाजपा कभी उनको इतना बडा नेता बताती है जैसे आजादी से पहले और बाद के सारे फैसले उन्होंने अकेले किए तो कभी इतना छोटा नेता बताती है कि वे अपने लिए एक आदमी का समर्थन नहीं जुटा पाए! एक तरफ भारतीय जनता पार्टी बताती है कि नेहरू इतने बड़े नेता थे कि उन्होंने देश का विभाजन कराया, ‘वोट चोरी’ करके देश के पहले प्रधानमंत्री बने, संविधान में तमाम किस्म की गड़बड़ियां कराईं, भारत को हिंदू राष्ट्र नहीं बनने दिया आदि आदि। लेकिन दूसरी ओर वही भाजपा कहती है कि नेहरू की इतनी हैसियत नहीं थी कि कांग्रेस की कोई प्रांतीय कमेटी अध्यक्ष पद के लिए उनके नाम का प्रस्ताव करे।

सवाल है कि जब नेहरू में इतनी भी ताकत नहीं थी कि कांग्रेस की 15 प्रांतीय कमेटियों में से किसी एक कमेटी से अपने नाम की सिफारिश करा सकें और सरदार वल्लभ भाई पटेल इतने शक्तिशाली थे कि 15 में से 12 कमेटियों ने उनके नाम की सिफारिश की तो देश के विभाजन का फैसले नेहरू ने कैसे कराया? अगर सबसे शक्तिशाली महात्मा गांधी और सरदार पटेल थे तो इसका मतलब यह है कि सारे फैसले उन दोनों ने कराए! भाजपा क्यों नहीं कहती है कि देश के विभाजन से लेकर भारत के हिंदू राष्ट्र नहीं बनने तक और संविधान की गड़बड़ियों से लेकर कश्मीर के विवाद तक सबके लिए जिम्मेदार गांधी और पटेल थे, जो कांग्रेस और देश के सबसे बड़े नेता भी थे?

तभी आजादी से ठीक पहले और तुरंत बाद पंडित नेहरू की क्या स्थिति थी इसको समझने के लिए तीन कहानियां सुनने की जरुरत हैः

पहली कहानी भाजपा को बहुत पसंद है। संसद में भी वंदे मातरम् पर चर्चा के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सुनाई थी और कहा था कि ‘वोट चोरी’ करके नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री बने थे। वह कहानी असल में ऐसी है कि 1940 से लेकर 1946 तक मौलाना अबुल कलाम आजाद कांग्रेस के अध्यक्ष थे। दूसरे विश्वयुद्ध की वजह से कांग्रेस के अधिवेशन अनियमित हुए और मौलाना आजाद अध्यक्ष बने रहे थे। 1946 में जब कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव का फैसला हुआ तो उस समय तक तय हो गया था कि जो कांग्रेस का अध्यक्ष होगा वह अंतरिम सरकार का प्रमुख होगा। उस समय तीन दावेदार थे सरदार पटेल, आचार्य जेबी कृपलानी और पंडित नेहरू। इनके अलावा मौलाना आजादी भी अध्यक्ष बने रहना चाहते थे। हालांकि उनको चिट्ठी लिख कर महात्मा गांधी ने कह दिया था कि वे उनकी निरंतरता के पक्ष में नहीं हैं। महात्मा गांधी चाहते थे कि नेहरू अध्यक्ष बनें। लेकिन 15 में से 12 प्रांतीय कमेटियों ने सरदार पटेल का नाम भेजा।

संक्षेप में कहानी यह है कि गांधी की इच्छा का सम्मान करते हुए सरदार पटेल और कृपलानी दोनों मैदान से हटे और नेहरू कांग्रेस के अध्यक्ष बने। अध्यक्ष बनने के एक महीने के बाद वायसराय ने उनको अंतरिम सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया। जाहिर है नेहरू अपनी ताकत से अध्यक्ष नहीं बने थे और यह भी जाहिर है कि अगर कोई ‘वोट चोरी’ हुई थी तो वह उन्होंने नहीं की थी। वह तो गांधी थे, जिन्होंने प्रांतीय कमेटियों की सिफारिशों को रद्दी में डाला और नेहरू को अध्यक्ष बनवाया। तभी सवाल है कि प्रधानमंत्री हों या केंद्रीय गृह मंत्री या दूसरे भाजपा नेता वे इस बात को इसी रूप में क्यों नहीं कहते हैं? वे गांधी को जिम्मेदार क्यों नहीं ठहराते हैं?

दूसरी कहानी आजादी के बाद 1950 के कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव की है। ध्यान रहे अंतरिम प्रधानमंत्री बनने के बाद नेहरू ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था और चूंकि सरदार पटेल उप प्रधानमंत्री बने थे तो अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी दो साल आचार्य जेबी कृपलानी ने संभाली। उसके बाद दो साल पट्टाभि सीतारमैया कांग्रेस अध्यक्ष रहे। फिर 1950 का चुनाव आया, जो आजादी के बाद कांग्रेस अध्यक्ष का सबसे चर्चित चुनाव रहा है। पंडित जवाहर लाल नेहरू ने आचार्य जेबी कृपलानी को अपने उम्मीदवार के तौर पर पेश किया और दूसरी ओर राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन उम्मीदवार बन गए। उनको सरदार पटेल का समर्थन था। घमासान मुकाबले में राजर्षि टंडन ने आचार्य कृपलानी को हरा दिया। यानी सरदार पटेल के उम्मीदवार ने पंडित नेहरू के उम्मीदवार को हरा दिया।

इसका मतलब है कि चार साल तक प्रधानमंत्री रहने के बावजूद कांग्रेस में नेहरू की ऐसी हैसियत नहीं बनी थी कि वे सरदार पटेल से जीत सकें। अब सोचें इस चार साल की अवधि के सारे फैसलों के लिए भी अकेले नेहरू को जिम्मेदार ठहराया जाता है, जबकि उस अवधि में भी सबसे ताकतवर पटेल थे। उनको देशी रियासतों के विलय का श्रेय दिया जाता है। लेकिन बाकी गड़बड़ियों का ठीकरा नेहरू के सर फोड़ा जाता है! क्या इन चार वर्षों के तमाम फैसलों के लिए सरदार पटेल बराबर के या कुछ ज्यादा के जिम्मेदार नहीं थे?

तीसरी कहानी देश के पहले और दूसरे राष्ट्रपति के चुनाव की है। संविधान सभा के अध्यक्ष के नाते डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद कार्यकारी राष्ट्रपति थे। आजाद भारत में राष्ट्रपति का पहला चुनाव फरवरी 1952 में हुआ। तब तक सरदार पटेल का निधन हो चुका था। प्रधानमंत्री नेहरू की पसंद चक्रवर्ती सी राजगोपालाचारी थे। वे चाहते थे कि दक्षिण भारत से किसी नेता को राष्ट्रपति बनाया जाए। उनको लग रहा था कि दक्षिण भारत के नेताओं का समर्थन राजगोलाचारी के नाम पर मिलेगा। लेकिन नेहरू उनके लिए समर्थन नहीं जुटा सके और उनकी इच्छा के विरूध राजेंद्र प्रसाद राष्ट्रपति बने। दूसरी बार 1957 में भी नेहरू ने उनकी जगह उप राष्ट्रपति एस राधाकृष्णन को राष्ट्रपति बनाना चाहा लेकिन तब भी कामयाब नहीं हुए और राजेंद्र बाबू दूसरी बार राष्ट्रपति बने। सोचें, 1957 में 10 साल तक प्रधानमंत्री रहने के बाद भी नेहरू इतने ताकतवर नहीं थे कि अपनी पसंद से देश का राष्ट्रपति बनवा सकें!

ये तीनों कहानियां सही हैं और भाजपा को बहुत पसंद हैं। भाजपा के नेता अलग अलग कार्यक्रमों में इसमें खूब मिर्च मसाला लगा कर सुनाते भी हैं। अब सवाल है कि जब नेहरू में इतनी ताकत नहीं थी कि वे कांग्रेस की 15 कमेटियों में से एक भी समर्थन अपने लिए जुटा सकें तो फिर उन्होंने देश विभाजन का फैसला कैसे करवा दिया? देश विभाजन का फैसला भी तो उन लोगों ने करवाया होगा, जो ताकतवर थे, जिनको 12 कमेटियों का समर्थन मिला था या जिन्होंने 12 कमेटियों के समर्थन के बावजूद पटेल को प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया? सबसे ताकतवर तो गांधी और पटेल थे, फिर देश विभाजन का ठीकरा उनके सर क्यों नहीं फूटता है? वहां क्यों या तो कांग्रेस कहा जाता है या नेहरू का नाम लिया जाता है? सोचें, सरदार पटेल ने चाह दिया तो नेहरू के उम्मीदवार जेबी कृपलानी को अध्यक्ष नहीं बनने दिया। उनको राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन के हाथों हरवा दिया। फिर भारत के हिंदू राष्ट्र नहीं बनने या हिंदी स्वीकार नहीं किए जाने या कश्मीर मसला उलझने या दूसरे विवादों के लिए अकेले नेहरू कैसे जिम्मेदार हैं?

जो सबसे ज्यादा ताकतवर कांग्रेस नेता था उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं है? नेहरू अपनी पसंद से राष्ट्रपति नहीं बनवा सकते थे लेकिन भाजपा कहती है कि सारे फैसले वे कर रहे थे! क्या आज यह कल्पना की जा सकती है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिसको चाहें उसको हरा कर कोई दूसरा व्यक्ति भाजपा का अध्यक्ष बन जाए या प्रधानमंत्री मोदी जिसको राष्ट्रपति बनाना चाहें उसकी बजाय कोई दूसरा बन जाए? इसकी कल्पना नहीं की जा सकती है। लेकिन आजादी से तुरंत बाद ऐसा सच में हुआ था कि प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू अपनी पसंद का कांग्रेस अध्यक्ष नहीं बनवा पाए और अपनी पसंद का राष्ट्रपति नहीं बनवा पाए।

जाहिर है भाजपा आजादी से ठीक पहले या उसके ठीक बाद जाने अनजाने में हुई तमाम गड़बड़ियों का ठीकरा जान बूझकर, एक रणनीति के तहत नेहरू पर फोड़ती है और तमाम अच्छी बातों का श्रेय सरदार पटेल को देती है। असल में इसका तथ्य और तर्क से कोई लेना देना नहीं होता है। वह नेहरू विरोध के सहारे कांग्रेस विरोध की राजनीति करती है। जब तक नेहरू गांधी परिवार कांग्रेस के शीर्ष पर रहेगा, तब तक यह चलता रहेगा। प्रियंका गांधी वाड्रा ने संसद में कहा कि भाजपा समय तय करके एक बार में नेहरू के बारे में चर्चा कर ले और उसके बाद असली मुद्दों पर चर्चा करे। लेकिन चाहे वे जितना कहें भाजपा इस विवाद को नहीं छोड़ने वाली है। वह किसी भी गड़बड़ी के लिए कांग्रेस के सामूहिक नेतृत्व का नाम नहीं लेगी, गांधी और पटेल का नाम तो कतई नहीं लेगी।


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