रोजगार गारंटी योजना का पटाक्षेप

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

केंद्र सरकार महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना यानी मनरेगा का सिर्फ नाम नहीं बदल रही है, बल्कि इस योजना को ही समाप्त कर कर रही है। 2005 में बने इस कानून को खत्म किया जा रहा है। उसकी जगह विकसित भारत, गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन, ग्रामीण यानी ‘वीबी, जी राम जी’ कानून लेगा। संसद के दोनों सदनों की मंजूरी के बाद अब राष्ट्रपति के दस्तखत होंगे और नया कानून अस्तित्व में आ जाएगा। इस विधेयक में साफ तौर पर कहा गया है कि यह नई योजना है और पुरानी योजना समाप्त की जा रही है। सरकार, भारतीय जनता पार्टी और सोशल मीडिया में सरकार के इकोसिस्टम की ओर से इसे ऐसे पेश किया जा रहा है, जैसे यह नाम बदलने की घटना मात्र है। जैसे पहले कई योजनाओं के नाम बदले गए वैसे ही इसका भी नाम बदला जा रहा है। विपक्षी पार्टियां भी अपने विरोध में महात्मा गांधी बनाम जी राम जी के विवाद में फंस रही हैं।

असल में नाम के साथ साथ इस कानून का पूरा मकसद भी बदल दिया गया है। यह पहले वाले रोजगार गारंटी कानून की तरह बिल्कुल नहीं है। पुरानी योजना मांग आधारित थी, जिसमें ग्रामीण इलाकों में लोग जरुरत पड़ने पर कानूनी रूप से एक सौ दिन का रोजगार हासिल कर सकते थे। नई योजना सप्लाई या आवंटन आधारित है। यानी सरकार की ओर से काम बताया जाएगा, फंड तय किया जाएगा और उसी आधार पर मजदूरों को रोजगार दिया जाएगा। खेती किसानी के दिनों में यह योजना बंद रहेगी ताकि उस समय लोगों को मजदूरों की कमी नहीं हो। इस तरह यह बड़े किसानों और बड़े कारोबारियों को आसानी से मजदूर उपलब्ध कराने की योजना भी है।

नए कानून में रोजगार गारंटी की इस योजना का वित्तीय बोझ राज्य सरकारों पर भी डाला गया गया है। मनरेगा में अकुशल मजदूरों को दी जाने वाली पूरी मजदूरी केंद्र सरकार की ओर से दी जाती थी। साथ ही अर्ध कुशल और कुशल मजदूरों को दी जाने वाली मजदूरी का तीन चौथाई हिस्सा भी केंद्र सरकार देती थी। इतना ही नहीं योजना के तहत इस्तेमाल होने वाली सामग्री पर आने वाले खर्च का भी तीन चौथाई हिस्सा केंद्र सरकार उठाती थी। इस तरह राज्यों के ऊपर बहुत मामूली बोझ आता था। जी राम जी योजना को 60:40 में बदल दिया गया है। कुछ केंद्र शासित और पर्वतीय राज्यों को छोड़ कर बाकी राज्यों में इस योजना पर आने वाले खर्च का 60 फीसदी हिस्सा केंद्र सरकार देगी और 40 फीसदी हिस्सा राज्यों को खुद खर्च करना होगा।

कानून बनने से पहले एक मोटा हिसाब विपक्षी नेताओं की ओर से लगाया गया है, जिसके मुताबिक इस योजना के लागू होने के बाद राज्यों के ऊपर 50 हजार करोड़ रुपए का बोझ पड़ेगा। सोचें, राज्यों के पास पैसा कहां है? जीएसटी दरों में बदलाव के बाद वैसे भी राज्यों के हिस्से में कम पैसा आना है और दूसरे राज्य सरकारें महिला सम्मान सहित दूसरी योजनाओं पर इतना खर्च कर रही हैं उनके पास पैसा ही नहीं बच रहा है। इसका नतीजा यह होगा कि राज्य सरकारें पैसा नहीं आवंटित कर पाएंगी, जिससे काम के दिन घटेंगे, मजदूरों का भुगतान रूकेगा और अंततः योजना समाप्त होगी!

इस योजना में एक बड़ी कमी यह है कि यह मांग आधारित नहीं रह जाएगी। सवाल है कि जब काम देने की योजना मांग आधारित नहीं होगी तो फिर उसे गारंटी देने वाली योजना कैसे कहेंगे? य़ह तो गारंटी नहीं हुई! इस योजना में तो केंद्र सरकार हर साल एक बजट तय करेगी और अपने बनाए नियमों के आधार पर राज्यों को बजट का आवंटन करेगी। केंद्र सरकार इसे खर्च करने के मानक भी तय करेगी। इस विधेयक में साफ साफ लिखा हुआ है कि केंद्र सरकार की ओर से किसी राज्य को आवंटित धन खत्म हो जाता है तो उसके बाद इस योजना का सौ फीसदी खर्च राज्यों को खुद उठाना पड़ेगा। यानी बजट से ज्यादा काम नहीं दिया जा सकता है।

याद करें कैसे कोविड की महामारी के बाद लाखों की संख्या में लोग अपने गांवों में लौटे थे तो मनरेगा की योजना ने उनको रोजगार दिया था और उनका जीवन सहज रूप से चलता रहा था। अब नई योजना में ऐसी किसी इमरजेंसी की स्थिति का कोई प्रावधान नहीं है। अगर किसी वजह से ज्यादा लोग अपने गांवों में लौटते हैं या ज्यादा लोग जी राम जी योजना के तहत काम करना चाहते हैं तो उनको काम नहीं मिल पाएगा क्योंकि केंद्र सरकार पहले से इस योजना का बजट तय कर देगी और उससे ज्यादा खर्च होने पर राज्य को अपने खजाने से पैसे का भुगतान करना

पड़ेगा।

नए कानून का डंका यह कह कर बजाया जा रहा है कि इसमें रोजगार की गारंटी एक सौ दिन से बढ़ा कर 125 दिन कर दी गई है। लेकिन यह भी सिर्फ कहने और दिखाने की बातें हैं क्योंकि विधेयक में जॉब कार्ड्स को ‘तर्कसंगत’ बनाने की बात कही गई है। इसका मतलब है कि जॉब कार्ड धारकों को किसी न किसी कसौटी पर जांच जाएगा और उनकी संख्या कम की जाएगी। वैसे भी कोविड के समय को छोड़ दें तो कभी भी लोगों को सौ दिन का रोजगार नहीं मिलता है। पिछले कई बरसों का औसत 50 दिन रोजगार मिलने का है। यानी जब सौ दिन की गारंटी है और योजना मांग आधारित है तब औसतन 50 दिन रोजगार मिलता है। यह मांग आधारित नहीं रह जाएगी तो औसत इससे भी कम दिन का होगा। फिर 125 दिन करने की क्या तुक है?

मनरेगा को तहत ग्राम पंचायत, प्रखंड पंचायत और जिला पंचायत के हाथ में सब कुछ था। काम की पहचान करने से लेकर उसकी योजना बनाने और उस पर अमल कराने के लिए ये तीनों जिम्मेदार होते थे। लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। अब विकसित ग्राम पंचायत को योजना बनाने के लिए जीआईएस आधारित टूल्स का इस्तेमाल अनिवार्य रूप से करना होगा। उसे पीएम गति शक्ति और दूसरे डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर की मदद लेनी होगी। उसके बाद उसे ग्राम सभा के सामने पेश करना होगा। बाकी पंचायतों की ओर से भी काम प्रस्तावित करने पर इसी माध्यम से गुजरना होगा। उसके बाद काम के आउटपुट को विकसित भारत नेशनल रूरल इंफ्रास्ट्रक्चर स्टैक पर डालना होगा। नए कानून के तहत बायोमेट्रिक्स, जियो टैगिंग, डैशबोर्ड, एआई ऑडिट आदि को वैधानिक रूप से इसमें शामिल किया गया है। इनका पालन नहीं करने पर काम खारिज हो सकता है और पैसा रूक सकता है। इसका मतलब है कि गांवों में रहने वाले लाखों किसान, मजदूर अगर तकनीक के इस्तेमाल में विफल होते हैं तो उनको कोई काम नहीं मिलेगा। इस तरह मजदूरों को और मजदूरी की एक योजना को डाटा प्वाइंट्स में तब्दील किया जा रहा है। एक पूरी तरह से विकेंद्रित और जनता के हाथ की योजना को केंद्र के हाथ में केंद्रीकृत किया जा रहा है।

नए कानून में एक बड़ी आपत्ति वाली बात यह है कि राज्यों को हर साल पहले से ही 60 दिन का समय नोटिफाई करना होगा, जब जी राम जी योजना के तहत कोई काम नहीं होगा। इसमें खेती के पीक सीजन का समय भी होगा। यानी उस समय कोई व्यक्ति चाहे कि सरकारी काम करे तो वह काम उसे नहीं मिलेगा। उसे अनिवार्य रूप से उन 60 दिनों में निजी ठेकेदार या जमींदार या कारोबारी के यहां काम करना होगा। यानी मनरेगा में काम करने वाले मजदूरों को जबरिया खेत मजदूर बनाया जाएगा। क्या लोगों से काम करने की उनकी पसंद छीनना नहीं है? क्या ऐसा नहीं लग रहा है कि सरकार रोजगार गारंटी या मजदूरों के कल्याण की बजाय केंद्र नियंत्रित मजदूर सप्लाई की योजना चलाना चाह रही है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मनरेगा को यूपीए सरकार की विफलता का स्मारक कहा था। अब जी राम जी योजना को क्या कहा जाएगा? बहरहाल, यह एक राजनीतिक फैसला है, जिसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि मजदूरों की गारंटीशुदा योजना का रत्ती भऱ भी श्रेय कांग्रेस को नहीं मिल सके।


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