साफ दिखलाई दे रहा है कि भूमंडलीकरण इतिहास की अनिवार्य धारा नहीं है, बल्कि मानों एक ऐसी व्यवस्था जैसी है जो परिस्थितियों पर निर्भर है। और वह लगातार खतरे के नीचे खड़ी है। कोई भी समय कभी भी इस पूरी व्यवस्था को पटरी से नीचे उतार सकता है, जैसे इस समय भूमंडलाकरण के साथ वैश्विक राजनीतिक व्यवस्था में भी नजर आ रहा है।
इजराइल-अमेरिका बनाम ईरान की लड़ाई ने फिर दुनिया को ठिठका दिया है। वजह वैश्विक अर्थव्यवस्था की धड़कनों में एक होर्मुज़ जलडमरूमध्य है। ईरान और खाड़ी देशों के बीच स्थित यह मार्ग दुनिया के लगभग पाँचवें हिस्से के तेल का रास्ता है। इसलिए जब यहाँ युद्ध या तनाव की आशंका पैदा होती है, तो असर केवल मध्य-पूर्व में ही सिमटा नहीं रहता। तेल बाज़ार से लेकर करेंसी बाज़ार, जहाज़रानी से लेकर बीमा उद्योग और पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था हिलने लगती है। और ताजा लड़ाई ने विश्व राजधानियों में फिर यह सवाल पैदा किया है कि दुनिया को गाँव में बदलने वाले वैश्वीकरण की बुनियाद कितनी पुख्ता है?
तीन दशकों से यह विश्वास गहरा है कि वैश्वीकरण की प्रक्रिया का पलटना या थमना संभव नहीं है। उत्पादन और व्यापार की शृंखलाएँ महासागरों के पार फैल चुकी थीं। पूँजी की लगभग बिना रुकावट एक देश से दूसरे देश में आवाजाही है। एक महाद्वीप में बना सामान कुछ ही हफ्तों में दूसरे महाद्वीप की दुकानों तक पहुँच जाता है। दुनिया की अर्थव्यवस्था अब इतनी परस्पर जुड़ चुकी है कि उसका ढहना लगभग असंभव है।
इस विश्वास को समय-समय पर झटके लगे हैं। युद्धों ने विश्व व्यापार को बाधित किया और महामारी ने वैश्विक आपूर्ति व्यवस्था को अचानक रोक दिया। कोविड-19 के दौरान बंदरगाहों पर कंटेनर अटक गए, कारखाने बंद हुए और अंतरराष्ट्रीय व्यापार धीमा हुआ। लेकिन इसके बावजूद वैश्वीकरण रुका नहीं। वह कुछ समय के लिए ठहरा, फिर अपने को नए हालात के अनुरूप ढालकर आगे बढ़ गया। जैसे ही अर्थव्यवस्थाएँ खुलीं, व्यापार फिर तेज़ी से लौट आया। कंटेनर जहाज़ों ने फिर समुद्र पार करना शुरू किया, डिजिटल व्यापार और तेज़ हुआ। वैश्विक पूँजीवाद की व्यवस्था ने फिर अपना लचीलापन दिखाया।
लेकिन आज का संकट अलग प्रकृति का है। महामारी उत्पादन और आपूर्ति को बाधित करती है, जबकि युद्ध उन रास्तों को ही खतरे में डाल देता है जिनसे पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था चलती है। ईरान से जुड़ा संकट इसी कारण दुनिया की चिंता है, क्योंकि यह वैश्विक व्यापार की उन धमनियों को छूता है जिन पर पूरी व्यवस्था टिकी है।
होर्मुज़ जलडमरूमध्य सबसे संवेदनशील बिंदु है। दुनिया के लगभग पाँचवें हिस्से का तेल इसी मार्ग से गुजरता है। यदि यह मार्ग अस्थिर होता है, तो उसके असर बहुत दूर तक होंगे। तेल की कीमतें तुरंत उछलने लगती हैं। इसके बाद माल ढुलाई का खर्च बढ़ता है, बीमा प्रीमियम ऊपर जाते हैं। मुद्रा बाज़ारों में अस्थिरता छा जाती है। कुछ ही दिनों में यह कंपन वैश्विक अर्थव्यवस्था के कई हिस्सों में महसूस होने लगता है।
यहीं वैश्वीकरण की असली भौगोलिक सच्चाई है। दुनिया भले ही सीमा-रहित दिखाई देती हो, लेकिन वैश्विक व्यापार वास्तव में कुछ ही संकरे रास्तों पर निर्भर है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य, स्वेज नहर और मलक्का जलडमरूमध्य ऐसे ही मार्ग हैं। जब इन रास्तों पर संकट आता है, तब वैश्वीकरण किसी अटूट व्यवस्था की तरह नहीं बल्कि भू-राजनीतिक स्थिरता पर निर्भर एक नाजुक ढाँचे की तरह खड़ा दिखता है।
ईरान संकट एक और गहरे बदलाव की ओर भी संकेत है। शीत युद्ध के बाद यह मान लिया गया था कि आर्थिक परस्पर निर्भरता भू-राजनीतिक संघर्षों को सीमित कर देगी। जो देश वैश्विक अर्थव्यवस्था से गहराई से जुड़े होंगे, वे ऐसे कदम नहीं उठाएँगे जो उनकी अपनी समृद्धि को नुकसान पहुँचाएँ।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों की घटनाएँ इस विश्वास को कमजोर कर रही हैं। यूक्रेन युद्ध ने यूरोप की ऊर्जा व्यवस्था को हिला दिया है। अमेरिका और चीन के बीच बढ़ता तनाव तकनीकी आपूर्ति शृंखलाओं को विभाजित कर रहा है। मतलब अब ईरान से जुड़ा संकट एशिया की आर्थिक वृद्धि को ऊर्जा देने वाले तेल मार्गों को ही खतरे में डाल दे रहा है।
इसका मतलब यह नहीं कि वैश्वीकरण समाप्त हो रहा है। लेकिन उसका स्वरूप बदल रहा है। अब वह पहले की तुलना में अधिक रणनीतिक, अधिक सतर्क और शक्ति-राजनीति के दबावों के प्रति अधिक संवेदनशील हो गया है।
भारत के लिए इसके निहितार्थ तत्काल असर दिखा रहे हैं। भारत अपनी कच्चे तेल की लगभग 85 प्रतिशत आवश्यकता आयात से पूरी करता है। इसलिए ऊर्जा सुरक्षा उसकी स्थायी रणनीतिक चिंताओं में से एक है। भारत के तेल आयात का लगभग 40 प्रतिशत होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर आता है। इसलिए जब खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ता है, तो उसका असर भारत की अर्थव्यवस्था पर बहुत जल्दी दिखाई देता है। तेल महँगा होता है, आयात बिल बढ़ता है, महँगाई का दबाव बनता है और रुपये पर असर पड़ता है।
यह जोखिम केवल कीमत का नहीं, आपूर्ति का भी है। भारत के सामरिक पेट्रोलियम भंडार विशाखापत्तनम, मंगलुरु और पदूर में स्थित हैं। इन भंडारों में लगभग 39 मिलियन बैरल कच्चा तेल रखा जा सकता है, जो किसी गंभीर संकट की स्थिति में लगभग पाँच से छह सप्ताह की खपत को पूरा कर सकता है। प्रतिदिन पाँच मिलियन बैरल से अधिक तेल खपत करने वाले देश के लिए यह सुरक्षा उपयोगी तो है, लेकिन सीमित भी है।
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने इस जोखिम को संतुलित करने की कोशिश की है। यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रियायती रूसी कच्चे तेल की खरीद तेज़ी से बढ़ा दी। रूस, जो पहले भारत के तेल आयात का बहुत छोटा स्रोत था, कुछ समय के लिए उसका सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बन गया।
लेकिन ऊर्जा सुरक्षा अब केवल आर्थिक सवाल नहीं रही। वह सीधे भू-राजनीति से जुड़ चुकी है। नई दिल्ली को एक सावधानी भरे कूटनीतिक संतुलन के साथ आगे बढ़ना पड़ रहा है।
2025 में अमेरिकी प्रशासन ने भारतीय निर्यात पर भारी शुल्क लगाए और इसका भी असर हुआ। राष्ट्रपति ट्रंप ने पहले 25 प्रतिशत शुल्क लगाया, फिर अतिरिक्त दंडात्मक शुल्क भी, जो भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद जारी रखने से जुड़ा था। इससे कुछ भारतीय वस्तुओं पर कुल शुल्क लगभग 50 प्रतिशत तक था। संकेत साफ था कि ऊर्जा के फैसले अब भू-राजनीतिक हिसाब-किताब से अलग नहीं रहे।
बहरहाल वह संकट अभी हाशिए में है। लेकिन इस पूरे प्रकरण का एक स्पष्ट सबक है। भारत की आयातों पर अत्यधिक निर्भरता जोखिम भरी है। पेट्रोलियम पदार्थ और ऊर्जा से जुड़े फैसले अब केवल कारोबारी नहीं हैं बल्कि वे भू-राजनीतिक बिसात का हिस्सा हैं।
ईरान संकट ने भारत की इस दुविधा को और जटिल बना दिया है। यदि खाड़ी क्षेत्र से तेल की आपूर्ति बाधित होती है, तो रूस से तेल खरीदना फिर एक आर्थिक अनिवार्यता होगी। लेकिन तब अमेरिका के साथ नए तनाव भी पैदा हो सकते हैं।
यही मौजूदा वैश्वीकरण का विरोधाभास है। आर्थिक परस्पर निर्भरता स्थिर समय में अमीरी लाती है, लेकिन वही व्यवस्था दूर के युद्धों का भी असर हर देश की अर्थव्यवस्था में चिंता पैदा कर देती है।
हालांकि वैश्वीकरण एक युद्ध से समाप्त नहीं होगा। लेकिन आज वह पहले की तुलना में अधिक नाजुक निश्चित ही दिखाई दे रहा है। क्योंकि यह केवल व्यापार मार्गों का जाल नहीं था। यह बड़ी शक्तियों के बीच एक वैश्विक गाँव के भीतर राजनीतिक अनुशासन पर भी टिका है।
और अनुशासन जब कमजोर पड़ने लगता है, तो व्यवस्था तुरंत नहीं टूटती, लेकिन उसका असुरक्षित होना स्पष्ट दिखाई देने लगता है। ऐसे क्षणों में भूमंडलीकरण इतिहास की अनिवार्य धारा नहीं लगता, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था जैसा दिखाई देता है जो परिस्थितियों पर निर्भर है—और लगातार खतरे के नीचे खड़ी है। समय कभी भी पूरी व्यवस्था को पटरी से नीचे उतार देता है, जैसा वैश्विक राजनीतिक व्यवस्था में भी इस समय दिखलाई दे रहा है।
