यह सवाल सीधा नहीं है। दुनिया की राजधानियों में सार्वजनिक तौर पर सरकारें संयम और कूटनीति की बात करेंगी। लेकिन निजी बातचीत में तस्वीर अलग होगी। कुछ देशों को लगता है कि ईरान से लंबी बातचीत अब बेमतलब है। दूसरे मानते हैं कि युद्ध का जोखिम ठहराव से भी ज्यादा खतरनाक है।
डोनाल्ड ट्रंप गोलमोल नहीं बोलते। उनके लिए यह तकनीकी समझौते का मामला नहीं बल्कि ताकत, दादागिरी दिखाने का सवाल है। वे चेतावनी दे रहे हैं, खाड़ी की तरफ सैन्य बेड़े भेज रहे हैं, और साफ कह रहे हैं कि नतीजे गंभीर होंगे। इस तरह यूरेनियम संवर्धन का मुद्दा अब सिर्फ कूटनीतिक बहस नहीं रहा, बल्कि वास्तविक टकराव की भूमिका है।
ट्रंप कहते हैं कि ईरान परमाणु हथियार नहीं बना सकता और अमेरिका एक “अर्थपूर्ण समझौता” चाहता है। लेकिन साथ ही वे यह भी कहते हैं कि ऐसा नहीं हुआ तो कीमत चुकानी पड़ेगी। यहाँ इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का नजरिया भी अहम है। उनके लिए ईरान की परमाणु ताकत बनना इजराइल के अस्तित्व पर खतरा है। इज़राइल पहले भी ईरानी ठिकानों पर हमले कर चुका है और उन्हें रोकथाम बताया है।
इसलिए सवाल सिर्फ बयानबाज़ी से नहीं उठा है। वास्तविकता है अमेरिकी युद्धपोत और लड़ाकू विमान क्षेत्र में तैनात हैं। क्या यह युद्ध की शुरुआत है? और ट्रंप असल में हासिल क्या करना चाहते हैं?
कुछ महीने पहले, जब ईरान में सरकार के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे थे, ट्रंप ने प्रदर्शनकारियों के लिए सहानुभूति जताई थी। उन्होंने शासन परिवर्तन की बात भी की। लेकिन वे साथ ही परमाणु समझौते की इच्छा भी दोहराते रहे। यह दोहरी रणनीति साफ संकेत देती है कि लक्ष्य पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।
सीमित हवाई हमले ईरान के ठिकानों को नुकसान पहुँचा सकते हैं, लेकिन इससे निर्णायक जीत मिलना मुश्किल है। लंबा सैन्य अभियान अमेरिका को नए जाल में फंसा सकता है। पहले ही अमेरिका यूक्रेन और इज़राइल में उलझा हुआ है। सैन्य विशेषज्ञ चेतावनी दे चुके हैं कि ऐसे अभियान के जोखिम बड़े हैं, हथियार भंडार से लेकर क्षेत्रीय विस्तार तक।
तो फिर आंखे दिखाना, चेताना, दो टूक अल्टीमेटम क्यों? वजह अपनी शर्तों पर राजनैतिक रूतबा दिखाना है। परमाणु हथियार वाले ईरान से पूरे पश्चिम एसिया में ताकत का संतुलन बदलेगाष है। इससे हथियारों की दौड़ शुरू होगी तो ईरान अपने सहयोगी, आंतकी समूहों को और आक्रामक बना सकता है।
लेकिन भू राडनीति, रणनीतिक चिंता के साथ राजनीति भी चलती है। ट्रंप तेज़ और निर्णायक जुमलों से धमक बनाते है। हल्ला बनाना, शक्ति दिखलाना उनकी प्राथमिकता हैं। उन्नत लड़ाकू विमानों की तैनाती इसी शक्ति प्रदर्शन का हिस्सा है। हालांकि ताकत दिखाने से हमेशा बातचीत में झुकाव नहीं आता।
ईरान भी चुप नहीं बैठा है। वह मुकाबला करने की बात कह रहा है तो ओमान की मध्यस्थता से अप्रत्यक्ष बातचीत में भी शामिल है, लेकिन उसने यूरेनियम के पूर्ण संवर्धन रोकने जैसी मांगों पर हामी नहीं भरी है। वह अपने मिसाईल ताकत पर बात करने को तैयार नहीं है। उसके लिए परमाणु कार्यक्रम अब सिर्फ सुरक्षा नहीं, राष्ट्रीय गर्व का मुद्दा है। इस्लामी कट्टरपंथी अमेरिकी दबाव से अपने अंदरूनी भक्तों को एकजुट बनाते हुए है।
इस गतिरोध में खाड़ी देशों की स्थिति पेचीदा है। वे ईरान के प्रभाव से चिंतित हैं, लेकिन खुले युद्ध से ऊर्जा-पेट्रोल बाज़ार और क्षेत्रीय स्थिरता को खतरा मानते हैं। वे हमले के खिलाफ दबाव डाल रहे हैं, क्योंकि परिणाम अनिश्चित हैं। तभी कूटनीति भी जोखिम से खाली नहीं है। आखिर जब बातचीत को “समर्पण” की भाषा में ढाला जाता है, तो वह समझौता नहीं रह जाती। किसी संप्रभु देश से धमकी के बीच झुकने की उम्मीद करना व्यावहारिक नहीं है।
इसलिए अमेरिकी हमला होता है, तो असर सिर्फ ईरान तक सीमित नहीं रहेगा। वह अंतरराष्ट्रीय नियमों और सामूहिक सुरक्षा की संरचना को कमजोर बनाएगा।थ
तभी दुनिया के आगे सवाल है ईरान पर हमला ज़रूरी बुराई है या फिजूल का अनावश्यक जुआ? अमेरिका हमला उसकी क्षमता को रोक सकता है तो ईरान के सत्ता प्रतिरोध को भी जुनूनी बना सकता है। वही दूसरी ऐर कूटनीति से समय आगे बढता रहेगा और समस्या टलती, आगे मुश्किल होती जाएगी।
पूरे संकट में सबसे बड़ा जोखिम शायद यह विश्वास है कि अमेरिकी दबाव बेकाबू न हो। आखिर इतिहास बताता है कि एक बार दांव लग जाए, तो उसके नतीजे लंबे समय तक साथ चलते हैं। और उसके परिणामों में फिर सिर्फ एक सरकार के नहीं, पूरे क्षेत्र और आने वाली पीढ़ियों को नतीजे भुगतने होते है।
