अब निशाने में अमेरिका है!

Categorized as श्रुति व्यास कालम

राजनीति और कूटनीति का मौसम चेतावनी नहीं देता। उसमें अचानक घटनाएं घटती है। पटकथा में अचानक मोड आता है और घटना विशेष पटकथा को पलट डालती है।

बहिष्कार का अब नया सुर शुरू है।  आधिकारिक रूप से घोषित नहीं, लेकिन संकेत साफ़ हैं। इस बार निशाना है अमेरिका के बहिष्कार और अमेरिका शुरू से शैतान की धुन। मई की गर्मियों में “युद्ध”  के युद्धविराम में छोटे से बात कर बतगंड़ पर वह हुआ जिसका किसी को अनुमान नहीं था। भारत ने ट्रंप का सार्वजनिक धन्यवाद नहीं किया। नतीजतन लगा आकस्मिक झटका:। अमेरिकी प्रशासन ने भारतीय निर्यातों पर 50% टैरिफ़ लगा दिए। मतलब  चीन और कनाडा से भी ज़्यादा। छोटी सी बात पूरी आर्थिक सज़ा में बदल गई।

प्रभाव तेज़ और निर्मम है। बनारसी साड़ी और रेशम उद्योग इसका ताज़ा शिकार। है पीटीआई एजेंसी के अनुसार बड़े अमेरिकी ऑर्डर रद्द हो रहे हैं, खेप लौटाई जा रही है, मुनाफ़ा खत्म हो रहा है। वाराणसी टेक्सटाइल एसोसिएशन का अनुमान है कि हर साल लगभग 300 करोड़ रू का नुकसान हो सकता है — और यह तो बस एक क्षेत्र है। बाकी उद्योगों की चोट अभी सामने आनी बाकी है। इस दबाव में भारत ने चुपचाप, लगभग सर्जिकल ढंग से, रुख़ बदला है। और यह मोड़ पश्चिम की ओर नहीं, पूरब की ओर है — चीन की ओर।

पहला, प्रतीक। यह संदेश है वॉशिंगटन को कि अगर टैरिफ़ की धमकी जारी रही और आर्थिक सहयोग अटका रहा, तो अमेरिका अपने सबसे महत्वपूर्ण एशियाई सहयोगी को खो सकता है। वही भारत जो क्वाड का स्तंभ है — ऑस्ट्रेलिया और जापान के साथ मिलकर। संकेत साफ़ हैं: दोस्ती भी सौदे पर चलती है।

दूसरा, अर्थशास्त्र। चीन भारत की सप्लाई चेन में गहराई से जुड़ा है — दवाइयों के अवयव से लेकर सोलर पैनल तक, इलेक्ट्रॉनिक्स तक। उस कड़ी को पूरी तरह तोड़ना भारत की विकासकथा को रोक देगा। इसलिए दिल्ली ने आक्रामक भाषण धीमा कर दिया है और चुनिंदा सहयोग की खिड़कियाँ खोली हैं। यह लचीलापन देता है — एक आँख मज़बूती पर, दूसरी यथार्थ पर। अमेरिकी संरक्षणवाद के उभार और वैश्विक सप्लाई चेन के बिखरने के बीच भारत अब हेजिंग (hedging) कर रहा है। न पीछे हटना, न झुकना — बस संतुलन साधना।

यह न तो मेल-मिलाप है, न समर्पण। यह कूटनीति का पुराना नृत्य है — पुर्नसंतुलन। यही राष्ट्र करते हैं जब दबाव असमान हो और सहयोगी अविश्वसनीय। ट्रंप का अमेरिका उतना ही अप्रत्याशित साबित हो रहा है जितना शी का चीन। और भारत जानता है कि दोनों पर पूरी बाज़ी लगाना मूर्खता है।

तो एक बार फिर स्वदेशी लौटा है। लेकिन इस बार चीनी सामान के बहिष्कार के रूप में नहीं, बल्कि पश्चिम को चेतावनी के रूप में। भारत अब खुद को “आज्ञाकारी सहयोगी” नहीं, बल्कि वैश्विक बाज़ार का चतुर व्यापारी दिखाना चाहता है। वही छवि जो जनता को सुनाई गई — विश्वगुरु अब चतुर व्यापारी भी है! अगर इसके लिए पुराने दुश्मन को थोड़ा करीब लाना पड़े, तो हो जाए। भारत अब सीख चुका है कि ताक़त पवित्रता में नहीं, स्थिति-निर्धारण में है।

अगर पश्चिम नैतिक संरेखण चाहता है, तो भारत व्यावहारिकता दिखाएगा। अगर अमेरिका टैरिफ़ लगाएगा, तो भारत बीजिंग को फ़ोन उठाएगा। अगर दुनिया ग़ाज़ा पर उसकी चुप्पी या रूस के साथ उसके व्यापार पर सवाल करेगी, तो दिल्ली मुस्कराकर वही करेगी जो उसे ठीक लगेगा।

भारत की छवि अब “ग्लोबल साउथ” का नैतिक कम्पास नहीं रही। वह अब वैश्विक बाज़ार का चतुर व्यापारी बन रहा है — जो हर हाथ मिलाने, हर चुप्पी, हर देरी का मूल्य जानता है। जो अवसर के लिए नैतिक ऊँचाई छोड़ने से नहीं हिचकता। और अगर इसके लिए पुराने दुश्मन को साथी बनाना पड़े, तो भी सही।

क्योंकि इस धुंधली दोस्तियों और गहराते अंतों के दौर में कोई स्थायी दोस्त नहीं होता — लेकिन हर कोई, अंततः, दुश्मन का दोस्त बन जाता है।

जब अंत गहरा होने लगे, तो अजीब-सा दुश्मन भी दोस्त बन जाता है। यही राजनीति का पुराना नियम है — हताशा रेखाएँ बदल देती है, समय धुन बदल देता है। कल का शत्रु आज का रणनीतिक साथी बन जाता है — इसलिए नहीं कि अतीत सुलझ गया है, बल्कि इसलिए कि भविष्य नए नृत्य की माँग कर रहा है। यह विश्वासघात नहीं है, यह नीति के मुखौटे में छिपी एक मजबूरी भी है। से दिल्ली के सत्ता-गलियारों में मुखौटे एक बार फिर रंग बदल रहे हैं।

कुछ समय पहले तक चीन घोषित दुश्मन था। मोदी के भारत में बीजिंग का ज़िक्र इस्लामाबाद के साथ ही होता था— आक्रांता, घुसपैठिया, धोखेबाज़। गलवान की झड़प ने ग़ुस्सा भड़काया और दिल्ली ने प्रतिक्रिया में चीनी निवेशों की जाँच कड़ी कर दी, पचास से अधिक चीनी मोबाइल ऐप बैन किए, सीधी उड़ानें रोक दीं। नारा साफ़ और जोशीला था: चीनी सामान का बहिष्कार, स्थानीय अपनाओ, स्वदेशी बनो। भले ही “मेड इन इंडिया” सामान की असली बुनियाद चीनी स्क्रू, चिप या कैमिकल पर टिकी हो, पर माहौल साफ़ था। चीन खलनायक था और देश उसी पटकथा पर चल रहा था और अब अमेरिका के बहिष्कार की पटकथा तैयार हो रही है!


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