लेफ्ट या टीएमसी का नहीं यह बंगाल मॉडल

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पश्चिम बंगाल की बात होती है तो अक्सर कहा जाता है कि यह लेफ्ट का मॉडल है या यह तृणमूल कांग्रेस का मॉडल है या यह कि तृणमूल ने सरकार में आने पर लेफ्ट का मॉडल अपना लिया आदि आदि। लेकिन असल में वहां लेफ्ट या तृणमूल का मॉडल नहीं चलता है वहां बंगाल का ही मॉडल चलता है। यह मौजूदा बंगाल का मॉडल है कि जिसकी सरकार बन जाए उसके साथ हो लो। बंगाल में मजदूर संगठन बहुत मजबूत रहे हैं लेकिन तभी तक जब तक लेफ्ट पार्टियों का शासन था। वामपंथी पार्टियों का शासन खत्म होने के साथ ही मजदूर संगठनों की राजनीति भी समाप्त हो गई। हालांकि वहां फैक्टरियां ही ज्यादा नहीं बचीं तो मजदूर संगठन कहां से काम करते। यही हाल राजनीति में दिखता है। वामपंथी पार्टियों की सरकार गई तो उसके बड़े नेताओं को छोड़ बाकी पूरा कैडर ममता बनर्जी के साथ चला गया। लेफ्ट के बनाए पाड़ा क्लब, कटमनी वसूलने वाले गिरोह और मस्तान लोग तृणमूल के हो गए।

अब तृणमूल की सत्ता गई है तो सब भाजपा में जाने के लिए छटपटाने लगे हैं। तृणमूल के कई प्रवक्ताओं की जुबान सिल गई है। सोचें, जिस फालता विधानसभा सीट पर तृणमूल का नेता और उम्मीदवार जहांगीर खान अपने पुष्पा बता कर आईपीएस अधिकार अजयपाल शर्मा को चुनौती दे रहा था और जेके मॉडल की बात कर रहा था वह चुनाव का मैदान छोड़ कर ही भाग गया! अभिषेक बनर्जी डायमंड हार्बर मॉडल की बात करते थे और कहते थे कि इस मॉडल को तोड़ने में भाजपा को दस जनम लगेंगे वो अभिषेक बनर्जी तृणमूल के हारने के बाद फालता में चुनाव प्रचार करने ही नहीं गए, जो क्षेत्र उनके डायमंड हार्बर लोकसभा में आता है! ऐसा तो देश के किसी हिस्से में नहीं होता है कि पार्टी के नेता और कैडर तभी तक आपके साथ रहेंगे जब तक आपकी सत्ता है। हर जगह कुछ लोग इधर उधर होते हैं लेकिन आमतौर पर पार्टी के नेता और कार्यकर्ता एकजुट रहते हैं। बंगाल में खुला खेल फर्रूखाबादी है। जिसकी सरकार बनती है सब एक झटके में उसके साथ चले जाते हैं। इसलिए यह किसी पार्टी का नहीं, बल्कि बंगाल का मॉडल है।


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