बंगाल का नतीजा कानूनी विवादों में फंसेगा

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पश्चिम बंगाल में पहले चरण की 152 सीटों के लिए मतदान हो गया है। बची हुई 142 सीटों पर 29 अप्रैल को वोट डाले जाएंगे और चार मई को नतीजे आएंगे। लेकिन क्या उस नतीजे को अंतिम माना जाएगा? इसमें संदेह है। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट की एक मौखिक टिप्पणी के बाद यह तय है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के आखिरी चरण में कटे 27 लाख नामों का मामला फिर से सर्वोच्च अदालत में पहुंचेगा। दर्जनों की संख्या में उम्मीदवार नतीजों को चुनौती देंगे। गौरतलब है कि पिछले दिनों एक सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर जीत हार का अंतर दो फीसदी का होता है और नाम 15 फीसदी कटे हैं तो इस पर हमारी नजर रहेगी। इसका मतलब है कि पूरे राज्य में और किसी चुनाव क्षेत्र में एसआईआर के तहत कटे नाम और जीत हार के बीच बहुत ज्यादा अंतर होता है तो वह मामला सुप्रीम कोर्ट में सुना जाएगा। नतीजा चाहे जो हो लेकिन यह तय मानें कि चार मई के बाद भी बंगाल के नतीजे की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट में चलती रहेगी।

ऐसा क्यों होगा यह समझना मुश्किल नहीं है। एसआईआर के तहत कुल 91 लाख नाम कटे हैं। इनमें 63 लाख नाम पहले दो चरण में कटे, जिसे लेकर ज्यादा आपत्ति नहीं है। लेकिन बाद में तार्किक विसंगति के आधार पर 27 लाख लोगों के नाम कट गए। इन 27 लाख लोगों के अलावा सात लाख और लोगों ने, जिनके नाम पहले कटे थे, न्यायाधिकरण के सामने आपत्ति दर्ज कराई। इन 34 लाख लोगों में से पिछले दो हफ्ते में न्यायाधिकारण ने सिर्फ 657 लोगों के मामले की सुनवाई की। इन 657 लोगों में से न्यायाधिकरण ने 139 लोगों के नाम की मंजूरी दी। यानी इनके नाम मतदाता सूची में शामिल किए गए। सोचें, 19 न्यायाधिकरण बने हैं और इनको 34 लाख मतदाताओं के दस्तावेजों की जांच करनी थी। लेकिन जांच हुई कुल 657 मतदाताओं की। दूसरे चरण के लिए अभी 27 अप्रैल तक का समय है। लेकिन उस समय तक ज्यादा से ज्यादा पांच सौ नामों की और जांच हो जाएगी। इसका अर्थ है कि 34 लाख लोगों के नाम इस आधार पर कट जाएंगे कि उनकी जांच के लिए समय नहीं मिल पाया।

अगर इस आंकड़े को देखें तो न्यायाधिकऱण ने 657 में से 139 नाम क्लीयर किया। इसका अर्थ है कि 20 फीसदी के करीब नाम सही पाए गए। अगर इस लिहाज से देखें तो 34 लाख में से 20 फीसदी यानी करीब सात लाख लोगों के नाम क्लीयर हो सकते हैं। ये सात लाख वो लोग हैं, जिनके दस्तावेज सही हो सकते हैं लेकिन चूंकि इनके दस्तावेजों की जांच के लिए समय नहीं है इसलिए ये वोट देने के अधिकार से वंचित रह जाएंगे। क्या किसी सभ्य लोकतंत्र में इस तरह की कल्पना की जा सकती है? यह चुनाव आयोग की विफलता है कि इतनी बड़ी संख्या में योग्य मतदाता वोट नहीं डाल पाएंगे। इस सात लाख के आंकड़े को विधानसभा सीटों में डिस्ट्रीब्यूट करें तो हर सीट पर औसतन ढाई हजार नाम कटेंगे। जिन सीटों पर जीत हार का अंतर इससे कम होगा उन सीटों के नतीजे को कैसे सही माना जाएगा? अगर पूरे 34 लाख को विधानसभा सीटों में बांटे तो हर सीट पर औसतन 12 हजार के करीब वोट कटे हैं। सो, यह तय मानें कि जिन लोगों ने न्यायाधिकरण के सामने आपत्ति दर्ज कराई है। उनकी आपत्तियों की सुनवाई करनी होगी और उसका जो नतीजा निकलेगा वह पश्चिम बंगाल के चुनाव नतीजों को प्रभावित कर सकता है। हालांकि यह तब होगा, जब सुप्रीम कोर्ट इस बात पर कायम रहे कि वह कटे हुए नाम और जीत हार के अंतर के बीच का फर्क ज्यादा होने पर मामले की सुनवाई करेगा।


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