भाजपा के सहयोगियों को चिंता

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भारतीय जनता पार्टी की कई सहयोगी पार्टियां इन दिनों चिंता में बताई जा रही हैं। कहा जा रहा है कि पश्चिम बंगाल में भाजपा को मिली जीत और उसके बाद तृणमूल कांग्रेस में हो रही टूट फूट से उनकी चिंता बढ़ी है। असल में 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा की कई सहयोगी पार्टियों का महत्व अचानक बढ़ गया है। इसमें आंध्र प्रदेश की टीडीपी, बिहार की जनता दल यू औऱ महाराष्ट्र की शिव सेना का नाम खासतौर से लिया जा सकता है। बिहार की लोक जनशक्ति पार्टी का भी जिक्र किया जा सकता है। सोचें, सिर्फ पांच सांसदों के साथ चिराग पासवान की लोजपा एनडीए की पांचवीं सबसे बड़ी पार्टी है और सात सांसदों के साथ एकनाथ शिंदे की शिव सेना चौथी सबसे बड़ी पार्टी। चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी के पास 16 और नीतीश कुमार की जनता दल यू के 12 सांसद हैं। इनके दम पर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को बहुमत मिला है। लेकिन अब लोकसभा और राज्यसभा दोनों की तस्वीर बदल रही है।

लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस से अलग होकर करीब 20 सांसदों का एक ब्लॉक बन जाता है और स्पीकर उसे मान्यता दे देते हैं तो उससे भाजपा की स्थिति बहुत मजबूत हो जाएगी। अगर उनका विलय भाजपा में नहीं भी होता है तब भी वे भाजपा के ही गिने जाएंगे। इसी तरह तमिलनाडु में कांग्रेस ने जिस अंदाज में डीएमके को छोड़ा और उसके बाद डीएमके ने जो स्टैंड लिया है वह भी भाजपा के अनुकूल है। कहा जा रहा है कि दोनों पार्टियों के बीच बात हुई है और डीएमके मुद्दा आधारित समर्थन देने को तैयार है। अगर ऐसा होता है तो पुरानी सहयोगी पार्टियों पर से निर्भरता कम होगी।

वैसे भी एकनाथ शिंदे को 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद जो महत्व मिला था वह उसी साल के अंत में हुए विधानसभा चुनाव में खत्म हो गया। लोकसभा चुनाव के समय वे मुख्यमंत्री थे और उनकी पार्टी के सात सांसद जीते थे। लेकिन विधानसभा में भाजपा अकेले 132 सीट जीत गई और सरकार बनाने के लिए उसे शिंदे की जरुरत नहीं रह गई। तभी भाजपा ने अपने देवेंद्र फ़डनवीस को सीएम बनाया। इसी तरह 2025 के विधानसभा चुनाव के बाद बिहार में नीतीश कुमार सीएम बन गए थे लेकिन छह महीने के भीतर भाजपा ने उनको हटा कर अपना मुख्यमंत्री बना दिया। अब राज्य में नीतीश कुमार की पार्टी पूरी तरह से भाजपा के ऊपर निर्भऱ है।

तभी कहा जा रहा है कि चाहे महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे हों या बिहार नीतीश कुमार व चिराग पासवान या आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू, सबको एनडीए में रह कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गुणगान करना है। जून 2024 में इन नेताओं का जो महत्व बना था वह समाप्त हो गया। तृणमूल के टूटने के साथ ही भाजपा ने लोकसभा में अपना बहुमत लगभग बना लिया है। इसी तरह एक के बाद एक तृणमूल के जो राज्यसभा सांसद इस्तीफा दे रहे हैं वे सब भाजपा की टिकट पर दोबारा जीत कर आएंगे। भाजपा ने पहले ही आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सांसदों को तोड़ कर अपनी पार्टी में मिला लिया है। सो, राज्यसभा में वह अगले तीन से चार महीने में 123 यानी बहुमत के मार्क तक पहुंच जाएगी। यह बड़ी उपलब्धि होगी। 1988 के बाद किसी भी पार्टी को राज्यसभा में अकेले बहुमत नहीं मिला है। हालांकि भाजपा के जानकार नेताओं का कहना है कि सहयोगियों को चिंतित होने की जरुरत नहीं है क्योंकि उनकी पार्टियों पर फिलहाल कोई खतरा नहीं है। लेकिन अगर उन्होंने कोई अलग राजनीतिक ट्राई करने का प्रयास किया तो फिर मुश्किल होगी।


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