बिहार में बड़ा उत्सव क्यों नहीं हुआ?

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बिहार में या उत्तर भारत के ज्यादातर राज्यों में राजनीतिक मामलों में बाल की खाल खूब निकाली जाती है। हर व्यक्ति हर घटनाक्रम की व्याख्या करता है। सो, बिहार में सत्ता परिवर्तन हुआ, 20 साल के बाद नीतीश कुमार की मुख्यमंत्री पद से विदाई हुई और भाजपा का पहला मुख्यमंत्री बना तो इसकी कई पहलुओं से चर्चा हुई। मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा के पहले से बिहार भाजपा का एक बड़ा समूह और वैचारिक रूप से भाजपा व आरएसएस का समर्थन करने वाले पत्रकारों का एक समूह इस प्रचार में लगा था कि कोई संघ और भाजपा का पुराना नेता ही सीएम बने। सम्राट चौधरी के नाम का विरोध किया जा रहा था। जब वे बन गए तो पहले दिन से मीनमेख निकालने का सिलसिला शुरू हुआ है। उसमें सबसे बड़ा सवाल यह उठाया जा रहा है कि बिहार जैसे राज्य में भाजपा का पहला मुख्यमंत्री बना तो भाजपा ने बहुत बड़ा उत्सव क्यों नहीं किया? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह शपथ समारोह में क्यों नहीं गए? भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों का जमावड़ा पटना में क्यों नहीं हुआ? गांधी मैदान में शपथ क्यों नहीं हुई? सभी मंत्रियों की शपथ क्यों नहीं कराई गई? आदि आदि।

असल में भारतीय जनता पार्टी ने पहले से इस पूरे घटनाक्रम की हर पहलू पर विचार किया हुआ है। उसको पता है कि यह घटनाक्रम जितना भाजपा का मुख्यमंत्री बनाने का है उससे ज्यादा नीतीश कुमार की विदाई का है। इसका अहसास भाजपा को है कि उसका पहला मुख्यमंत्री बनने से ज्यादा बड़ी बात यह है कि ऐतिहासिक जनादेश हासिल करने और 85 सीटें जीतने के बावजूद नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद से हटाया जा रहा है। तभी सवाल है कि क्या नीतीश कुमार की विदाई का उत्सव मनाया जाना चाहिए? इस पर विचार के बाद ही भाजपा ने पूरे शपथ समारोह को लो प्रोफाइल कार्यक्रम रखने का फैसला किया। बिना बहुत शोर शराबे के और नीतीश कुमार के प्रति समर्थन जताते हुए शपथ समारोह का आयोजन किया गया।

जब एक बार पूरा मामला ठंडा पड़ जाएगा या सत्ता के हस्तांतरण की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी तब भाजपा जश्न मनाएगी। अभी जरूरी था कि पश्चिम बंगाल में चुनाव से पहले बिहार में सरकार बनाने और अपना मुख्यमंत्री बनाने का काम पूरा किया जाए। इसका बंगाल के चुनाव में निश्चित रूप से असर होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार में एनडीए के जीतने के बाद कहा था कि गंगाजी बिहार से बंगाल जाती हैं। ध्यान रहे पूर्वी भारत के तीन बड़े राज्यों में भाजपा का मुख्यमंत्री नहीं बना था। उसने पहले ओडिशा में बनाया और अब बिहार में बना लिया। इसके बाद पश्चिम बंगाल की बारी है। भाजपा यह नैरेटिव बनाना चाहती थी। इसलिए बंगाल चुनाव से पहले उसने अपने मुख्यमंत्री की शपथ कराई। सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने से पहले ही भाजपा ने उनको बंगाल के स्टार प्रचारकों की सूची में शामिल कर दिया था। बंगाल चुनाव से पहले अपना सीएम बनाने की जल्दी इस वजह से भी थी कि कहीं बंगाल में भाजपा का प्रदर्शन अच्छा नहीं हुआ तो बिहार में सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया में देरी हो सकती थी। बहरहाल, बंगाल चुनाव के बाद एनडीए के सभी घटक दलों के बाकी मंत्रियों की शपथ होगी और उस समय हो सकता है कि बड़ा इवेंट बनाया जाए, जिसमें भाजपा के सीर्ष नेता शामिल हों। यह कहना और मानना बेवकूफी होगी कि सम्राट चौधरी प्रधानमंत्री मोदी या अमित शाह के चुने हुए सीएमं नहीं हैं इसलिए दोनों उनके शपथ में नहीं गए। मोदी और शाह ने ही पिछले पांच साल में उनका कद इतना बड़ा किया कि वे बिहार के सीएम बनने लायक हों। उसके बाद मोदी और शाह ने ही उनको बिहार का सीएम बनाया।


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