बुजुर्ग राज्यपालों को चिंता करने की जरुरत नहीं

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भारत में राज्यपाल बनने के बाद सक्रिय राजनीति में लौटना कोई अनोखी बात नहीं है। हमेशा ऐसा होता रहा है। कई नेता राज्यपाल रहने के बाद सक्रिय राजनीति में लौटे और मुख्यमंत्री या केंद्रीय मंत्री बने। सुशील कुमार शिंदे से लेकर मोतीलाल वोरा तक की मिसाल है। भाजपा ने भी उत्तर प्रदेश में बेबीरानी मौर्य से लेकर तमिलनाडु में तमिलिसाई सौंद्रयराजन तक को चुनाव लड़ाया। लेकिन अगर भाजपा का कोई नेता बुजुर्ग हो और राज्यपाल रहा हो फिर भी उसे चुनाव लड़ने का मौका मिले तो यह भाजपा के कई बुजुर्ग नेताओं के लिए बड़ी राहत की बात होगी। असल में भाजपा ने एक अघोषित नियम बना रखा है कि 75 साल के बाद रिटायर कर दिया जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कुछ अन्य लोगों को इसका अपवाद बनाया गया है। लेकिन इस बार भाजपा केरल में पूर्व राज्यपाल के राजशेखरन को चुनाव लड़ा रही है, जिनकी उम्र 73 साल है।

गौरतलब है कि कुम्मनम राजशेखरन मिजोरम के राज्यपाल रहे हैं। वे इस बार अरानमुला सीट से विधानसभा का चुनाव लड़ रहे हैं। वे भाजपा के बहुत पुराने और समर्पित कार्यकर्ता रहे हैं। एक समय दक्षिण भारत और खास कर केरल की राजनीति में वे भाजपा का चेहरा माने जाते थे। हिंदुत्व की विचारधारा और अपनी सादगी के लिए मशहूर राजशेखरन कभी सांसद या विधायक नहीं रहे। वे केरल में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रहे हैं। उनकी सादगी ऐसी है कि इतने लंबे समय तक संघ प्रचारक और भाजपा के नेता रहे राजशेखरन की कुल संपत्ति एक लाख रुपए की है। पिछली बार चुनाव में उन्होंने 10 लाख कुल संपत्ति बताई थी, जिसमें नौ लाख की कमी आ गई है। बहरहाल, वे 73 साल के हैं और राज्यपाल रहे हैं। फिर भी चुनाव लड़ रहे हैं। तभी भाजपा के जो नेता राज्यपाल बनाए गए हैं और जिनकी उम्र 70 साल से ज्यादा हो गई है। उनको चिंता करने की जरुरत नहीं है। आवश्यकता होने पर पार्टी उनको चुनाव लड़ा सकती है।


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