पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के पहले चरण में जो नहीं हुआ वह दूसरे चरण में होता दिख रहा है। पहले चऱण में 58 लाख से कुछ ज्यादा नाम कटे तो इसे बहुत सामान्य माना गया। बिहार में एसआईआर में 69 लाख के करीब नाम कटे थे। ध्यान रहे बिहार और बंगाल दोनों में मतदाताओं की संख्या लगभग बराबर थी। पहले चरण के बाद बंगाल से खबर थी कि मुस्लिम बहुल इलाकों में बहुत कम वोट कटे हैं। मुस्लिम बहुलता वाले क्षेत्रों में चार से छह फीसदी तक नाम कटे थे, जबकि ओवरऑल आठ फीसदी के करीब नाम कटे। हिंदू मतदाताओं खास कर मतुआ मतदाताओं के नाम ज्यादा कटने की चर्चा था। एसआईआर से पहले बंगाल में सात करोड़ 66 लाख मतदाता थे, जो पहले चरण के बाद घट कर सात करोड़ आठ लाख रह गए। दूसरे चरण के बाद चार लाख से कुछ ज्यादा नाम और कट गए, जिसके बाद मतदाताओं की संख्या सात करोड़ चार लाख रह गई।
लेकिन असली खेल इसके बाद होता दिख रहा है। चुनाव आयोग ने जिन सवा करोड़ लोगों को लॉजिकल डिस्क्रिपेंसीज के नाम पर नोटिस दिया था उनमें से 60 लाख छह हजार लोगों के नाम ‘विचाराधीन श्रेणी’ में डाल दिया है। इनके नाम मतदाता सूची में हैं लेकिन वोट डालने का अधिकार तभी मिलेगा, जब पूरक सूची में नाम आए। उससे पहले इनके दस्तावेजों की जांच हो रही है। पांच सौ से ज्यादा न्यायिक अधिकारियों की मौजूदगी में ईआरओ और एईआरओ दस्तावेजों की जांच कर रहे हैं। पहली बार मुस्लिम बहुल इलाकों में नाम नहीं कटे थे लेकिन दूसरे चरण के बाद जो 60 लाख नाम रोके गए हैं उनमें से अधिकतर मुस्लिम हैं।
रोके गए 60 लाख नामों में से 11 लाख नाम अकेले मुर्शिदाबाद जिले के हैं और आठ लाख नाम मालदा जिले का है। सोचें, बांग्लादेश की सीमा से लगते इन दो जिलों में ही एक तिहाई वोट रोके गए हैं। ये दो जिले 50 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम आबादी वाले हैं। इन दो जिलों के अलावा उत्तरी दिनाजपुर के करीब पांच लाख, उत्तरी 24 परगना के छह लाख और दक्षिण 24 परगना में पांच लाख से कुछ ज्यादा नाम रोके गए हैं। ये तीन जिले भी घनी मुस्लिम आबादी वाले जिले हैं। इन पांच जिलों में कुल मिला कर 35 लाख नाम रोके गए हैं।
अगर रोके गए 60 लाख नामों से आधे या एक चौथाई नाम भी स्थायी रूप से मतदाता सूची से बाहर होते हैं तो यह ममता बनर्जी की पार्टी के लिए बड़ा झटका होगा। लेकिन समस्या सिर्फ इतनी नहीं है। अगर चुनाव आयोग रोके गए नाम में बड़ी संख्या में नाम काटता है तो ममता बनर्जी निश्चित रूप से उसका विरोध करेंगी। वे सुप्रीम कोर्ट जाएंगी। सवाल है कि अगर अदालत ने फिर से नामों की जांच के आदेश दिए या समय सीमा आगे बढ़ाई तो क्या होगा? मार्च के दूसरे हफ्ते में चुनाव की घोषणा होनी है। या तो ममता बनर्जी को मन मार कर नामों की छंटनी स्वीकार करनी होगी या चुनाव टलने के लिए तैयार रहना होगा। चुनाव टला को राज्य में राष्ट्रपति शासन लग सकता है, जिसे ममता बनर्जी अफोर्ड नहीं कर सकती हैं। राष्ट्रपति शासन में सब कुछ उनके हाथ से निकल जाएगा और उनके समर्थकों को पाला बदलने में भी समय नहीं लगेगा।
