प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजराइल यात्रा बहुत गलत समय पर हुई। वे दो दिन की यात्रा पूरी करके और वहां संसद को संबोधित करके भारत लौटे और उसके दो दिन के अंदर इजराइल और अमेरिका ने पूरी ताकत से ईरान पर हमला कर दिया। ध्यान रहे अमेरिका कई महीने से हमले की तैयारी कर रहा था। उसने अपने दो सबसे बड़े युद्धपोत यूएसएस अब्राहम लिंकन और यूएसएस गेराल्ड फोर्ड को अरब सागर में भेज दिया था। दो सौ से ज्यादा लड़ाकू विमान भी अमेरिका ने खाड़ी देशों में बने अपने सैन्य ठिकानों पर उतार दिए थे। यह सब सार्वजनिक रूप से हो रहा था। इसलिए सबको पता था कि वहां क्या हो रहा है। ट्रंप रोज हमले के बयान दे रहे थे। इसके बावजूद प्रधानमंत्री मोदी इजराइल गए।
अब सवाल है कि यह कूटनीतिक गलती थी या इजराइल ने जान बूझकर बदमाशी की या दोनों है? इजराइल के जाने माने पत्रकार और सामरिक मामलों के विशेषज्ञ बराक रैविड ने सोशल मीडिया में एक पोस्ट डाल कर बताया है कि इजराइल और अमेरिका ने एक हफ्ते पहले ही हमले का फैसला कर लिया था और उसकी तैयारी पूरी हो गई थी। सोचें, अगर उसने 28 फरवरी को हमला करने से एक हफ्ते पहले हमले का फैसला कर लिया था तो नरेंद्र मोदी को क्यों बुलाया? उनको रोका क्यों नहीं? भारत को लेकर सवाल है कि भारत की खुफिया एजेंसियां या डिप्लोमेटिक मिशन कैसे काम करते हैं कि उन्होंने जाने का फैसला होने दिया? यह सामान्य कूटनीति और शिष्टाचार की बात होती है कि संभावित युद्ध वाले इलाकों का दौरा ऐसे देश नहीं करते हैं, जो तटस्थ कूटनीति का रास्ता अपनाते हैं। अगर भारत को इजराइल के साथ युद्ध में शामिल होना होता तो अलग बात थी।
