भारत और ब्रिटेन का अंतर

Categorized as राजनीति

भारत में संसदीय लोकतंत्र की जो शासन प्रणाली अपनाई गई है उसे ब्रिटेन से लिया गया है। कई चीजें अमेरिका और दूसरे देशों से भी ली गई हैं लेकिन मूल भावना ब्रिटिश संसद, संविधान और राजनीतिक परंपरा व प्रणाली की है। ब्रिटेन की तर्ज पर ही भारत की संसदीय प्रणाली में भी सामूहिक उत्तरदायित्व के सिद्धांत को अपनाया गया है। लेकिन दुर्भाग्य से कभी भी सामूहिक उत्तरदायित्व की भावना से कोई काम नहीं होता है, न सरकार में और न राजनीति में। किसी मंत्री की कोई गलती होगी तो यह कह कर पल्ला झाड़ लिया जाता है वह उसका निजी मामला है। पहले इस्तीफा लिया जाता था लेकिन अब नरेंद्र मोदी की सरकार ने यह सिद्धांत तय किया है कि चाहे कुछ भी हो जाए इस्तीफा नहीं होगा। उधर ब्रिटेन में बात बात पर इस्तीफे होते रहते हैं। क्रिस्टीन कीलर कांड के समय तो एक मंत्री का नाम आया था लेकिन लॉर्ड प्रोफ्यूमो की पूरी सरकार ने इस्तीफा दिया था।

बहरहाल, एक बार फिर सामूहिक उत्तरदायित्व के सिद्धांत की परीक्षा हो रही है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री से जुड़े कई लोगों ने एपस्टीन फाइल्स के नाम पर इस्तीफा दिया है, जिसके बाद प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के इस्तीफे की मांग हो रही है। इसके उलट भारत में एक केंद्रीय मंत्री का नाम एपस्टीन फाइल में आया है और नेता प्रतिपक्ष ने इसका जिक्र कर दिया तो पूरी भाजपा नेता प्रतिपक्ष के पीछे पड़ गई। मंत्री का बचाव किया जाने लगा। मंत्री ने खुद प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कहा कि उन्होंने कोई गलती नहीं की है। मंत्री हरदीप पुरी ने कहा कि वे ज्योफ्री एपस्टीन के किसी गलत काम में शामिल नहीं थे। उनकी तीन या चार मुलाकातें हुईं और वह सब अंतरराष्ट्रीय डेलिगेशन के साथ या बहुपक्षीय मंचों पर हुई। हालांकि तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा का दावा है कि करीब साढ़े तीन सौ ईमेल्स में मंत्री हरदीप पुरी का नाम आया है। उन्होंने एपस्टीन के किसी सहयोगी का वीजा भी फास्ट प्रोसेस कराया था। एक कथित ईमेल ऐसी है, जिसमें मंत्री ने एपस्टीन को सीजन ग्रीटिंग्स दी है और साथ ही पूछा है कि वे अपने एक्जोटिक आईलैंड से लौट आए। सोचें, वही एक्जोटिक आईलैंड है, जिसकी पूरी दुनिया में बदनामी है।

भारत के एक दिवालिया हो रहे या हो चुके कारोबारी भी कई बार नाम है और प्रधानमंत्री के संदर्भ में भी कई बार जिक्र है। प्रधानमंत्री का भी नाम आया है और उनके इजराइल दौरे का भी जिक्र है। लेकिन भारत में यह कोई मुद्दा नहीं है। सब कह रहे हैं कि उन्होंने कोई गलत काम नहीं किया है। इसकी तुलना ब्रिटेन से करेंगे तो अंतर दिखेगा। ब्रिटिश प्रधानमंत्री के चीफ ऑफ स्टाफ मॉर्गन मैकस्वीनी ने सिर्फ इसलिए इस्तीफा दिया क्योंकि उन्होंने अमेरिका में राजदूत के रूप में नियुक्ति के लिए पीटर मैंडेलसन के नाम की सिफारिश की थी और मैंडेलसन का नाम एपस्टीन फाइल्स में आया है। नाम आने पर मैंडेलसन ने तो इस्तीफा दिया ही मैकस्वीनी ने भी इस्तीफा दिया। सोचें, मैकस्वीनी का नाम एपस्टीन फाइल्स में नहीं है। लेकिन उनके द्वार एंडोर्स किया गया एक नाम आया है इसलिए उन्होंने इस्तीफा दे दिया है। इसी तरह प्रधानमंत्री के मीडिया टीम के टॉम एलन ने भी इस्तीफा दिया। उनका भी नाम फाइल्स में नहीं है। लेकिन उनको लगता है कि वे इस मौके पर बेहतर काम नहीं कर सके और पीएम को नई टीम बनाने का मौका मिलना चाहिए। सोचें, यह उस देश के लोगों के मोरल हाईग्राउंड की मिसाल है, जहां के लोग हमलोगों की तरह दिन रात नैतिकता, परंपरा, धर्म, संस्कृति आदि की महानता का गुणगान नहीं करते हैं। भारत में सब एक दूसरे को बचाने में लगे हैं।


Previous News Next News

More News

सत्रावसान में देरी का एक रिकॉर्ड तो टूटा

September 29, 2026

संसद का मानसून सत्र समाप्त हुए डेढ़ महीने से ज्यादा हो गए। सत्र 13 अगस्त को स्थगित हुआ था। लेकिन अभी तक सत्रावसान नहीं किया गया है। संसद स्थघित हुए 47 दिन हो गए हैं। आमतौर पर अनिश्चितकाल तक के लिए स्थगित होने के एक हफ्ते में सत्रावसान कर दिया जाता है। उसके बाद जब…

सीपीएम का अपना एजेंडा है

September 29, 2026

देश की सबसे बड़ी कम्युनिस्ट पार्टी सीपीएम के महासचिव एमए बेबी ने विपक्षी गठबंधन की बैठक बुलाने की पहल की। इस पहल पर ममता बनर्जी ने सबसे पहले जवाब दिया और उन्होंने बेबी से फोन पर बात की। कांग्रेस ने भी इस पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी और उसके बाद 30 सितंबर की बैठक तय हुई।…

सपा-कांग्रेस की मुस्लिम वोट की खींचतान

September 29, 2026

वैसे उत्तर प्रदेश के मुसलमानो के मन में कोई भ्रम नहीं है। वे अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी के साथ हैं क्योंकि उनको लग रहा है कि सपा ही इस बार भाजपा से लड़ने वाली मुख्य ताकत है। पिछले लोकसभा चुनाव मे उन्होंने देखा कि भाजपा के समर्थक मतदाताओं में भी अगर भाजपा से नाराजगी…

यूपीएससी के सवाल क्या एआई बना रहा है?

September 29, 2026

यह बहुत परेशान करने वाला सवाल है क्योंकि संघ लोक सेवा आयोग यानी यूपीएससी एकमात्र ऐसी संस्था है, जिस पर प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल होने वाले अभ्यर्थी आज भी आंख मूंद कर भरोसा करते हैं। इसका भरोसा इतना गहरा है कि सुप्रीम कोर्ट ने दो बार अपनी सुनवाई में नेशनल टेस्टिंग एजेंसी यानी एनटीए और…

साहब अच्छे एक्टर नहीं!

September 29, 2026

कारण जो हो, साहब का विदेशियों के प्रति प्रेमिल झुकाव, और देसियों के प्रति रूखा बर्ताव बेढब है। फिर, बार-बार सीमित अंदाज, ऊँचे, हवाई दावे, वैज्ञानिकों विशेषज्ञों जैसे ऑडियेंस में भी घिसे-पिटे मुहावरे, उपदेश, आदि उन की समझ का भी सीमित दायरा दिखाता है। ऊँचे पद से वह थोड़ा ढँका जरूर रहा, पर छिपा नहीं…

logo