कहां है ‘मनरेगा बचाओ’ आंदोलन?

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कांग्रेस पार्टी ने बड़ी जद्दोजहद और प्लानिंग के बाद पिछले महीने ‘मनरेगा बचाओ’ आंदोलन शुरू किया था। जद्दोजहद इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि इस अभियान को शुरू करने से पहले कई बार तारीखें टली थीं। पहले इसे 28 दिसंबर को शुरू किया जाना था। बाद में कहा गया कि पांच जनवरी से अभियान शुरू होगा। फिर 10 जनवरी से इसको शुरू किया गया। हालांकि उस समय भी राहुल गांधी इससे दूर रहे। कांग्रेस ने इसे एक बड़े आंदोलन के तौर पर शुरू किया। राहुल गांधी ने कई बार कहा कि जिस तरह से केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसान एकजुट हुए और आंदोलन किया उसी तरह मनरेगा को समाप्त करके वीबी जी राम जी कानून के खिलाफ मजदूर एकजुट होंगे। राहुल का दावा है कि केंद्र सरकार को यह कानून भी वापस लेना होगा, जैसे उसने कृषि कानून वापस लिए थे।

लेकिन सवाल है कि क्या इन कानूनों को वापस लेने के लिए उसी तरह का आंदोलन हो रहा है, जैसा किसानों ने किया था? किसानों ने एक साल तक दिल्ली की घेराबंदी करके रखी थी। हजारों किसान लगातार एक साल तक धरने पर बैठे थे। सैकड़ों किसानों की जान गई थी। तब सरकार ने वह कानून वापस लिया। लेकिन मनरेगा को खत्म करने के खुलाफ कांग्रेस जो आंदोलन कर रही है वह कहीं दिख नहीं रहा है। 10 जनवरी से शुरू हुआ आंदोलन 15 फरवरी तक चलना था। लेकिन एक महीना पूरा होने से पहले ही इसकी चर्चा बंद हो गई है। शुरू में कुछ दिनों तक तो कांग्रेस के नेताओं ने जिला मुख्यालयों आदि में प्रदर्शन वगैरह किया। लेकिन अब वह भी बंद है। इसी तरह राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे भी एक दिन मजदूर बन कर इसके प्रतीकात्मक विरोध में शामिल हुए लेकिन उसके बाद उनकी प्राथमिकता में भी यह आंदोलन नहीं है। अगर राहुल गांधी चाहते हैं कि यह कानून वापस हो तो उस तरह ढीले ढाले अभियान से वह नहीं हो पाएगा। इसके लिए सुनियोजित आंदोलन की जरुरत पड़ेगी। केंद्र सरकार ने नए कानून के तहत 95 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का आवंटन किया है। इसके बजट प्रावधानों को लेकर भी कांग्रेस की ओर से कोई टिप्पणी नहीं की गई। सड़क पर उतरना तो दूर की बात है।


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