लोकसभा में सोमवार को बड़ा विवाद हुआ कि राहुल गांधी कैसे एक बिना छपी हुई किताब के अंश पढ़ कर मुद्दा उठा रहे हैं। संसद के कामकाज के नियम 349 के हवाले से कहा गया कि संसद में किसी बिना छपी हुई किताब या अखबार या पत्रिका की कटिंग के आधार पर चर्चा नहीं की जा सकती है। हालांकि स्पीकर को यह कहते भी सुना गया कि किसी भी किताब या अखबार के आधार पर मुद्दे नहीं उठाए जा सकते हैं। इस नियम के हवाले राहुल गांधी को नहीं बोलने दिया गया। वे कोई 45 मिनट तक बोलने का प्रयास करते रहे। उनको रोकने के लिए रक्षा मंत्री और गृह मंत्री खुद खड़े हुए। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 11 बार और गृह मंत्री अमित शाह ने सात बार राहुल को टोका।
बाद में राहुल गांधी इतने परेशान हो गए कि उन्होंने तंज करने के अंदाज में स्पीकर ओम बिरला से पूछा कि वे बता दें कि नेता प्रतिपक्ष को क्या बोलना चाहिए। सोचें, अखबार, पत्रिका और किताब के आधार पर मुद्दे उठाने से रोकने की कोशिश कर रही भाजपा ने विपक्ष में रहते सबसे ज्यादा राजनीति इस आधार पर की है। इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के जमाने से लेकर मनमोहन सिंह के जमाने तक भाजपा के नेता अक्सर अखबारों में छपी खबरों के हवाले संसद में हंगामा करते थे। बोफोर्स घोटाले तो स्वीडिश रेडियो ने खोला और उसके बाद अखबारों ने वह मुद्दा उठाया। उस समय भाजपा और दूसरी विपक्षी पार्टियों ने लगातार अखबारों में और खासकर ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में छपी खबरों के आधार पर संसद में मुद्दे उठाए। मनमोहन सिंह के समय भी तमाम कथित घोटालों की खबरों अखबारों के आधार पर ही संसद में उठाई जाती थीं। लेकिन अब भाजपा को अखबार, पत्रिका और किताब से समस्या है।
