महाराष्ट्र में कुछ नहीं कर रही कांग्रेस

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महाराष्ट्र के घटनाक्रम से कांग्रेस की राजनीति पर बड़ा असर पड़ने वाला है। हालांकि कांग्रेस के नेता अभी इस बात को लेकर विचार विमर्श करते नहीं दिख रहे हैं। यह बड़ी हैरानी की बात है कि कांग्रेस का कोई बड़ा नेता अजित पवार के अंतिम संस्कार में नहीं पहंचा। शरद पवार के भतीजे के निधन में निश्चित रूप से कांग्रेस के किसी बड़े नेता को पहुंचना चाहिए था। इस बात का कोई अर्थ नहीं है कि अजित पवार एनडीए में थे। उनका दुखद निधन हुआ था और वे लंबे समय तक कांग्रेस पार्टी की सरकार में भी उप मुख्यमंत्री रहे थे। यह पवार परिवार की त्रासदी थी। पता नहीं सोनिया और राहुल गांधी ने शरद पवार से बात की या नहीं। हो सकता है बात की हो लेकिन उसकी खबर सामने नहीं आई। ध्यान रहे अजित पवार के निधन के तुरंत बाद बारामती पहुंचने वालों में राज ठाकरे शामिल थे, जो अलग राजनीति करते हैं। अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए उद्धव ठाकरे भी पहुंचे थे। वे भी अजित पवार के एनडीए के साथ जाने से कम आहत नहीं थे।

लेकिन यह राजनीति का शिष्टाचार है, जिसके तहत विरोधी नेता भी अजित पवार के अंतिम संस्कार में पहुंचे। प्रदेश कांग्रेस के नेता जरूर उनको श्रद्धांजलि देने गए लेकिन दिल्ली से किसी को जाना चाहिए था। बहरहाल, ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस पार्टी ने अपने को अलग थलग कर लिया है। अगर शरद पवार की पार्टी का विलय अजित पवार की पार्टी में हो जाता है और दोनों एनसीपी एक हो जाते हैं और एनडीए में चले जाते हैं तो यह कांग्रेस के लिए झटका होगा। लेकिन महाराष्ट्र में कांग्रेस के अलग थलग होने का एक कारण यह भी है कि उद्धव ठाकरे व राज ठाकरे मिल कर राजनीति कर रहे हैं। दोनों ने मिल कर स्थानीय निकाय का चुनाव लड़ा। राज ठाकरे के कारण ही कांग्रेस उद्धव से अलग हुई। अब सवाल है कि क्या एनसीपी के अलग होने के बाद कांग्रेस राज ठाकरे को स्वीकार कर लेगी? अगर नहीं करती है तो उसे पूरी तरह से अकेले आगे की राजनीति करनी होगी। मुश्किल यह है कि कांग्रेस के पास प्रदेश में ऐसे नेता नहीं हैं, जो कांग्रेस को अकेले दम पर राजनीति में बड़ी ताकत बनाए रख सकें। राहुल गांधी ने हर्षवर्धन सपकाल को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है लेकिन उनका राजनीतिक कद ऐसा नहीं है कि वे पवार परिवार या ठाकरे परिवार के साथ कांग्रेस के हितों के हिसाब से समझौते की बात कर सकें।


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