महाराष्ट्र में ऐसा लगता है कि भाजपा की कोई नीति या नियम काम नहीं करता है। वहां के नेता अपने हिसाब से फैसले करते हैं और अपने हिसाब से राजनीति करते हैं। स्थानीय निकाय चुनावों में जिस तरह का गठबंधन हुआ है वह भी प्रदेश की राजनीतिक मिजाज की मिसाल है। वहां सभी पार्टियां सभी पार्टियों के साथ तालमेल करके लड़ रही हैं। जितनी पार्टियां हैं उनके साथ जितने संभावित समीकरण बन सकते हैं उतने समीकरण हैं। परम्यूटेशन और कंबीनेशन का सारा गणित इसके आकलन में फेल हो जाएगा। बहरहाल, भाजपा का एक नियम परिवारवाद को रोकने का है। एक ही परिवार के दो लोगों को चुनाव लड़ाने में भी भाजपा हिचकती है। लेकिन महाराष्ट्र में इस नियम को लगता है कि कोई नहीं मानता है।
इस मामले में सबसे दिलचस्प कहानी विधानसभा के स्पीकर राहुल नार्वेकर की है। राहुल नार्वेकर अपने परिवार के तीन लोगों को बीएमसी का चुनाव लड़वा रहे हैं। परिवार के तीनों लोग उनको विधानसभा क्षेत्र कोलाबा की तीन अलग अलग सीटों से लड़ रहे हैं। इतना ही नहीं यह आरोप भी है कि उन्होंने खुद मौजूद रह कर नामांकन कराया और दूसरी पार्टियों के उम्मीदवारों के नामांकन रुकवाए या उनको रद्द कराया। कोलाबा विधानसभा क्षेत्र में वार्ड नंबर 226 से नार्वेकर के भाई मकरंद नार्वेकर चुनाव लड़ रहे हैं और उनके सामने सिर्फ एक निर्दलीय उम्मीदवार की चुनौती है। वार्ड नंबर 225 में मकरंद की पत्नी हर्षिता नार्वेकर चुनाव लड़ रही हैं और उनके सामने दोनों शिव सेना की चुनौती है। इसके बाद वार्ड नंबर 227 में नार्वेकर की बहन गौरी शिवालकर चुनाव लड़ रही हैं। उनके सामने सिर्फ उद्धव ठाकरे की शिव सेना की चुनौती है। इस तरह के परिवारवाद को लेकर भाजपा में सवाल उठ रहे हैं तो दूसरी ओर विपक्षी पार्टियां आरोप लगा रही हैं कि सत्ता का दुरुपयोग करके स्पीकर ने उम्मीदवारों को नामांकन से रोका या नामांकन रद्द कराए।
