संसद के शीतकालीन सत्र में वंदे मातरम् पर चर्चा में प्रियंका गांधी वाड्रा ने हिस्सा लिया और चुनाव सुधारों पर राहुल गांधी ने भाषण दिया। पहले सोमवार को प्रियंका का भाषण हुआ और मंगलवार को राहुल बोले। सोमवार को प्रियंका के भाषण के बाद से ही उसकी तारीफ शुरू हो गई थी और सोशल मीडिया में प्रियंका के भाषण के हिस्से वायरल हो रहे थे। प्रियंका ने अपने संक्षिप्त भाषण में कई रेफरेंस प्वाइंट दिए। उन्होंने प्रधानमंत्री के भाषण कला की तारीफ की तो साथ ही यह भी कह दिया कि तथ्यों के मामले में वे थोड़े कमजोर पड़ जाते हैं। इसके बाद प्रधानमंत्री की बातों को प्रियंका ने बड़े सहज तरीके से तथ्यों के साथ खारिज किया। यह नहीं लगा कि वे कोई एकेडमिक भाषण दे रही हैं या तथ्य याद लिख कर ले आई हैं, जिसे बता रही हैं। एक बड़ा रेफरेंस प्वाइंट यह दिया कि सरकार पंडित नेहरू की गलतियों की एक पूरी सूची बना ले और जितनी देर चाहे उतनी देर संसद में चर्चा करा ले। लेकिन उसके बाद उन्हें छोड़े और गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई पर बात करे।
अगले दिन राहुल गांधी ने चुनाव सुधार पर भाषण दिया तो उसमें कोई रेफरेंस प्वाइंट नहीं था और कोई नई बात नहीं थी। वे पिछले छह महीने से जो बातें कह रहे हैं उसी को सदन में दोहराया। उनके भाषण में तारतम्य और सहजता की कमी थी। कांग्रेस की ओर से चर्चा शुरू करने वाले मनीष तिवारी और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने ज्यादा अच्छा भाषण दिया। रामपुर और मिल्कीपुर के उपचुनावों की घटनाओं का हवाला देकर अखिलेश यादव ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाया। राहुल के भाषण में इस तरह के स्पेशिफिक तथ्य नदारद थे। सो, उनके भाषण देने की कला, लोगों से कनेक्ट करने की क्षमता और तैयारियों को लेकर सवाल उठ रहे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि प्रियंका के मुकाबले राहुल में ज्यादा वैचारिक प्रतिबद्धता और ईमानदारी है लेकिन वे कांग्रेस से लेकर सहयोगी पार्टियों के बीच कोई उत्साह नहीं पैदा कर पा रहे हैं। तभी टेलीविजन चैनलों ने बहस शुरू कर दी है कि क्या प्रियंका के कांग्रेस संभालने का समय आ गया है। हालांकि कांग्रेस के नेता अभी इस संभावना को खारिज कर रहे हैं।
